अमेठी की धरती ने देश को कई अनमोल नाम और गौरवगाथाएं दी हैं, और इन्हीं में से एक है कोहरा रियासत। इसका इतिहास महज एक राजघराने के उठने और राज करने की कहानी भर नहीं है। यह भारतीय संस्कृति की नींव, वीरता, बलिदान और विदेशी हुकूमत के खिलाफ धधकी आजादी की आग का एक ऐसा दस्तावेज है जो आज भी जिंदा है। सन 1636 में गंगा दशहरा के पावन पर्व पर इस रियासत की स्थापना हुई थी, और इसका इतिहास जितना पुराना है, उतना ही रोचक और नई पीढ़ी के भीतर देशभक्ति जगाने वाला भी।
नरवरगढ़ से अमेठी तक: कहां से शुरू हुईं जड़ें
कोहरा रियासत की जड़ें मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नरवरगढ़ से जुड़ती हैं। नरवरगढ़ के राजकुमार सोढ़ देव (966 से 1006) ने 966 ईस्वी में अमेठी राज्य की नींव रखी थी। इसी राजवंश की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अमेठी के राजा विक्रम साह (1599 से 1636) के छोटे बेटे राजकुमार हिम्मत साह ने ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा के शुभ अवसर पर सन 1636 ईस्वी में कोहरा रियासत की स्थापना की। उनका यह योगदान आज भी पत्थरों पर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में दर्ज है।
चतुर्भुज धाम और कोहरा किले की नींव
बाबू हिम्मत साह ने इस इलाके में सबसे पहले भगवान विष्णु का एक भव्य मंदिर बनवाया, जो आज भी "चतुर्भुज धाम" के नाम से जाना जाता है। इसी मंदिर की स्थापना के बाद उन्होंने कोहरा किले का निर्माण कराया, जहां उनका राज्याभिषेक हुआ और वे कोहरा के पहले शासक बने। इस मंदिर की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि आगे चलकर यहीं पर रियासत के सभी तालुकदार आजादी की लड़ाई की रणनीति तय करते थे।
1857 की क्रांति और बाबू भूप सिंह का शौर्य
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में कोहरा रियासत आजादी के मतवालों का एक बड़ा केंद्र बन गई। सन 1857 के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कोहरा के तत्कालीन शासक बाबू भूप सिंह क्रांति के महानायक बनकर सामने आए। उन्होंने अवध के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रिम भूमिका निभाई और लखनऊ रेजीडेंसी के ऐतिहासिक घेराव में अपनी सेना के साथ शामिल हुए। सुल्तानपुर जिले के चांदा और कादूनाला के युद्धों में बाबू भूप सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।
अंग्रेजों का दमन और किले का विध्वंस
बाबू भूप सिंह के इस अदम्य साहस से बौखलाकर ब्रिटिश सरकार ने रियासत पर कई तरह के अत्याचार किए। भारी-भरकम कर थोपे गए और दमनकारी नीतियों के जरिए इलाके की जनता का आर्थिक शोषण और दमन करने की कोशिश हुई। अंग्रेजी सैनिकों की एक टुकड़ी कोहरा भेजी गई, जिसने भारी मात्रा में हथियार जब्त किए और कोहरा के ऐतिहासिक किले को ध्वस्त करने का क्रूर आदेश दे दिया। आज भी उस भव्य किले के अवशेष बांसों के झुरमुटों के बीच अपने गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं। बाद में बाबू भूप सिंह के वंशजों ने एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद कोहरा रियासत को ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्ति मिली और उसके अधिकार वापस मिल गए।
रियासत के शासक और आज की बागडोर
इस रियासत पर कई रसूखदार तालुकदारों ने राज किया। इन्हीं में से एक थे बाबू उमानाथ सिंह। बाबू शिव बहादुर सिंह के बाद उनके भाई बाबू उमानाथ सिंह (1993 से 2017) कोहरा के अगले प्रमुख बने। वे अवध विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर और 'उत्तर प्रदेश इतिहास कांग्रेस' के संस्थापक सदस्य रहे। उन्होंने शिक्षा और इतिहास संकलन के क्षेत्र में अहम योगदान दिया और रियासत की देखरेख की।
बाबू हिम्मत साह की इसी गौरवशाली वंश परंपरा में 1857 की क्रांति के नायक बाबू भूप सिंह का जन्म हुआ था। समय के साथ कई शासकों ने कोहरा स्टेट की कमान संभाली, जिनमें कुंवर हिम्मत सिंह, बाबू भूप सिंह, बाबू शिव दयाल सिंह, बाबू देवी दयाल सिंह, बाबू महावीर सिंह, बाबू बेनी बहादुर सिंह, बाबू प्रताप बहादुर सिंह, बाबू शिव बहादुर सिंह, बाबू उमानाथ सिंह और बाबू संजय सिंह जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। वर्तमान में इस रियासत की बागडोर बाबू राघवेंद्र प्रताप सिंह (अभय सिंह) संभाल रहे हैं। कोहरा का राजभवन आज भी अपने इतिहास को पत्थरों पर गौरवशाली रूप में दर्ज किए हुए है और इस अमर परंपरा को जिंदा रखे हुए है।













