दीवाली के ठीक पहले दिल्ली और एनसीआर के इलाके में प्रदूषण का गंभीर संकट एक बार फिर गहरा गया है, जिससे हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत में जब पटाखों पर प्रतिबंध और नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर बहस चल रही थी, तब जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक तीखा और सीधा सवाल उठाया कि आखिर आतिशबाजी करने का धर्म से क्या संबंध हो सकता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका मकसद किसी भी तरह की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या त्योहार की खुशियों में खलल डालना नहीं है। इसके बावजूद, जनता को खुद आगे आकर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए समझदारी भरा रुख अपनाना होगा। सुप्रीम कोर्ट की इस दो टूक टिप्पणी से यह संदेश साफ है कि आस्था की आड़ में हवा में जहर घोलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगनी चाहिए, अन्यथा कानून अपना कड़ा रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।
न्याय मित्र ने उठाए बच्चों की सेहत और पाबंदियों के जमीनी पहलू
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र ने वायु प्रदूषण से बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर और खतरनाक प्रभावों का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने अदालत के सामने उन व्यावहारिक कठिनाइयों को भी रखा जो प्रतिबंधों को जमीन पर उतारते समय सामने आती हैं। इसी सिलसिले में जस्टिस बागची ने यह तीखा सवाल किया कि पटाखे फोड़ने की प्रक्रिया में धार्मिक क्या है। इस पर न्याय मित्र ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और धार्मिक मान्यताओं के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण होना अनिवार्य है, क्योंकि भगवान भी कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि उनके नाम पर छोटे-छोटे बच्चे बीमारी का शिकार बनें। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल अदालत के आदेश जारी कर देने से धरातल पर कोई बदलाव नहीं आ सकता, क्योंकि पुलिस बल के लिए हर गली और मोहल्ले में निगरानी रखना मुमकिन नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर मुहर लगाई कि हमें ऐसे निर्देशों से बचना चाहिए जिनका पालन जमीन पर व्यावहारिक रूप से संभव न हो सके।
अदालत और न्याय मित्र के बीच व्यावहारिक समाधान पर चर्चा
न्याय मित्र ने अपनी दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कानूनी पन्नों पर एक या दो घंटे की समय सीमा तय कर देना बहुत आसान प्रतीत होता है, लेकिन उसे धरातल पर अमलीजामा पहनाना बेहद कठिन चुनौती है। स्थानीय पुलिस प्रशासन के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वे हर समय हर गली में मुस्तैद रह सकें। यही वजह है कि केवल प्रतिबंध लगा देने भर से यह विकट समस्या जड़ से समाप्त नहीं हो सकती। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी किसी भी आदेश के व्यावहारिक और ठोस समाधान पर विशेष जोर दिया। उनका यह स्पष्ट मत था कि अदालत को ऐसे निर्देश जारी करने से परहेज करना चाहिए जिन्हें लागू करना प्रशासन के लिए लगभग असंभव हो। मुख्य न्यायाधीश का मानना था कि जनता के बीच व्यापक जागरूकता फैलाना और उन्हें अपनी इच्छा से सुरक्षित विकल्पों को चुनने के लिए प्रेरित करना कहीं अधिक असरदार साबित हो सकता है।
कम प्रदूषण वाले विकल्पों और दीये जलाने को बढ़ावा देने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने विचार व्यक्त किया कि अधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की बिक्री को सीमित करने के विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, कम हानिकारक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। अदालत के भीतर आतिशबाजी के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय करने और समाज में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने जैसे विभिन्न उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस पूरी चर्चा का मुख्य संदेश यही था कि त्योहार का आनंद लेते समय अपने आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना भी उतना ही आवश्यक है। अदालत ने नागरिकों से अपील की कि वे पटाखों के प्रयोग में कमी लाएं और उनकी जगह पारंपरिक दीये जलाने जैसे सुरक्षित विकल्पों को अपनाएं। हालांकि, सोमवार को हुई इस सुनवाई के दौरान अदालत की तरफ से कोई नया पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश जारी नहीं किया गया।
पराली जलाने के समाधान और आगामी सुनवाई की तिथि
इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान पराली जलाने की समस्या को रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। जस्टिस बागची ने फसल अवशेषों को खरीदने और उनके व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को तलाशने का सुझाव दिया। मुख्य न्यायाधीश ने रेखांकित किया कि यदि सही तंत्र विकसित किया जाए तो पराली किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है, बशर्ते इसके लिए एक उचित और सुलभ बाजार तैयार किया जाए। केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को अवगत कराया कि पराली के उचित निपटारे के लिए पहले से ही नीतियां और दिशा-निर्देश मौजूद हैं। सरकार की तरफ से अब तक उठाए गए सभी ठोस कदमों और भविष्य की कार्ययोजना पर एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की जाएगी। इस पूरे मामले पर अब अगली सुनवाई आगामी 15 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।





















