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एक किलो सोने से सजा बीकानेर का यह ताजिया, 22 साल की कारीगरी ने गढ़ी अनमोल विरासतकल्चर
3 घंटे पहले· 2

एक किलो सोने से सजा बीकानेर का यह ताजिया, 22 साल की कारीगरी ने गढ़ी अनमोल विरासत

बीकानेर के मोहल्ला उस्तान में तैयार होने वाला स्वर्ण ताजिया पूरी तरह सोने की परत और उस्ता कला की नक्काशी से सजा है, जिसे देखने हर साल दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

Karan MalhotraKaran MalhotraCrime Correspondent 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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मुहर्रम के मौके पर देशभर में तरह-तरह के ताजिये बनते और निकाले जाते हैं, लेकिन बीकानेर का एक ताजिया अपनी बेमिसाल कारीगरी और भव्यता की वजह से बाकी सबसे अलग खड़ा नजर आता है। शहर के मोहल्ला उस्तान में तैयार होने वाला यह खास ताजिया पूरी तरह सोने की परत और उस्ता कला की महीन नक्काशी से सजा हुआ है। इसी खूबसूरती को देखने के लिए हर साल बीकानेर ही नहीं, बल्कि राजस्थान और देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।

बीकानेर में मुहर्रम के दौरान सूखे मेवे, मोम, कांच, मिट्टी, रूई, लोहे और चूड़ियों से बने ताजिये भी देखने को मिलते हैं। लेकिन पूरे ढांचे पर सोने की परत और उस्ता कला की नक्काशी वाला यह स्वर्ण ताजिया अपनी तरह का इकलौता नमूना है।

एक किलो सोना और लाखों की कीमत

करीब 12 फीट ऊंचे और 6 फीट चौड़े इस ताजिये की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके ऊपर से लेकर नीचे तक उस्ता कला की सुनहरी कलम का काम किया गया है। कलाकारों के मुताबिक इसमें करीब एक किलो सोने का इस्तेमाल हुआ है, और सोने से सजे इस ताजिये की कीमत लाखों रुपये आंकी जाती है। इसकी भव्यता और कलात्मकता इसे भारत के सबसे अनूठे ताजियों की कतार में ला खड़ा करती है।

अरबी और उर्दू में दर्ज हैं कर्बला की दास्तानें

ताजिये पर पवित्र कुरान की आयतें और कर्बला की ऐतिहासिक घटनाओं का ब्योरा अरबी और उर्दू भाषा में बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। उस्ता कला की बारीक नक्काशी की वजह से इसका हर हिस्सा किसी कलाकृति जैसा दिखता है। रातभर की सजावट और आखिरी तैयारियों के बाद जब इसे मोहल्ले में लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है, तो इसकी सुनहरी चमक हर किसी को अपनी ओर खींच लेती है।

गत्ते के ताजिये से सोने तक का सफर

उस्ता कलाकार मोहम्मद हनीफ उस्ता बताते हैं कि पहले मोहल्ला उस्तान में हर साल गत्ते का ताजिया बनाया जाता था। समय के साथ मोहल्ले के बुजुर्गों और कलाकारों ने सोचा कि जब यहां विश्वप्रसिद्ध उस्ता कला के कलाकार मौजूद हैं, तो ताजिये को भी इसी कला से एक स्थायी रूप दे दिया जाए। इसी सोच के साथ करीब 22 साल पहले इस ताजिये पर सुनहरी कलम का काम शुरू हुआ। तब से लेकर आज तक हर साल इसकी देखरेख, मरम्मत और सजावट का काम जारी है।

पहले मिट्टी का उभार, फिर सोने का वर्क

इसे बनाने में उस्ता कला की पारंपरिक तकनीक अपनाई जाती है। सबसे पहले मिट्टी से उभरा हुआ यानी एम्बोस काम किया जाता है, और उसके बाद उस पर सोने के वर्क चिपकाए जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल और वक्त लेने वाली होती है। कलाकारों के मुताबिक इस तरह का ताजिया तैयार करने में कई साल लग जाते हैं, जबकि हर साल इसकी सजावट और रखरखाव में भी लंबा समय खर्च होता है।

कर्बला के रौजे से ली गई प्रेरणा

इस ताजिये की डिजाइन इराक के पवित्र शहर कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे से प्रेरित है। कलाकारों ने उस पवित्र स्थल की वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए इसका ढांचा तैयार किया है। यही वजह है कि इसे श्रद्धा और कला का अद्भुत संगम माना जाता है। इस स्थायी ताजिये की एक और खास बात यह है कि हर साल इस पर हाथ से बनी नई कागजी जालियां लगाई जाती हैं। इन जालियों को कलाकार खुद काटकर तैयार करते हैं और हर बार उन्हें नया डिजाइन देते हैं। रंगों और सजावट में बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान को भी खास तौर पर उभारा जाता है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: मुहर्रम पर देश के अलग-अलग हिस्सों के अनोखे ताजियों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह कारीगरी और परंपरा का बेजोड़ उदाहरण है।
  • बीकानेर में: मोहल्ला उस्तान में रखा गया यह स्वर्ण ताजिया हर साल दर्शन के लिए खुलता है, जहां स्थानीय लोग और पर्यटक इसकी सुनहरी नक्काशी को करीब से देख सकते हैं।

सवाल-जवाब

बीकानेर का स्वर्ण ताजिया कहां तैयार किया जाता है?
यह ताजिया बीकानेर शहर के मोहल्ला उस्तान में तैयार किया जाता है।
इस ताजिये में कितना सोना इस्तेमाल हुआ है?
कलाकारों के मुताबिक इस ताजिये पर करीब एक किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है और इसकी कीमत लाखों रुपये आंकी जाती है।
ताजिये का आकार कितना बड़ा है?
यह ताजिया करीब 12 फीट ऊंचा और 6 फीट चौड़ा है।
इस ताजिये पर सुनहरी कलम का काम कब शुरू हुआ?
करीब 22 साल पहले इस ताजिये पर सुनहरी कलम का काम शुरू किया गया था, उससे पहले यहां गत्ते का ताजिया बनता था।
ताजिये की डिजाइन किससे प्रेरित है?
इसकी डिजाइन इराक के पवित्र शहर कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे से प्रेरित है।
इसे बनाने में कौन सी तकनीक अपनाई जाती है?
इसमें उस्ता कला की पारंपरिक तकनीक अपनाई जाती है, जिसमें पहले मिट्टी से उभरा हुआ एम्बोस काम होता है और फिर उस पर सोने के वर्क चिपकाए जाते हैं।
#कल्चर#स्वर्णताजिया#बीकानेर#मुहर्रम#उस्ताकला#मोहल्लाउस्तान#कर्बला#ताजिया

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