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हैदराबाद के चारमीनार पर बिल्ली और चूहे की नक्काशी का क्या है रहस्यकल्चर
19 सित॰ 2026, 11:58 am (36 मिनट पहले)· 0

हैदराबाद के चारमीनार पर बिल्ली और चूहे की नक्काशी का क्या है रहस्य

चारमीनार की मेहराब पर तराशी गई बिल्ली और चूहे की गुप्त आकृति 1591 के उस दौर की याद दिलाती है जब शहर को प्लेग से मुक्ति मिली थी।

हैदराबाद के ऐतिहासिक केंद्र में स्थित चारमीनार अपनी बेमिसाल वास्तुकला, विशाल मेहराबों और चार गगनचुंबी मीनारों के दम पर पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। ग्रेनाइट, चूने और गारे के मिश्रण से तैयार किए गए इस स्मारक का वजूद 430 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। ज्यादातर लोग इसकी बनावट और भव्यता देखने आते हैं, लेकिन इस प्रतिष्ठित ढांचे की बारीक नक्काशी में एक ऐसा रहस्य छुपा है जिस पर आम पर्यटकों की नजर मुश्किल से पड़ती है। इस्लामी और फारसी शिल्पकला के तहत बने इस स्मारक के विशाल मेहराबों के पास एक बिल्ली और चूहे की आकृति पत्थरों में बहुत बारीकी से उकेरी गई है।

मेहराब के जोड़ पर उकेरी गई दुर्लभ नक्काशी

चारमीनार के पूर्वी मेहराब की छत और दीवार के मिलन स्थल को गौर से निहारने पर पत्थर में तराशी गई यह बिल्ली साफ तौर पर दिखाई देती है। इतिहास के जानकार शाहिद उमेर का कहना है कि किसी भी इस्लामी स्मारक में आमतौर पर ज्यामितीय रचनाएं, अरबी सुलेख या फूल-पत्तियों के बेलबूटे ही तराशे जाते हैं। ऐसे पारंपरिक परिवेश के बीच किसी जानवर का चेहरा पत्थरों में उकेरना अपने आप में बेहद असाधारण और चौंकाने वाला शिल्प माना जाता है। स्थानीय बुजुर्ग शमीक खान इस बनावट को हैदराबाद के जन्म और चारमीनार की स्थापना की मूल वजह से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ बताते हैं।

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1591 की प्लेग महामारी और सुल्तान का संकल्प

इस अद्भुत नक्काशी की जड़ें 1591 के उस भीषण संकट काल में छिपी हैं जब गोलकोंडा रियासत पर कुतुब शाही वंश के पांचवें शासक, मुहम्मद कुली कुतुब शाह की हुकूमत थी। उस दौर में पूरे इलाके के भीतर चूहों और उनके पिस्सुओं से फूटने वाले प्लेग का कहर टूट पड़ा था, जिसने हजारों मासूम जिंदगियों को पलक झपकते ही लील लिया था। उस खौफनाक मंजर को देखकर सुल्तान ने खुदा से मिन्नत मांगी थी कि यदि उनकी अवाम को इस संक्रामक बीमारी से नजात मिल जाती है, तो वे उसी जगह एक यादगार और आलीशान इमारत खड़ी करेंगे। जैसे ही शहर से प्लेग का खौफ खत्म हुआ और लोगों को नया जीवन मिला, सुल्तान ने अपनी प्रतिज्ञा का सम्मान करते हुए चारमीनार के निर्माण का हुक्म जारी किया।

महामारी पर जीत और चूहों के खात्मे का प्रतीक

चूहों के जरिए फैलने वाले इस जानलेवा संक्रमण के उन्मूलन में बिल्लियों की स्वाभाविक शिकारी भूमिका को उस समय बहुत अहम माना जाता था। उस जमाने के वास्तुकारों और दस्तकारों ने इसी प्राकृतिक संतुलन और राहत के पलों को पत्थरों में हमेशा के लिए तराशने का निर्णय लिया। पत्थरों पर मौजूद यह कलाकृति किसी अंधविश्वास या टोटके की उपज नहीं है, बल्कि हैदराबाद को प्लेग जैसी घातक महामारी से छुटकारा मिलने और चूहों के संहार का एक प्रतीकात्मक चित्रण है। सदियों बीत जाने के बाद भी यह मौन आकृति शहर के सबसे त्रासद दौर और उस पर नागरिकों की विजय की अनोखी दास्तान बयां करती है।

सवाल-जवाब

चारमीनार का निर्माण किस सुल्तान ने और कब करवाया था?
चारमीनार की नींव साल 1591 में गोलकोंडा के कुतुब शाही वंश के पांचवें सुल्तान, मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने रखी थी।
चारमीनार के पत्थरों में बिल्ली की आकृति कहां स्थित है?
यह आकृति चारमीनार के पूर्वी मेहराब की छत और मेहराब के जोड़ वाले पत्थर पर तराशी गई है।
चारमीनार में बिल्ली का चेहरा तराशने की मुख्य वजह क्या थी?
यह 1591 में प्लेग फैलाने वाले चूहों के खात्मे और महामारी से मुक्ति की ऐतिहासिक घटना का एक सांकेतिक प्रतीक है।
चारमीनार किन निर्माण सामग्रियों से मिलकर बनी है?
चारमीनार का निर्माण ग्रेनाइट के पत्थरों, चूने और गारे के मिश्रण से किया गया है।
सुल्तान ने चारमीनार बनवाने की मन्नत क्यों मांगी थी?
सुल्तान ने प्रार्थना की थी कि यदि उनकी प्रजा प्लेग की घातक बीमारी से मुक्त हो जाती है, तो वे उसी स्थान पर एक भव्य स्मारक बनवाएंगे।
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