फैशन की दुनिया में ऊंची हील्स को आमतौर पर आधुनिक समय और पश्चिमी संस्कृति की देन माना जाता है। ज्यादातर लोगों का यही सोचना रहता है कि महिलाओं के लिए हील्स वाले सैंडल पहनने का चलन विदेश से आया है और समय के साथ यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि जिस फैशन को हम आज के दौर की आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा मानते हैं, उसके संकेत हमारे देश के प्राचीन इतिहास में सदियों पहले से मौजूद मिल सकते हैं?
इन दिनों इंटरनेट और इतिहासप्रेमियों के बीच एक बेहद अनोखी और दिलचस्प चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। यह पूरा मामला भारत के तेलंगाना राज्य में स्थित ऐतिहासिक और वास्तुकला के अद्भुत नमूने रामप्पा मंदिर से जुड़ा हुआ है। अपनी भव्य बनावट और नायाब मूर्तिकला के कारण दुनियाभर में अपनी पहचान रखने वाले इस यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की एक खास मूर्ति ने शोधकर्ताओं और इतिहासकारों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। इस मूर्ति को देखने के बाद अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या वास्तव में आज से 800 साल पहले भारत में लोग आधुनिक हील्स जैसे जूते-चप्पल पहनते थे?
तेलंगाना का यह प्राचीन मंदिर शुरुआती 13वीं शताब्दी का है, जिसका निर्माण कार्य साल 1213 ईस्वी में काकतीय राजवंश के शासनकाल के दौरान आरंभ हुआ था। इस मंदिर के खंभों और दीवारों पर की गई नक्काशी इतनी सूक्ष्म और जीवंत है कि देखने वाले हतप्रभ रह जाते हैं। मंदिर परिसर के एक कोने में उकेरी गई एक स्त्री की प्रतिमा इन दिनों सबसे ज्यादा आकर्षण और चर्चा का विषय बनी हुई है। इस खूबसूरत मूर्ति का बारीकी से निरीक्षण करने पर पता चलता है कि उस महिला ने पैरों में एक खास किस्म का उठा हुआ सोल वाला फुटवियर धारण कर रखा है, जो मौजूदा समय के प्लेटफॉर्म हील्स या हाई-हील्ड सैंडल से काफी हद तक मेल खाता है। इस तस्वीर के सामने आने के बाद कई लोगों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि भारत के निवासियों ने यूरोप में इस तरह के फैशन के लोकप्रिय होने से सदियों पहले ही ऐसे ऊंचे फुटवियर का उपयोग करना शुरू कर दिया था।
इस वायरल तस्वीर और इससे जुड़े दावों के सामने आने के बाद जानकारों और इतिहासकारों ने अपनी राय साझा की है। विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि केवल इस एक मूर्ति को देखकर यह मान लेना बिल्कुल भी सही नहीं होगा कि आज के दौर जैसी आधुनिक हाई हील्स की खोज सबसे पहले भारत में ही हुई थी। यह कलाकृति इस बात का पुख्ता प्रमाण नहीं मानी जा सकती कि उस प्राचीन काल में आज की तरह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके विशेष प्रकार के जूते-चप्पल तैयार किए जाते थे।
हालांकि, यह मूर्ति एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक सत्य को जरूर उजागर करती है। यह इस बात का ठोस सबूत जरूर है कि आज से आठ शताब्दी से भी अधिक समय पहले हमारे देश के काकतीय राजवंश के शिल्पकार अपने काम में कितने ज्यादा उन्नत और दक्ष थे। वे पहनावे, आभूषणों, नृत्य की विभिन्न मुद्राओं के साथ-साथ पैरों के पादत्राण या सैंडल तक की हर छोटी से छोटी डिजाइन को पत्थर पर जीवंत करने की कला में पूरी तरह माहिर थे। यह खोज हमें यह बात याद दिलाती है कि भारतीय इतिहास के पन्नों में अनगिनत ऐसे अनछुए पहलू और रहस्य दबे हुए हैं, जिनकी गहराई तक उतरना अभी बाकी है। रामप्पा मंदिर की यह अद्भुत मूर्ति इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि हमारी प्राचीन कला केवल धार्मिक आस्थाओं तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें उस दौर के सामाजिक रहन-सहन और लाइफस्टाइल की एक-एक बारीकी को बेहद सुंदरता के साथ संजोया गया था।



















