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मस्जिद, इमामबाड़ा और 16 कुएं: सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में छिपी है साढ़े आठ सौ साल पुरानी विरासतकल्चर
8 सित॰ 2026, 3:05 pm (50 दिन पहले)· 2

मस्जिद, इमामबाड़ा और 16 कुएं: सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में छिपी है साढ़े आठ सौ साल पुरानी विरासत

सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में साढ़े आठ सौ साल पुरानी जिनाती मस्जिद की दीवार पर आज भी अंग्रेजों के तोप के गोले से जुड़ा एक निशान मौजूद है, जिसके बगल में जर्जर इमामबाड़ा, 16 से ज्यादा पुराने कुएं और एक साईं कुटी भी हैं।

सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में एक ही जगह पर इतिहास की कई परतें एक साथ देखने को मिलती हैं, एक साढ़े आठ सौ साल पुरानी मस्जिद, उसके ठीक बगल में खंडहर बन चुका एक इमामबाड़ा, दर्जन भर से ज्यादा पुराने कुएं और एक साईं कुटी। इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा होती है जिनाती मस्जिद की, जिसकी बाहरी दीवार पर आज भी एक ऐसा गहरा निशान मौजूद है, जिसे इलाके के लोग अंग्रेजों के तोप के गोले से जोड़कर देखते हैं। यह निशान सिर्फ एक पुरानी इमारत का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि उस दौर की याद दिलाने वाला एक जिंदा सबूत भी है।

करीब 850 साल पुरानी है जिनाती मस्जिद

इलाके में इस मस्जिद को बोलचाल में बादशाही मस्जिद भी कहा जाता है। यह सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में स्थित है और यहां के निवासी इसे शहर की सबसे पुरानी पहचानों में गिनते हैं। जुबैर अहमद, जो कस्बा गांव के पूर्व प्रधान रह चुके हैं, बताते हैं कि इस मस्जिद की उम्र करीब साढ़े आठ सौ साल है। उनके मुताबिक इस मस्जिद को अंग्रेजी हुकूमत के दौर में कई तरह के उत्पीड़न और तकलीफों से गुजरना पड़ा, और बरसों के दौरान इसे कई बार नुकसान भी झेलना पड़ा, फिर भी लोगों की आस्था और इसका ऐतिहासिक दर्जा कभी कम नहीं हुआ। हाल के वर्षों में इस मस्जिद का नवीनीकरण भी कराया जा चुका है, ताकि यह इमारत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित बनी रहे। बुजुर्ग निवासियों के हवाले से इलाके का यह इतिहास पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है, और यही वजह है कि आज भी नई पीढ़ी को इस इमारत की अहमियत के बारे में जानकारी है।

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दीवार पर वह निशान, जिसे कहते हैं तोप के गोले का दाग

जिनाती मस्जिद की बाहरी दीवार पर एक गहरा निशान आज भी साफ देखा जा सकता है। इलाके के लोग दावा करते हैं कि यह निशान अंग्रेजी हुकूमत के दौरान मस्जिद पर दागे गए तोप के गोले की वजह से बना था। सालों बीत जाने के बावजूद यह निशान मिटा नहीं है, और हर बार जब कोई इसे करीब से देखता है तो उसे अनायास ही उस दौर की घटनाओं की याद आ जाती है। यही वजह है कि यह दीवार सिर्फ एक इमारत का हिस्सा नहीं रह गई है, बल्कि इलाके के लिए ब्रिटिश शासन के दमन की एक जिंदा निशानी बन चुकी है। कई पुराने निवासी इस निशान को दिखाकर बच्चों और युवाओं को उस दौर की कहानियां सुनाते हैं, जिससे यह याद हर पीढ़ी के साथ आगे बढ़ती रहती है।

बगल में खड़ा इमामबाड़ा, जो अब खंडहर में बदल चुका है

जिनाती मस्जिद से सटा हुआ एक पुराना इमामबाड़ा भी मौजूद है। यहां के लोगों की मान्यता है कि कभी इस इमामबाड़े में उस दौर के बादशाह रहा करते थे। लेकिन देखरेख के अभाव और सैकड़ों साल गुजर जाने के चलते यह इमारत अब बुरी तरह जर्जर हो चुकी है। इसका बड़ा हिस्सा आज खंडहर के रूप में ही नजर आता है और दीवारें जगह जगह से टूटी हुई हैं। फिर भी जो अवशेष अब तक बचे हुए हैं, वे इलाके के शाही अतीत की एक झलक जरूर दिखा जाते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर समय रहते ध्यान न दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह इमारत पूरी तरह से मिट सकती है।

