उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर जौनपुर में तैयार होने वाला चमेली का पारंपरिक इत्र सदियों से अपनी बेमिसाल प्राकृतिक खुशबू के लिए प्रसिद्ध है। इस प्राचीन कला को आज भी सहेजे हुए हैं इत्र कारोबारी मोहम्मद मुस्तफा जकरिया, जो अपनी पारिवारिक विरासत की सातवीं पीढ़ी के रूप में इस कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। आज के आधुनिक दौर में जहां अधिकांश सुगंधित उत्पाद रासायनिक प्रक्रियाओं से बनाए जाते हैं, वहीं जौनपुर में आज भी उसी सदियों पुरानी पारंपरिक पद्धति का पालन किया जा रहा है जिसे मुस्तफा जकरिया के पूर्वज इस्तेमाल करते थे। यह इत्र केवल एक सुगंधित उत्पाद नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक कारीगरी का प्रतीक भी है।
प्राकृतिक सामग्री और 20 दिनों की विशेष प्रक्रिया
चमेली के इत्र की सबसे बड़ी खासियत इसकी शत-प्रतिशत प्राकृतिक गुणवत्ता है। इसे तैयार करने के लिए किसी भी तरह के कृत्रिम रसायन का उपयोग नहीं किया जाता। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत तड़के चुने गए चमेली के ताजे फूलों और गुणवत्तापूर्ण बेस ऑयल के संयोजन से होती है। इन फूलों को एक विशेष पारंपरिक विधि के तहत बेस ऑयल में समाहित किया जाता है। इसके बाद इस मिश्रण को प्राकृतिक रूप से पकने के लिए 15 से 20 दिनों तक धूप में रखा जाता है। सूर्य की रोशनी में धीरे-धीरे तैयार होने की इसी प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण इत्र में फूलों का असली रस और महक पूरी तरह रच-बस जाती है।
इस अनूठी निर्माण विधि के कारण ही जौनपुर के इस इत्र की महक बेहद टिकाऊ होती है। जब इसे कपड़ों पर लगाया जाता है, तो इसकी खुशबू दो से चार दिनों तक लगातार बनी रहती है। यही कारण है कि प्रामाणिक और प्राकृतिक इत्र के शौकीन लोग आज भी इसे बेहद पसंद करते हैं और दूर-दूर से इसकी मांग करते हैं।
राजभवन से लेकर महानगरों तक फैली इत्र की मांग
जौनपुर में निर्मित इस प्राकृतिक चमेली इत्र की ख्याति अब केवल स्थानीय बाजार या उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं रह गई है। देश के विभिन्न हिस्सों से इसके पारखी ऑर्डर भेजते हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र के मुंबई, तेलंगाना के हैदराबाद और गुजरात के राजकोट जैसे प्रमुख व्यापारिक व सांस्कृतिक शहरों में इसकी नियमित आपूर्ति की जाती है।
इतना ही नहीं, इस इत्र की पहुंच उच्च प्रशासनिक और राजकीय गलियारों तक भी है। हाल ही में प्रदेश की राज्यपाल के लिए भी जौनपुर से यह विशेष इत्र भिजवाया गया था। इसके अतिरिक्त, पूर्वांचल विश्वविद्यालय के आयोजनों तथा राज्य सरकार के विभिन्न औपचारिक कार्यक्रमों व सम्मेलनों में इस पारंपरिक चमेली इत्र की विशेष मांग रहती है, जिससे इसकी प्रतिष्ठा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
उत्पादन की चुनौतियां और वैश्विक मंच की उम्मीद
इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के बावजूद, इस पारंपरिक उद्योग को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या कच्चे माल यानी ताजे फूलों की उपलब्धता में कमी आना है। क्षेत्र में चमेली की खेती का दायरा लगातार घटने के कारण इत्र निर्माताओं को पर्याप्त मात्रा में फूल नहीं मिल पा रहे हैं। कच्चे माल की इस किल्लत की वजह से इत्र का कुल उत्पादन काफी घट गया है, जबकि निर्माण लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। लागत बढ़ने के कारण इत्र के बाजार भाव में भी पहले की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई है।
इन समस्याओं के बीच एक सकारात्मक पहलू यह भी उभरकर सामने आया है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से नई पीढ़ी इस पारंपरिक कला के बारे में जागरूक हो रही है। युवा वर्ग जौनपुर के चमेली इत्र के इतिहास और इसकी प्राकृतिक प्रामाणिकता को समझकर इसकी ओर आकर्षित हो रहा है। मुस्तफा जकरिया का मानना है कि यदि राज्य सरकार इस ऐतिहासिक हस्तशिल्प उद्योग को संस्थागत प्रोत्साहन प्रदान करे और देश-विदेश के व्यापारिक मेलों में इसका प्रचार-प्रसार करे, तो जौनपुर का यह चमेली इत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर सकता है।



















