तेलंगाना के घने वन्य अंचलों में जीवन यापन करने वाले प्राचीन आदिवासी समाजों का खान-पान सदैव प्रकृति और लोक विज्ञान के अद्भुत तालमेल पर आधारित रहा है। आदिलाबाद, मुलुगु, भद्राद्री कोत्तागुडेम तथा जयशंकर भूपालपल्ली के सघन वनों में बसे कोया एवं गोंड समुदाय के पास जंगलों से जुड़े पोषण और व्यंजनों का एक समृद्ध पारंपरिक भंडार रहा है। इसी परंपरा का एक अत्यंत विशिष्ट और पोषक हिस्सा आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों से तैयार होने वाली अंबली है। यह अनोखा व्यंजन कभी घोर संकट के समय आदिवासियों के लिए प्राणरक्षक भोजन का आधार हुआ करता था, परंतु बदलते खान-पान और आधुनिक जीवनशैली के चलते यह पारंपरिक धरोहर अब विस्मृति की कगार पर पहुंच चुकी है। नई पीढ़ी इस प्राचीन व्यंजन की निर्माण विधि और इसके औषधीय महत्व से लगभग पूरी तरह अनभिज्ञ होती जा रही है।
अकाल और मानसूनी संकट में जीवन रक्षक आहार का सहारा
आदिवासी क्षेत्रों के वरिष्ठ बुजुर्गों के अनुसार, बीते दशकों में जब जंगलों में मानसूनी वर्षा भीषण रूप ले लेती थी अथवा कभी गंभीर सूखे के कारण अन्न की भारी किल्लत हो जाती थी, तब बाहरी दुनिया से अनाज या राशन वनों तक पहुंचना असंभव हो जाता था। ऐसे विकट हालातों में आदिवासी परिवार केवल वन संपदा पर आश्रित रहते थे, जिसमें कंदमूल, पत्ते और अनेक प्रकार के बीज शामिल होते थे। गर्मी के दिनों में खाए जाने वाले आमों की गुठलियों को ग्रामीण बेकार फेंकने के बजाय बड़ी सावधानी से एकत्रित कर लेते थे। इन गुठलियों को चिलचिलाती धूप में भली-भांति सुखाया जाता था और फिर वर्ष भर के लिए बर्तनों में सुरक्षित रख दिया जाता था। जब वर्षा ऋतु या भुखमरी के दिनों में अनाज का दाना मिलना मुश्किल होता था, तब यही सूखी गुठलियां आदिवासियों के लिए जीवन रक्षक आहार का रूप ले लेती थीं।
कड़वापन दूर करने की श्रमसाध्य और वैज्ञानिक विधि
सूखी गुठली से अंबली तैयार करने की पूरी विधि बेहद श्रमसाध्य, धैर्यपूर्ण और पारंपरिक वैज्ञानिक समझ से परिपूर्ण होती है। सबसे पहले धूप में अच्छी तरह सुखाई गई गुठलियों को पत्थरों या भारी मूसल के प्रहार से तोड़ा जाता है, ताकि उनके भीतर मौजूद सफेद गिरी निकाली जा सके। इसके बाद लकड़ी की पारंपरिक ओखली में इस गिरी को कूटकर महीन चूर्ण बनाया जाता है और फिर बारीक छलनी से छानकर आटा तैयार किया जाता है। चूंकि आम की गिरी में प्राकृतिक कसैलापन और तीखा कड़वापन बहुत अधिक होता है, इसलिए इसे समाप्त करने के लिए एक नायाब पारंपरिक तरकीब अपनाई जाती है। आटे के ऊपर जलता हुआ कोयला रखा जाता है और उसे बांस की विशेष टोकरी में रखकर किसी पहाड़ी झरने अथवा प्राकृतिक बहते नाले के शीतल जल में लगभग 3 घंटे के लिए डुबो दिया जाता है। बहते पानी का सतत प्रवाह गुठली के सारे कसैलेपन और विषैले कड़वे तत्वों को पूरी तरह बहाकर साफ कर देता है।
मिट्टी के बर्तनों में दुर्लभ जंगली दाल के साथ पकाई
कड़वापन पूर्णतः निकल जाने के बाद जल से भीगे इस शुद्ध आटे को पकाने का चरण आरंभ होता है। इसके लिए मिट्टी की पारंपरिक हांडी में जंगल से लाई गई दुर्लभ जंगली दाल को जल के साथ धीमी आंच पर उबाला जाता है। दाल जब पूरी तरह गलकर पक जाती है, तब उसमें कड़वाहट रहित गीला आटा धीरे-धीरे मिलाया जाता है। इसके पश्चात मिट्टी के पात्र में इसे धीमी आंच पर लंबे समय तक पकाया और घोटकर एकसार किया जाता है। इस सघन प्रक्रिया के उपरांत एक अत्यंत गाढ़ी, पौष्टिक, सुपाच्य और स्वादिष्ट अंबली बनकर तैयार होती है। यह आहार केवल पेट की भूख ही शांत नहीं करता था, बल्कि प्रतिकूल मौसम में शरीर को भरपूर स्फूर्ति, ऊर्जा और रोगों से लड़ने की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता भी प्रदान करता था।
आधुनिक जीवनशैली और सरकारी योजनाओं के बीच विलुप्त होती धरोहर
आज के परिवेश में सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली के जरिए राशन की सुलभता और बाजार में मिलने वाले रेडीमेड खाद्यान्नों के चलते युवा पीढ़ी इस जटिल व्यंजन को बनाने के कौशल से दूर होती जा रही है। सदियों से जंगलों के बीच विकसित यह अद्भुत ज्ञान अब केवल वयोवृद्ध आदिवासियों की स्मृतियों और कुछ बेहद दुर्गम बस्तियों तक ही सिमट कर रह गया है। यदि आदिवासी खाद्य संस्कृति की इस अनुपम विधा को सहेजने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो प्रकृति से जुड़ा यह प्राचीन विज्ञान आने वाले समय में इतिहास का केवल एक छोटा सा अध्याय बनकर रह जाएगा।



