16 से ज्यादा पुराने कुएं और एक साईं कुटी भी इसी इलाके में

के.एन.आई.टी. के दक्षिणी छोर पर बसा यह कस्बा इलाका सिर्फ मस्जिद और इमामबाड़े तक सीमित नहीं है। यहां आसपास 16 से अधिक पुराने कुएं भी मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय लोग इलाके की प्राचीनता का सबूत मानते हैं। इतनी बड़ी संख्या में कुओं का होना खुद इस बात का संकेत है कि पुराने दौर में यहां घनी आबादी रही होगी, क्योंकि उस समय बस्तियों की पानी की जरूरतें ज्यादातर कुओं से ही पूरी होती थीं। पुराने दौर में यही इलाका सुल्तानपुर शहर के केंद्र जैसा रहा होगा, ऐसा माना जाता है। इसी परिसर में एक साईं कुटी भी है, जिसे भी करीब 850 साल पुराना बताया जाता है। मस्जिद, इमामबाड़ा, कुएं और साईं कुटी की मौजूदगी बताती है कि सुल्तानपुर का यह हिस्सा इतिहास से किस कदर जुड़ा है, और यहां आने वाले हर शख्स को इतिहास के अलग अलग पहलू एक साथ देखने का मौका मिलता है।

वक्त के साथ बिगड़ती जा रही है ये विरासत

जिनाती मस्जिद, इमामबाड़ा, पुराने कुएं और साईं कुटी मिलकर सुल्तानपुर के इतिहास की अहम कड़ियां जोड़ते हैं। वक्त गुजरने के साथ इनमें से कई संरचनाएं जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं और कुछ तो लगभग खंडहर बन चुकी हैं। ऐसे में इन्हें सहेजने की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है। जिनाती मस्जिद का नवीनीकरण इस दिशा में उठाया गया एक जरूरी कदम है, लेकिन इमामबाड़े जैसी इमारतों की बिगड़ती हालत बताती है कि बाकी विरासतों को बचाने के लिए अभी और काम किया जाना बाकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन और समाज दोनों मिलकर ध्यान दें, तो कस्बा इलाके की यह पूरी धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाई जा सकती है।

सवाल-जवाब

जिनाती मस्जिद कितनी पुरानी है?
स्थानीय लोगों के मुताबिक इसका इतिहास करीब साढ़े आठ सौ साल पुराना है।
जिनाती मस्जिद कहां स्थित है?
यह सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में स्थित है, जो के.एन.आई.टी. के दक्षिणी छोर पर बसा है।
मस्जिद की दीवार पर मौजूद निशान किससे जुड़ा बताया जाता है?
इलाके के लोग इसे अंग्रेजों के दौर में मस्जिद पर दागे गए तोप के गोले से जोड़कर देखते हैं।
जिनाती मस्जिद को और किस नाम से जाना जाता है?
इसे बोलचाल में बादशाही मस्जिद भी कहा जाता है।
मस्जिद के बगल में कौन सी इमारत है और उसकी क्या हालत है?
बगल में एक पुराना इमामबाड़ा है, जो अब देखरेख के अभाव में काफी जर्जर होकर खंडहर में बदल चुका है।
इलाके में कितने पुराने कुएं मौजूद हैं?
स्थानीय लोगों के मुताबिक यहां 16 से अधिक पुराने कुएं मौजूद हैं।
साईं कुटी कितनी पुरानी है?
इसे भी करीब 850 साल पुराना बताया जाता है और यह जिनाती मस्जिद के पास ही स्थित है।
क्या जिनाती मस्जिद का नवीनीकरण हुआ है?
हां, हाल के वर्षों में मस्जिद का नवीनीकरण कराया जा चुका है ताकि यह सुरक्षित बनी रहे।
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