हैदराबाद में गणेश विसर्जन के संपन्न होने के साथ ही पूरा शहर धीरे-धीरे अपनी पुरानी रफ्तार में लौट रहा है। लोग बप्पा को विदा कर अपने दैनिक कामकाज में व्यस्त हो गए हैं, लेकिन इस बीच शहर के ऐतिहासिक इलाके धूलपेट का नजारा पूरी तरह बदल चुका है। कभी चौबीसों घंटे हलचल से सराबोर रहने वाले इस इलाके में अब एक अजीब सी खामोशी छा गई है। कुछ दिनों पहले तक जहां हर गली और वर्कशॉप पर हथौड़े की गूंज, वेल्डिंग की चमक और रंगों की खुशबू बिखरी रहती थी, वहां अब केवल सूने शेड और पसरा हुआ सन्नाटा ही दिखाई दे रहा है।
धूलपेट के मूर्तिकार बेहद भारी मन से अपनी दुकानों और कार्यशालाओं से औजारों को समेट रहे हैं। उनका कहना है कि बप्पा के विसर्जन के बाद अचानक इस पूरे इलाके की रौनक गायब हो जाती है। महीनों तक जिस जगह पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी, वहां अचानक इतना खालीपन देखना कलाकारों को भीतर से उदास कर देता है।
छह महीनों की अनवरत मेहनत और कला साधना
धूलपेट में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह उनकी आजीविका का मुख्य साधन और उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। इस बड़े उत्सव की तैयारियां यहां त्योहार से लगभग छह महीने पहले ही शुरू हो जाती हैं। इन महीनों में धूलपेट के वर्कशॉप दिन-रात चालू रहते हैं और कारीगर पूरी लगन से मूर्तियों को आकार देने में जुट जाते हैं।
एक भव्य मूर्ति को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। इसमें मिट्टी तैयार करना, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) का मिश्रण बनाना, लोहे के मजबूत ढांचे तैयार करना, मोल्डिंग, वेल्डिंग और फिर बारीक नक्काशी करना शामिल है। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील काम होता है बप्पा की आंखें तैयार करना, जिसमें मूर्तिकार अपनी पूरी कलात्मकता झोंक देते हैं। इन छह महीनों के दौरान कारीगरों के लिए दिन और रात का अंतर पूरी तरह मिट जाता है।
कलाकृति से पूजनीय प्रतिमा बनने का सफर
स्थानीय मूर्तिकारों के अनुसार, एक-एक मूर्ति को तैयार करने के पीछे उनका खून-पसीना और कई रातों की नींद छिपी होती है। जब तक ये मूर्तियां वर्कशॉप में तैयार होती रहती हैं, तक धूलपेट का माहौल एक अलग ही सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता है। देश-विदेश और दूर-दराज के क्षेत्रों से पूजा समितियों के आयोजक और श्रद्धालु यहां मूर्तियों की बुकिंग के लिए आते हैं, जिससे यहां हमेशा चहल-पहल बनी रहती है।
लेकिन उत्सव की शुरुआत होते ही यह नजारा बदल जाता है। जैसे ही मूर्तियां ट्रकों पर लादकर विसर्जन और पंडालों के लिए रवाना की जाती हैं, मूर्तिकारों का काम पूरा हो जाता है। कल तक जो मूर्तियां इन कलाकारों के हाथों की कला और कड़ी मेहनत का हिस्सा थीं, वे पंडालों में स्थापित होते ही लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बन जाती हैं।
हर साल दोहराई जाने वाली सन्नाटे की कहानी
त्योहार के खत्म होते ही धूलपेट की रफ्तार अचानक थम सी जाती है। अब वर्कशॉप के भीतर केवल बिखरे हुए रंगों के डिब्बे, खाली बोरियां और शांत पड़े औजार ही नजर आते हैं। जो हाथ पिछले छह महीनों से लगातार मिट्टी को तराशने में व्यस्त थे, वे अब खाली हो चुके हैं। धूलपेट का यह खालीपन हर साल की एक तय कहानी है, जहां छह महीने की लगातार कठिन मेहनत और कुछ दिनों की भारी चहल-पहल के बाद, कारीगरों को अगले साल बप्पा के आगमन तक एक लंबा इंतजार करना पड़ता है।



















