भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में निधन हो गया था। अपने जीवनकाल में उन्होंने ठुमरी, कजरी और ख्याल गायकी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। बाल्यकाल में ही माता-पिता की छत्रछाया उठ जाने के बावजूद उन्होंने अपनी लगन और असाधारण प्रतिभा के दम पर न केवल बनारस घराने का नाम रोशन किया, बल्कि पूरे देश को अपनी गायकी का अनुरागी बना दिया।
संगीत की विरासत और शुरुआती जीवन की कठिनाइयां
सिद्धेश्वरी देवी का जन्म 8 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुआ था। उनका परिवार पहले से ही संगीत विधा से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनकी दादी मैना देवी अपने जमाने की एक प्रतिष्ठित गायिका थीं। सिद्धेश्वरी जब बहुत छोटी थीं, तभी उनके माता-पिता का साया सिर से उठ गया। इसके बाद उनका लालन-पालन उनकी मौसी राजेश्वरी देवी ने किया, जो स्वयं संगीत की उत्तम समझ रखती थीं। बचपन के शुरुआती दिनों में सिद्धेश्वरी घर के छोटे-मोटे कामकाज और सफाई में हाथ बटाया करती थीं, जबकि उनकी मौसी की बेटी को घर पर संगीत की औपचारिक शिक्षा दी जाती थी।
एक अप्रत्याशित घटना और संगीत शिक्षा की शुरुआत
संगीत के क्षेत्र में सिद्धेश्वरी देवी का पदार्पण एक बेहद दिलचस्प मोड़ से हुआ। एक दिन जब उनकी मौसी की बेटी अभ्यास के दौरान एक कठिन धुन नहीं साध पा रही थीं, तो उनके शिक्षक प्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित सियाजी महाराज अत्यधिक व्यथित हो गए। उसी समय पास में काम कर रहीं बालिका सिद्धेश्वरी ने बिना किसी पूर्व तैयारी के उस जटिल धुन को बेहद सहजता और सुरीले अंदाज में गाकर सुना दिया। इस अद्भुत स्वर ज्ञान को देखकर पंडित सियाजी महाराज अचंभित रह गए और उन्होंने तुरंत सिद्धेश्वरी को नि:शुल्क संगीत सिखाने का संकल्प लिया।
पंडित सियाजी महाराज से शुरुआती तालीम लेने के उपरांत सिद्धेश्वरी देवी ने उस्ताद राजब अली खान तथा उस्ताद इनायत खान जैसे शीर्ष दिग्गजों से भी संगीत के गूढ़ रहस्य सीखे। इन सभी के बावजूद वह पंडित बड़े रामदास को अपना मुख्य गुरु मानती थीं और उन्हीं के मार्गदर्शन को अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानती रहीं।
ठुमरी की मिठास और बनारस घराने का प्रभाव
सिद्धेश्वरी देवी की गायकी में बनारस घराने की सहज मिठास, भावपूर्णता और आत्मा को छू लेने वाली गहराई झलकती थी। उन्हें विशेष रूप से ठुमरी गायिका के रूप में सर्वोच्च ख्याति प्राप्त हुई। ठुमरी गायन में केवल सुरों का तालमेल ही नहीं, बल्कि शब्दों में छिपे प्रेम, विरह, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सिद्धेश्वरी देवी अपनी सुरीली आवाज से इन सभी भावनाओं को जीवंत कर देती थीं। ठुमरी के अतिरिक्त उन्होंने ख्याल, दादरा, कजरी, चैती, होरी तथा भजनों में भी अद्वितीय महारत हासिल की।
लाहौर का ऐतिहासिक किस्सा जब केएल सहगल बने प्रशंसक
सिद्धेश्वरी देवी के संगीतमय सफर का एक यादगार प्रसंग साल 1930 का है, जब वह एक संगीत कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के लिए लाहौर गई थीं। उस समय वहां उपस्थित अधिकांश श्रोता मुख्य रूप से विख्यात गायक केएल सहगल को सुनने के लिए एकत्र हुए थे। जब मंच से एक नवोदित गायिका के रूप में सिद्धेश्वरी देवी के नाम की घोषणा की गई, तो दर्शकों में कोई विशेष उत्साह नहीं दिखा। स्थिति को भांपकर केएल सहगल स्वयं मंच पर आए और उन्होंने श्रोताओं से विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि वे सिद्धेश्वरी देवी के गायन को एकाग्रचित्त होकर अवश्य सुनें। जब सिद्धेश्वरी देवी ने गाना शुरू किया, तो पूरा प्रेक्षागृह उनकी सुरम्य आवाज के जादू में बंध गया और कार्यक्रम के अंत में दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया।
राष्ट्रीय प्रसिद्धि, एमएस सुब्बुलक्ष्मी का मार्गदर्शन और सर्वोच्च सम्मान
समय के साथ सिद्धेश्वरी देवी की ख्याति देश के कोने-कोने में फैल गई। उन्होंने राजघरानों के दरबारों से लेकर देश के प्रतिष्ठित संगीत समारोहों तक में अपनी कला का प्रदर्शन किया। वह ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के माध्यम से भी नियमित रूप से देशभर के संगीत प्रेमियों तक पहुंचती थीं। उनके कार्यक्रमों का प्रसारण सुनने के लिए लोग देर रात तक रेडियो के पास बैठा करते थे। दक्षिण भारत की प्रख्यात गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी सिद्धेश्वरी देवी से भजन गायन की सूक्ष्म बारीकियां सीखी थीं।
संगीत जगत में उनके अविस्मरणीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 1966 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया। इसी वर्ष उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें रविंद्र भारती विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी.लिट की उपाधि प्रदान की गई तथा विश्व भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें प्रतिष्ठित 'देशिकोत्तम' सम्मान से विभूषित किया।
अंतिम वर्ष और संगीत जगत को स्थायी क्षति
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सिद्धेश्वरी देवी का स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ने लगा था। साल 1976 में उन्हें लकवे का गंभीर दौरा पड़ा, जिससे उनका चलना-फिरना अत्यंत सीमित हो गया। आखिरकार 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में इस महान शास्त्रीय गायिका ने अंतिम सांस ली। भले ही आज सिद्धेश्वरी देवी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली तान और भावपूर्ण गायकी भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में सदा अमर रहेगी।



















