जुलाई 2026 के दौरान दिल्ली के जंतर-मंतर क्षेत्र में हुए प्रदर्शनों के सिलसिले में दर्ज मामलों को लेकर दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्तर पर लिए गए फैसलों का हवाला देते हुए पुलिस ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है ताकि पूर्व में दर्ज मुकदमों को समाप्त किया जा सके। इस संबंध में 31 अगस्त 2026 को औपचारिक रूप से अर्जी दायर की गई है, जिसके साथ दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर अजय कृष्ण शर्मा का हलफनामा भी संलग्न किया गया है।
पुराने मामलों में दंगा और तोड़फोड़ की धाराएं
दाखिल किए गए दस्तावेजों के साथ संलग्न चार्ट के अनुसार, ये कुल 13 मुकदमे 21 जुलाई, 22 जुलाई, 25 जुलाई और 26 जुलाई को विभिन्न पुलिस स्टेशनों में दर्ज किए गए थे। इन सभी मामलों में गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिनमें मुख्य रूप से दंगा करना, हत्या का प्रयास करना और सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाना शामिल है। इसके अलावा, एक मामले में लूटपाट जैसी धाराओं के तहत भी कानूनी कार्रवाई शुरू की गई थी। अब पुलिस ने अदालत से स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार द्वारा 25 जुलाई 2026 को लिए गए निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में वह इन पुराने मामलों में आगे की कानूनी कार्यवाही जारी नहीं रखना चाहती है।
शामिल व्यक्तियों को लेकर अलग से जांच की मांग
हालांकि मुकदमों को वापस लेने की गुहार लगाई गई है, लेकिन बल ने यह भी रेखांकित किया है कि प्रदर्शन की आड़ में सक्रिय रहे कुछ विशेष लोगों की संदिग्ध गतिविधियों की गहराई से पड़ताल आवश्यक है। पुलिस ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डेटा का हवाला देते हुए बताया कि प्रदर्शन के दौरान आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लगभग 2,873 लोग मौजूद थे। इस समूह को लेकर पुलिस ने एक अलग और नई FIR दर्ज करने की अनुमति मांगी है, जिसका मुख्य उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना होगा कि क्या इन विशिष्ट व्यक्तियों की हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान में कोई सीधी संलिप्तता थी या नहीं।
भविष्य के मामलों पर रुख और कानूनी प्रावधान
दिल्ली पुलिस ने यह भी आश्वासन दिया है कि इस अर्जी में शामिल घटनाओं के दायरे से बाहर भविष्य में कोई अन्य नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी। यदि इन खास तारीखों और घटनाओं से जुड़ी कोई और शिकायत या मामला सामने आता है, तो पुलिस उस स्थिति में प्रभावित पक्ष द्वारा राहत की मांग का विरोध नहीं करेगी। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिलने वाली विशेष शक्तियों का दायरा अपनाते हुए इन मुकदमों को निरस्त करने की अपील की गई है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस मामले में दिया जाने वाला आदेश केवल मौजूदा परिस्थितियों तक ही सीमित रखा जाए और इसे भविष्य के अन्य मामलों में बतौर मिसाल न पेश किया जाए।


















