हैदराबाद के ऐतिहासिक केंद्र में स्थित चारमीनार अपनी बेमिसाल वास्तुकला, विशाल मेहराबों और चार गगनचुंबी मीनारों के दम पर पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। ग्रेनाइट, चूने और गारे के मिश्रण से तैयार किए गए इस स्मारक का वजूद 430 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। ज्यादातर लोग इसकी बनावट और भव्यता देखने आते हैं, लेकिन इस प्रतिष्ठित ढांचे की बारीक नक्काशी में एक ऐसा रहस्य छुपा है जिस पर आम पर्यटकों की नजर मुश्किल से पड़ती है। इस्लामी और फारसी शिल्पकला के तहत बने इस स्मारक के विशाल मेहराबों के पास एक बिल्ली और चूहे की आकृति पत्थरों में बहुत बारीकी से उकेरी गई है।
मेहराब के जोड़ पर उकेरी गई दुर्लभ नक्काशी
चारमीनार के पूर्वी मेहराब की छत और दीवार के मिलन स्थल को गौर से निहारने पर पत्थर में तराशी गई यह बिल्ली साफ तौर पर दिखाई देती है। इतिहास के जानकार शाहिद उमेर का कहना है कि किसी भी इस्लामी स्मारक में आमतौर पर ज्यामितीय रचनाएं, अरबी सुलेख या फूल-पत्तियों के बेलबूटे ही तराशे जाते हैं। ऐसे पारंपरिक परिवेश के बीच किसी जानवर का चेहरा पत्थरों में उकेरना अपने आप में बेहद असाधारण और चौंकाने वाला शिल्प माना जाता है। स्थानीय बुजुर्ग शमीक खान इस बनावट को हैदराबाद के जन्म और चारमीनार की स्थापना की मूल वजह से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ बताते हैं।
1591 की प्लेग महामारी और सुल्तान का संकल्प
इस अद्भुत नक्काशी की जड़ें 1591 के उस भीषण संकट काल में छिपी हैं जब गोलकोंडा रियासत पर कुतुब शाही वंश के पांचवें शासक, मुहम्मद कुली कुतुब शाह की हुकूमत थी। उस दौर में पूरे इलाके के भीतर चूहों और उनके पिस्सुओं से फूटने वाले प्लेग का कहर टूट पड़ा था, जिसने हजारों मासूम जिंदगियों को पलक झपकते ही लील लिया था। उस खौफनाक मंजर को देखकर सुल्तान ने खुदा से मिन्नत मांगी थी कि यदि उनकी अवाम को इस संक्रामक बीमारी से नजात मिल जाती है, तो वे उसी जगह एक यादगार और आलीशान इमारत खड़ी करेंगे। जैसे ही शहर से प्लेग का खौफ खत्म हुआ और लोगों को नया जीवन मिला, सुल्तान ने अपनी प्रतिज्ञा का सम्मान करते हुए चारमीनार के निर्माण का हुक्म जारी किया।
महामारी पर जीत और चूहों के खात्मे का प्रतीक
चूहों के जरिए फैलने वाले इस जानलेवा संक्रमण के उन्मूलन में बिल्लियों की स्वाभाविक शिकारी भूमिका को उस समय बहुत अहम माना जाता था। उस जमाने के वास्तुकारों और दस्तकारों ने इसी प्राकृतिक संतुलन और राहत के पलों को पत्थरों में हमेशा के लिए तराशने का निर्णय लिया। पत्थरों पर मौजूद यह कलाकृति किसी अंधविश्वास या टोटके की उपज नहीं है, बल्कि हैदराबाद को प्लेग जैसी घातक महामारी से छुटकारा मिलने और चूहों के संहार का एक प्रतीकात्मक चित्रण है। सदियों बीत जाने के बाद भी यह मौन आकृति शहर के सबसे त्रासद दौर और उस पर नागरिकों की विजय की अनोखी दास्तान बयां करती है।



















