राजस्थान के पाली जिले स्थित उदयपुरिया बाजार में कपड़ा रंगाई का पारंपरिक हुनर आज भी पूरी शान से सांस ले रहा है। आधुनिक दौर की औद्योगिक तकनीकों के बावजूद यहां का रंगरेज समाज पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक पद्धतियों से ही कपड़ों को निखारता है। शादी-ब्याह का सीजन हो या सांस्कृतिक उत्सव, इस बाजार के हुनरमंद कारीगरों की बनाई साफा पहनाई और लहरिया रंगाई की मांग देश के महानगरों से लेकर सात समंदर पार तक बनी हुई है।
सिगड़ी पर रंग पकाने का पारंपरिक गणित
उदयपुरिया बाजार की रंगाई कला की सबसे बड़ी खासियत इसकी पकाने की विधि है। यहां के कारीगर आज भी मिट्टी या लोहे की पारंपरिक सिगड़ी यानी अंगीठी का इस्तेमाल करते हैं। सिगड़ी पर बड़ा भगोला चढ़ाकर उसमें प्राकृतिक और पक्के रंगों का खास मिश्रण तैयार किया जाता है। रंगों को सही अनुपात में मिलाने के बाद सिगड़ी की हल्की आंच पर एक निश्चित तापमान तक पकाया जाता है। कारीगरों का मानना है कि धीमी आंच पर सही समय तक रंगों का पकना ही उनके स्थायित्व और बेमिसाल चमक का असली राज है।
बेरंग और पुराने कपड़ों को नया रूप देने की कला
पाली के इन रंगरेजों का हुनर केवल नए साफे या कपड़ों को रंगने तक ही सीमित नहीं है। इनकी सबसे बड़ी विशेषज्ञता पुराने, फीके पड़े और बेरंग हो चुके परिधानों को दोबारा नया जीवन देने में है। अपने खास रंग मिश्रण और अनुभव के दम पर ये कारीगर पुराने कपड़ों पर इस तरह रंग चढ़ाते हैं कि वे बिल्कुल नए कपड़े की भांति खिल उठते हैं। कपड़े की चमक और पक्के रंग की इसी खूबी के कारण देश-विदेश में बसे प्रवासी भारतीय भी अपने कपड़ों को दोबारा रंगवाने के लिए पाली के कारीगरों पर भरोसा जताते हैं।
शाही शादियों और बड़े इवेंट्स में विशेष बुलावा
बदलते वक्त के साथ भले ही अब उदयपुरिया बाजार में गिने-चुने परिवार ही इस पारंपरिक व्यवसाय को संभाले हुए हैं, लेकिन उनके हुनर की चमक और मांग आज भी कायम है। देश के प्रमुख महानगरों में आयोजित होने वाली हाई प्रोफाइल शादियों, शाही समारोहों और बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पाली के इन रंगरेजों को साफा बांधने और विशेष रंगाई कार्यों के लिए खास तौर पर आमंत्रित किया जाता है। अपनी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत और अनूठे हुनर के बल पर यह सीमित परिवार आज भी पाली के उदयपुरिया बाजार की ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं।



















