रावण दहन के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद क्षेत्र में टेसू-झांझी का अनूठा लोक उत्सव शुरू हो जाता है, जिसकी जड़ें सीधे तौर पर महाभारत काल की पौराणिक कथाओं में समाहित हैं। इस प्राचीन परंपरा का संबंध भीम के पौत्र और घटोत्कच के वीर पुत्र बर्बरीक से है, जिन्हें आज देश भर में खाटू श्याम के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार बर्बरीक अपनी अपार शक्ति और वीरता के लिए जाने जाते थे और महाभारत के महासंग्राम से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी शक्ति की परीक्षा लेते हुए उनका शीश दान के रूप में मांग लिया था।
बर्बरीक के बलिदान और प्रेम की प्रतीक कथा
ऐसी मान्यता है कि अपना शीश अर्पित करने से पहले बर्बरीक ने एक अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि वह अपनी प्रेमिका झांझी के साथ विवाह करना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए उनके कटे हुए मस्तक को तीन लकड़ियों के सहारे एक ऊंचे स्थान पर स्थापित किया गया ताकि वे महायुद्ध के प्रत्येक दृश्य को अपनी आंखों से देख सकें। उसी ऐतिहासिक प्रतीक की याद में आज भी तीन लकड़ी के डंडों पर मिट्टी का सुंदर चेहरा लगाकर टेसू का निर्माण किया जाता है और उसके ऊपर एक जलता हुआ दीया रखा जाता है। यह केवल बच्चों का सामान्य खिलौना नहीं बल्कि वीर बर्बरीक के ऐतिहासिक बलिदान और उनकी अमर कथा का जीवंत प्रतीक है।
सात दिनों तक चलने वाला उत्सव और बच्चों की टोलियां
फिरोजाबाद के छारबाग इलाके की निवासी बेबी पिछले एक दशक से पारंपरिक तरीके से टेसू और झांझी का निर्माण करती आ रही हैं। उनके अनुसार रावण दहन की संध्या से यह विशेष त्योहार आरंभ होता है और कुल सात दिनों तक अनवरत चलता रहता है, जिसे बच्चे बेहद उत्साह के साथ खेलते हैं। जैसे ही शाम ढलती है, छोटे-छोटे बच्चों की टोलियां अपने हाथों से सजे हुए टेसू और झांझी को लेकर घर-घर दस्तक देने के लिए निकल पड़ती हैं। इनमें टेसू को लड़के के रूप में और झांझी को लड़की के प्रतीक के रूप में अत्यंत कलात्मक ढंग से सजाया जाता है।
पारंपरिक लोकगीत और बच्चों का सामूहिक उल्लास
बच्चे हर घर के दरवाजे पर पहुंचकर पारंपरिक लोकगीत गाते हैं, जिनमें 'टेसू रे टेसू घंटा बजायो, टेसू की आई है बरात...' जैसे प्रसिद्ध बोल गूंजते हैं। इस नजारे को देखकर घरों के लोग बच्चों को सहर्ष उपहारस्वरूप पैसे, गेहूं, चावल और तरह-तरह की मिठाइयां भेंट करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया से बच्चों के भीतर मिलजुलकर बांटने की भावना और सामूहिक उत्सव मनाने का सांस्कृतिक संस्कार स्वतः विकसित होता है, जो आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण है।
प्रतीकात्मक विवाह और स्थानीय मूर्तिकारों की आजीविका
इस सात दिवसीय अनुष्ठान के अंतिम यानी सातवें दिन टेसू और झांझी का पूरे विधि-विधान से प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है, जिसमें ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों की गूंज के साथ खूब जश्न मनाया जाता है। उत्सव के अंत में दोनों प्रतिमाओं को यमुना नदी या किसी नजदीकी तालाब में जल में विसर्जित कर दिया जाता है। पारंपरिक कलाकृतियां बनाने वाली स्थानीय महिला शिल्पकार के अनुसार वह इस पूरे सीजन के दौरान लगभग 500 से 600 टेसू और झांझी बनाकर आसानी से बेच लेती हैं। उनके यहां एक टेसू की शुरुआती कीमत 10 रुपये से शुरू होकर अधिकतम 250 रुपये तक जाती है, जबकि झांझी के दाम 30 रुपये से लेकर 100 रुपये तक तय होते हैं।
विवाह सीजन का संकेत और विलुप्त होती लोक-संस्कृति
इस अनुष्ठान का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व केवल खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ वैवाहिक सीजन के आरंभ का विश्वास भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब टेसू और झांझी का विवाह संपन्न हो जाता है, तभी से आम इंसानों के विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू होने का रास्ता साफ होता है। यही कारण है कि दशहरा के बाद और दीपावली के त्योहार से ठीक पहले इस अनुष्ठान को पूरा करना अनिवार्य माना जाता है। हालांकि आधुनिक दौर में आधुनिक तकनीक, मोबाइल गेम और टेलीविजन ने बच्चों के बचपन से यह संस्कृति छीन ली है और बड़े शहरों में अब यह लोक-संस्कृति लगभग विलुप्त होती जा रही है। आज केवल फिरोजाबाद और उसके आसपास के कुछ ग्रामीण इलाकों के बच्चे ही इस प्राचीन परंपरा को किसी तरह संजोए हुए हैं, जिससे यह साफ है कि नई पीढ़ी को इस सुंदर विरासत से दोबारा जोड़ने की सख्त आवश्यकता है।


















