नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के समापन के पश्चात राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने पूरे आयोजन के नतीजों पर अपना कूटनीतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने इस मंच को परस्पर विरोधी राष्ट्रीय हितों वाले राष्ट्रों का एक बेमेल समूह करार दिया, जहां से किसी ठोस और क्रांतिकारी फैसले की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्मेलन के दौरान भले ही विभिन्न देशों ने अपनी-अपनी प्राथमिकताओं पर बल दिया हो, लेकिन इस पूरे बहुपक्षीय आयोजन का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक फायदा चीन की झोली में गया है। इसके बावजूद बिना किसी सार्वजनिक मतभेद के साझा प्रस्ताव पास कराना भारत के नेतृत्व की एक बड़ी उपलब्धि रही।
होर्मुज जलडमरूमध्य से तुलना और कूटनीतिक संतुलन
कपिल सिब्बल ने सम्मेलन के दौरान चली कठिन कूटनीतिक वार्ताओं की तुलना होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के जोखिम भरे अनुभव से की। उन्होंने बताया कि सदस्य देशों के रणनीतिक लक्ष्य एक दिशा में नहीं हैं। एक तरफ चीन और रूस इस मंच को पश्चिमी ताकतों के विरोधी एक विकल्प के रूप में विकसित करने की इच्छा रखते हैं। दूसरी तरफ भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इसे किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदलने के सख्त खिलाफ हैं। इसी वैचारिक खींचतान के बीच भारत को नई दिल्ली घोषणापत्र को अंतिम रूप देने के लिए एक बेहद संवेदनशील रास्ता बनाना पड़ा।
पुराने कूटनीतिक समीकरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रूस, भारत और चीन के पारंपरिक त्रिकोण में भी बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। व्यावहारिक धरातल पर अब यह समीकरण रूस, ईरान और चीन के धुर के रूप में अधिक उभरता दिख रहा है। भारत का प्राथमिक उद्देश्य हमेशा एक संतुलित वैश्विक मंच का निर्माण करना रहा है जो किसी देश या ब्लॉक के खिलाफ काम न करे। इस कूटनीतिक खींचतान के बावजूद किसी बड़े विवाद के बिना संयुक्त दस्तावेज पारित कराना भारत की अध्यक्षता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।
डी-डॉलराइजेशन का अभाव और घोषणापत्र की जमीनी हकीकत
सम्मेलन के आधिकारिक दस्तावेज की समीक्षा करते हुए कपिल सिब्बल ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नई दिल्ली घोषणापत्र में किसी वैकल्पिक वैश्विक मुद्रा के गठन या डॉलर पर निर्भरता कम करने यानी डी-डॉलराइजेशन जैसे मुद्दों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। भारत के रुख के दृष्टिकोण से इस विषय को घोषणापत्र से बाहर रखना एक अहम कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि भारत वित्तीय प्रणालियों के अचानक ध्रुवीकरण के पक्ष में नहीं है।
हालांकि, पूर्व मंत्री ने यह भी सतर्क किया कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपनाए गए संयुक्त प्रस्ताव अक्सर कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रह जाते हैं। घोषणापत्र में शामिल बिंदुओं का वास्तविक क्रियान्वयन किस हद तक हो पाता है, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा। आम सहमति के साथ दस्तावेज को अंतिम रूप देना निश्चित तौर पर आयोजक देश के लिए एक राहत भरा क्षण था, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव सदस्य देशों के व्यावहारिक रवैये पर निर्भर करेंगे।
13 सितंबर के प्रमुख परिणाम और ब्रिक्स का आर्थिक विस्तार
वार्षिक शिखर सम्मेलन का समापन 13 सितंबर को हुआ, जिसमें कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक के बाद जारी प्राथमिकताओं में लॉजिस्टिक्स सप्लाई चेन को मजबूत करना, उभरते स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहन देना और संक्रामक बीमारियों की रोकथाम के लिए साझा नेटवर्क बनाना शामिल है। इसके अलावा, वर्तमान वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए व्यापारिक प्रणालियों में सुधार और अधिक समावेशी वैश्विक शासन व्यवस्था की मांग प्रमुखता से उठाई गई।
विस्तार के बाद ब्रिक्स अब 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक व्यापक समूह बन चुका है। यह मंच वर्तमान में वैश्विक जनसंख्या के लगभग 49.5 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया की कुल जीडीपी में इस समूह की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इतनी बड़ी आबादी और आर्थिक क्षमता के कारण इस मंच पर लिए गए फैसले अंतरराष्ट्रीय व्यापार और नीतियों को गहराई से प्रभावित करते हैं।
पश्चिम एशिया संकट और बहुपक्षीय प्रस्तावों का रुख
शिखर सम्मेलन में पारित प्रस्तावों का संबंध पश्चिम एशिया के बदलते हालात से भी जोड़कर देखा गया। कपिल सिब्बल के अनुसार, सम्मेलन के अंतिम दस्तावेज में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का असर साफ दिखाई दिया। इसमें यह संदेश भी निहित है कि अमेरिका सैन्य संघर्ष के जरिए ईरान के खिलाफ अपनी शर्तों पर जीत हासिल नहीं कर सकता। यह कूटनीतिक दृष्टिकोण घोषणापत्र के भाषा चयन में भी परिलक्षित हुआ है।
इसके अतिरिक्त, नई दिल्ली घोषणापत्र में फिलिस्तीन के मुद्दे और दो-राष्ट्र सिद्धांत को समर्थन दिया गया। यह कदम दिखाता है कि सदस्य देशों ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के लिए स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों पर जोर दिया है। इस प्रकार, शिखर सम्मेलन ने आर्थिक सहयोग के साथ-साथ गंभीर वैश्विक राजनीतिक संकटों पर भी अपना आधिकारिक रुख दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है।


















