गाजीपुर में रामलीला के मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले 80 वर्षीय उमाकांत तिवारी पिछले नौ वर्षों से लगातार ऋषियों के किरदार निभा रहे हैं। सरकारी प्राथमिक विद्यालय में करीब दो दशक तक बच्चों को पढ़ाने वाले उमाकांत तिवारी का कहना है कि जब तक भगवान उन्हें शक्ति देंगे, वह रामलीला करते रहेंगे। उनकी यह यात्रा उम्र के इस पड़ाव पर भी उतनी ही सक्रिय है और मंच के प्रति उनका जुड़ाव आज भी पूरी तरह से कायम है।
शिक्षक से रामलीला के मंच तक का सफर
उमाकांत तिवारी ने वर्ष 1971 से लगभग 20 वर्षों तक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। नौकरी के दौरान भी उनका झुकाव रामकथा और धार्मिक परंपराओं की तरफ हमेशा बना रहा। अपने गृहग्राम में आयोजित होने वाली रामलीला की जिम्मेदारी उन्होंने करीब नौ वर्षों तक संभाली और गांव में नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ भी कराया। रामचरितमानस के प्रति उनका पुराना लगाव आज भी कम नहीं हुआ है।
सेवा निवृत्ति के बाद जब लोगों ने उनसे पूछा कि वह आगे क्या करेंगे, तो उनका सीधा जवाब था कि अब वह केवल राम-राम जपेंगे। इसी गहरी आस्था ने उन्हें पेशेवर और सांस्कृतिक रूप से रामलीला के मंच से जुड़ने की प्रेरणा दी और उन्होंने ऋषि-मुनियों के पात्रों को जीवंत करना शुरू कर दिया। उनके लिए यह केवल कोई सामान्य अभिनय नहीं है, बल्कि प्रभु राम के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त करने का एक सार्थक माध्यम है।
महर्षि विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ के किरदार
उमाकांत तिवारी कभी महर्षि विश्वामित्र बनकर भगवान राम का मार्गदर्शन करते नजर आते हैं तो कभी गुरु वशिष्ठ की भूमिका में दिखाई देते हैं। वह बताते हैं कि महर्षि विश्वामित्र का किरदार उनके लिए केवल एक भूमिका नहीं बल्कि ज्ञान और सही मार्गदर्शन का प्रतीक है। रामायण में विश्वामित्र ने भगवान राम को रास्ता दिखाया और उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार किया था। उनके अनुसार आज के समय में भी इन पात्रों से यह संदेश मिलता है कि अनुभवी लोगों को हमेशा नई पीढ़ी का सही मार्गदर्शन करना चाहिए।
इन सभी भूमिकाओं में गुरु वशिष्ठ का किरदार उन्हें सबसे अधिक पसंद है। इन चरित्रों के माध्यम से वह समाज में ज्ञान, संयम, उचित मार्गदर्शन और संस्कारों का संदेश प्रसारित करना चाहते हैं। उनका मानना है कि रामकथा में गुरु का स्थान सबसे ऊपर होता है और सही मार्गदर्शन मिलने पर कोई भी व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाई को पार करके अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
गाजीपुर की धार्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उमाकांत तिवारी गाजीपुर के इतिहास और उसकी धार्मिक पृष्ठभूमि को सीधे तौर पर ऋषि-मुनियों की प्राचीन परंपरा से जोड़कर देखते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने ताड़का वन का विशेष रूप से जिक्र किया और महर्षि विश्वामित्र से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं को साझा किया। उन्होंने याद दिलाया कि इसी क्षेत्र में ताड़का का वध हुआ था और यह पूरी भूमि हमेशा से ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है।
80 वर्ष की उम्र में भी उनका यह समर्पण इस बात का प्रमाण है कि आस्था और लगन उम्र की सीमाओं से परे होती है। जब तक शरीर में ऊर्जा और ईश्वर की कृपा बनी रहेगी, वह मंच पर ऋषियों का रूप धारण करते रहेंगे। उनके लिए यह कला राम के चरणों में समर्पित जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है।


















