बुधवार को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ विजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा है। शाम के समय बुराई के प्रतीक रावण के पुतला दहन को देखने के लिए मैदानों में भारी भीड़ जुटती है। इस खास मौके पर पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाने का भी एक अलग ही दौर रहता है। भारत के तमाम हिस्सों में दशहरे के खास दिन पर जलेबी और इमरती का सेवन करने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। मगर क्या कभी आपने इस बात पर विचार किया है कि आखिर इस पर्व पर विशेष तौर पर इन रसीली मिठाइयों को खाने का चलन क्यों है?
धार्मिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम से जुड़ी एक प्रचलित कहानी इस दिन जलेबी खाने के चलन को रेखांकित करती है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु श्रीराम को शशकुली नामक एक मिष्ठान बेहद प्रिय था, जिसे आज के समय में जलेबी का प्राचीन रूप माना जाता है। लंकापति रावण का वध करने के पश्चात अपनी इस ऐतिहासिक जीत की खुशी जाहिर करने के लिए मिठाई बांटने और खाने के रिवाजों से इसे जोड़ा जाता है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इस प्रसंग को किसी अकाट्य ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय मुख्य रूप से एक लोककथा और धार्मिक आस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
विजयादशमी का यह पावन पर्व मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की चिरंतन विजय का संदेश देता है। ऐसे में इस खास दिन पर मीठा मुंह करना अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने और एक-दूसरे के जीवन में मिठास घोलने का एक अनूठा माध्यम बन चुका है। यही मुख्य वजह है कि आज भी देश के अनगिनत परिवारों में रावण दहन का कार्यक्रम देखने के बाद अपने घरों को लौटते वक्त ताजी जलेबी खरीदने की पुरानी रवायत पूरी शिद्दत से निभाई जाती है।
इमरती की अपनी एक अलग पहचान है जो इसे इस त्योहार के दौरान लोगों की खास पसंद बनाती है। इस पारंपरिक मिष्ठान को मुख्य रूप से उड़द दाल के बैटर को तैयार करके बनाया जाता है और फिर इसे मीठी चाशनी में डुबोया जाता है। इसकी आकर्षक बनावट और मनमोहक रंग रूप इसे काफी खास बनाते हैं। हालांकि, जलेबी की भांति इमरती का भी कोई विशेष धार्मिक इतिहास सीधे तौर पर दशहरे से जुड़ा हुआ नहीं मिलता है। देश के विभिन्न इलाकों में इसे मेलों और पारिवारिक आयोजनों के दौरान बड़े चाव से खाया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका सेवन मुख्य रूप से स्थानीय खानपान की पसंद पर आधारित है।
इस पर्व का आगमन आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर के महीनों में होता है, जिस दौरान मौसम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। चिलचिलाती गर्मी से हल्की ठंडक की ओर बढ़ता यह सुहाना मौसम त्योहार के उल्लास को और अधिक बढ़ा देता है। इस समय बाजारों में सजी हुई मिठाइयों की दुकानें और मेलों में उमड़ने वाली भीड़ उत्सव के माहौल को जीवंत कर देती है। गरमागरम जलेबी का आनंद लेना हो या फिर चाशनी से भरपूर इमरती का स्वाद चखना हो, यह सब इस त्योहार का अभिन्न हिस्सा बन जाता है।
भारत एक सांस्कृतिक विविधता वाला देश है जहाँ विजयादशमी को मनाने के तौर-तरीके हर क्षेत्र में भिन्न होते हैं। उत्तर भारत में जहां रामलीला मंचन और पुतला दहन को प्रमुखता दी जाती है, वहीं अन्य प्रांतों में स्थानीय परंपराएं और खानपान की शैलियां अलग होती हैं। यही कारण है कि देश के हर कोने में जलेबी खाना अनिवार्य नहीं माना जाता है, बल्कि जिन स्थानों पर यह चलन लोकप्रिय है, वहां धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय स्वाद का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।




















