बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक धरोहर के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हालांकि, इस पावन भूमि की पहचान केवल जंगलों और कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र अदम्य साहस, वीरता और महान बलिदानों की ऐतिहासिक कहानियों से भी समृद्ध है। बस्तर के इतिहास की लोक स्मृति में ऐसी ही एक वीरांगना चमेली बाबी की गाथा दर्ज है, जिनकी देशभक्ति और स्वाभिमान की मिसाल आज भी स्थानीय लोकगीतों और कहानियों में पूरी श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है। हाल के दिनों में शासन द्वारा उनकी एक भव्य प्रतिमा स्थापित किए जाने से इस गौरवशाली बलिदान को सार्वजनिक पटल पर एक नई पहचान मिली है।
चक्रकोट का प्राचीन शासन और चमेली बाबी का सैन्य नेतृत्व
ऐतिहासिक मान्यताओं और वरिष्ठ पत्रकार अविनाश प्रसाद द्वारा उल्लिखित जनश्रुतियों के अनुसार, प्राचीन काल में जब चक्रकोट को बस्तर की राजधानी होने का गौरव प्राप्त था, तब वहां राजा हरिश्चंद्र का शासन हुआ करता था। चमेली बाबी, जिनका वास्तविक नाम चमेली देवी नाग था, राजा हरिश्चंद्र की सुपुत्री थीं। उन्हें क्षेत्र में अत्यंत प्रेम और सम्मान से चमेली बाबी कहा जाता था। राजकुमारी होने के साथ-साथ चमेली बाबी एक कुशल, साहसी और निडर योद्धा थीं। उन्हें राज्य की सेनापति का दायित्व सौंपा गया था, और वह पूरी निष्ठा के साथ चक्रकोट के सैन्य दल का नेतृत्व करती थीं।
शत्रु राजा की धमकी और युद्ध का शंखनाद
लोक कथाओं के अनुसार, उस दौर में एक पड़ोसी शत्रु राजा को सेनापति चमेली बाबी के अप्रतिम रूप और सौंदर्य की जानकारी मिली। उस राजा ने चक्रकोट के शासक राजा हरिश्चंद्र के दरबार में एक संदेशवाहक भेजकर विवाह का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उसने यह चेतावनी भी दी कि यदि विवाह का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया, तो उसकी सेना चक्रकोट पर भीषण आक्रमण कर देगी। जब यह संदेश चमेली बाबी तक पहुंचा, तो उन्होंने शत्रु की इस गीदड़ भभकी के आगे सिर झुकाने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने दृढ़ता से संदेश दिया कि यदि शत्रु युद्ध चाहता है तो वह बेझिझक आक्रमण करे, लेकिन स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं होगा। इसके तुरंत बाद शत्रु सेना ने चक्रकोट राज्य पर हमला बोल दिया।
इंद्रावती नदी तट पर सर्वोच्च बलिदान
आक्रमण के बाद चक्रकोट की सेना ने अपनी सेनापति चमेली बाबी के नेतृत्व में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए शत्रु का मुकाबला किया। हालांकि, शत्रु सैनिकों की संख्या चक्रकोट की सेना की तुलना में काफी अधिक थी। कई दिनों तक चले घमासान युद्ध के बाद चक्रकोट के सैनिक धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे। जब चमेली बाबी को यह स्पष्ट आभास हो गया कि अब सैन्य बल के आधार पर शत्रु का मुकाबला करना असंभव है और पराजय के बाद आत्मसम्मान पर आंच आ सकती है, तब उन्होंने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होंने राजमहल के समीप बहने वाली इंद्रावती नदी के किनारे जाकर अग्निदाह कर लिया और अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।
लोक स्मृति में अमरता और प्रतिमा की स्थापना
सेनापति चमेली बाबी का यह अभूतपूर्व त्याग और पराक्रम आज भी बस्तर की लोक संस्कृति और जनमानस में रचा-बसा है। बस्तर के इतिहास में उनका नाम एक अमर महिला योद्धा के रूप में अंकित है। हाल ही में राज्य सरकार की ओर से चमेली बाबी की प्रतिमा स्थापित की गई है। इस कदम से न केवल नई पीढ़ी को अपनी वीरांगना के शौर्य से परिचित होने का अवसर मिला है, बल्कि बस्तर की इस गौरव गाथा को एक बार फिर व्यापक स्तर पर पहचान और सम्मान प्राप्त हुआ है।



















