दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शनों के बाद शुरू हुए दो अलग-अलग विवादों ने कानूनी रूप ले लिया है। इन मामलों में शामिल दो अलग-अलग आरोपियों, स्वतंत्र भारद्वाज और अजीत भारती, की कानूनी स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। जहां एक ओर स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली की एक अदालत से अंतरिम राहत मिल गई है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों के आरोप का सामना कर रहे स्वतंत्र पत्रकार अजीत भारती की कानूनी मुश्किलें अभी भी बनी हुई हैं। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में इन दोनों मामलों को लेकर अलग-अलग स्तर पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है, जो यह दर्शाता है कि शारीरिक झड़प और डिजिटल मंचों पर की गई टिप्पणियों से जुड़े मामलों को कानून किस तरह देखता है।
स्वतंत्र भारद्वाज को मिली तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत और कोर्ट की कड़ी शर्तें
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 15 सितंबर 2026 को एक अहम फैसला सुनाते हुए स्वतंत्र भारद्वाज को तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत मंजूर कर ली। यह पूरा मामला जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई कथित मारपीट की घटना से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्र भारद्वाज पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शन के दौरान सक्रिय कार्यकर्ता निशु आजाद के पिता संजय आजाद के साथ कथित तौर पर हाथापाई और मारपीट की थी। इस घटना के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सितंबर की शुरुआत में स्वतंत्र भारद्वाज को हिरासत में ले लिया था।
अदालत ने स्वतंत्र भारद्वाज को अस्थायी रूप से राहत तो दे दी है, लेकिन इसके साथ ही उन पर कई बेहद सख्त शर्तें भी लागू की हैं ताकि जांच प्रभावित न हो। अदालती आदेश के अनुसार, स्वतंत्र भारद्वाज को इस मामले के शिकायतकर्ता संजय आजाद, उनकी बेटी निशु आजाद, उनके परिवार के किसी भी सदस्य या इस मामले से जुड़े किसी भी गवाह से किसी भी माध्यम से संपर्क करने से पूरी तरह रोक दिया गया है। इसके अलावा, अदालत ने उन्हें निर्देश दिया है कि वे सोशल मीडिया या किसी भी अन्य सार्वजनिक मंच पर इस संवेदनशील मामले से जुड़ी कोई भी सामग्री, पोस्ट या विचार साझा नहीं करेंगे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस जांच में कुछ कमियों और अनुत्तरित सवालों पर भी चिंता व्यक्त की और जांच अधिकारियों से इस संबंध में एक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट पेश करने को कहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्वतंत्र भारद्वाज को मिली इस अंतरिम राहत को किसी भी तरह से क्लीन चिट नहीं माना जा सकता है। यह केवल एक सीमित अवधि की अस्थायी राहत है और उनकी नियमित जमानत याचिका पर आगे की तारीखों में सुनवाई की जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत के दौरान उनका व्यवहार कैसा रहता है, यही बात आगे की कानूनी प्रक्रिया और नियमित जमानत के फैसले को तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
सोशल मीडिया पर टिप्पणी को लेकर अजीत भारती पर गंभीर धाराओं में केस दर्ज
स्वतंत्र भारद्वाज के मामले से बिल्कुल अलग, स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर अजीत भारती एक गंभीर कानूनी संकट का सामना कर रहे हैं। उनके खिलाफ दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू थाने में 23 अगस्त 2026 को एक FIR दर्ज की गई थी। अजीत भारती पर आरोप है कि उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कथित तौर पर जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। शिकायत के अनुसार, उनके द्वारा साझा किए गए विचारों में नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद और अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को निशाना बनाकर कथित रूप से आपत्तिजनक बातें कही गई थीं।
पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर अजीत भारती के खिलाफ SC/ST Act, IT Act और BNS की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। अपनी संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिए अजीत भारती ने अग्रिम जमानत पाने के लिए दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, 7 सितंबर को निचली अदालत ने उनकी इस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत का मानना था कि शुरुआती सबूतों और उपलब्ध दस्तावेजों को देखने पर प्रथम दृष्टया SC/ST Act के तहत अपराध किए जाने के संकेत मिलते हैं। कानून के प्रावधानों के तहत, SC/ST Act की धारा 18 के अंतर्गत आरोपी को अग्रिम जमानत देने पर कानूनी रोक है, जिसके कारण अदालत ने उन्हें गिरफ्तारी से पहले राहत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने त्वरित सुरक्षा देने से किया इनकार, अगली सुनवाई की तारीख तय
पटियाला हाउस कोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अजीत भारती ने राहत की उम्मीद में दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 सितंबर को उनकी याचिका पर सुनवाई की, लेकिन उन्हें पुलिस गिरफ्तारी से किसी भी तरह की तत्काल अंतरिम सुरक्षा देने से साफ मना कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता अजीत भारती के वकील के पास इस मामले से जुड़ी FIR की पूरी कॉपी भी उपलब्ध नहीं थी। इसके बाद, हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस याचिका को 16 सितंबर की अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
अब दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह है कि क्या अजीत भारती को उनकी गिरफ्तारी से पहले कोई राहत दी जा सकती है या नहीं। अगली सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पुलिस की FIR, लगाए गए विभिन्न कानून और निचली अदालत के आदेश सहित सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज मौजूद होंगे। इन सभी तथ्यों की गहन समीक्षा करने के बाद ही हाईकोर्ट यह तय करेगा कि अजीत भारती को अग्रिम जमानत दी जाए या फिर इस मामले को आगे की विस्तृत सुनवाई के लिए सुरक्षित रखा जाए।
दोनों कानूनी मामलों के बीच के बुनियादी अंतर को समझना जरूरी
इस पूरे घटनाक्रम में यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि स्वतंत्र भारद्वाज और अजीत भारती के मामले कानूनी रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं और इन्हें एक ही श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। स्वतंत्र भारद्वाज का मामला जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान हुई भौतिक हिंसा और मारपीट से जुड़ा हुआ है, जिसमें सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन और आरक्षण हटाओ आंदोलन जैसे घटनाक्रम शामिल थे। हालांकि उनकी गिरफ्तारी SC/ST Act के तहत दर्ज एक FIR के सिलसिले में हुई थी, लेकिन अदालत को यह भी सूचित किया गया था कि उनके खिलाफ POCSO Act के तहत भी एक अलग FIR दर्ज है।
इसके विपरीत, अजीत भारती का पूरा मामला डिजिटल स्पेस यानी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से की गई टिप्पणियों से जुड़ा है, जिसमें सीधे तौर पर सांसद चंद्रशेखर आजाद और अनुसूचित जाति समुदाय को निशाना बनाने का आरोप है। चूंकि निचली अदालत उनकी अग्रिम जमानत याचिका को पहले ही खारिज कर चुकी है, इसलिए स्वतंत्र भारद्वाज को मिली अंतरिम जमानत का यह अर्थ बिल्कुल नहीं निकाला जा सकता कि अजीत भारती को भी स्वतः ही राहत मिल जाएगी। दोनों ही मामलों में अदालतों को अलग-अलग दर्ज की गई FIR, अलग सबूतों, आरोपों की प्रकृति और संबंधित कानूनों के विशिष्ट प्रावधानों के आधार पर ही स्वतंत्र रूप से अपना फैसला लेना होगा।



















