देश की राजधानी में हाल के दिनों में आयोजित हुए विपक्षी मंचों और विरोध मार्चों में एक छात्र नेता की मौजूदगी ने सियासी गलियारों में भारी दिलचस्पी पैदा कर दी है। छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा को विपक्षी खेमे के सबसे बड़े नेताओं के साथ लगातार मंच साझा करते देखा गया है। विशेष रूप से चौदह अक्टूबर को राजधानी में छात्र संगठन एनएसयूआई की उन छात्राओं के समर्थन में आयोजित प्रेस वार्ता में, जिन्हें पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा था, इस युवा चेहरे को प्रमुखता से पेश किया गया। इसके पहले तेरह अक्टूबर को आयोजित साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया, जिससे यह संकेत मिला कि मुख्य विपक्षी नेतृत्व उन्हें छात्र आंदोलनों के एक अहम चेहरे के तौर पर आगे बढ़ा रहा है।
सड़क से मंच तक सुरक्षा घेरा और प्रमुख भागीदारी
विपक्षी मार्च के दौरान इस युवा छात्र नेत्री की सक्रियता विशेष रूप से देखने को मिली। बारह अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय की ओर निकाले गए पैदल मार्च के दौरान कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी खुद उन्हें भीड़ के बीच सुरक्षा घेरे के भीतर बनाए रखने का प्रयास करते नजर आए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार उनके करीब आए, तो उन्हें भी हटाते हुए छात्र नेत्री को सुरक्षित दूरी पर रखा गया। पूरे पैदल मार्च के दौरान उन्हें प्रियंका गांधी के निकट और नेतृत्व के विशेष सुरक्षा घेरे के भीतर ही चलने का अवसर दिया गया।
इतना ही नहीं, इस पूरे मार्च का नेतृत्व कर रहे खुले ट्रक पर, जहां गठबंधन के चुनिंदा शीर्ष नेताओं को ही चढ़ने की अनुमति थी, वहां भी आइसा प्रमुख को प्रमुख स्थान दिया गया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि विपक्षी नेतृत्व छात्र राजनीति के इस नए चेहरे को राष्ट्रीय पटल पर बड़ा मंच मुहैया कराने की योजना पर आगे बढ़ रहा है।
कौन हैं आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा
उत्तराखंड के खटीमा कस्बे की पृष्ठभूमि से आने वाली नेहा वोरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं और वर्तमान में वामपंथी छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय बागडोर संभाल रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहली व्यापक पहचान तब बनी जब राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के कथित प्रश्नपत्र लीक प्रकरण के खिलाफ जोरदार आंदोलन खड़ा हुआ था। उस समय केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर नई पीढ़ी के युवाओं ने भूख हड़ताल शुरू की थी।
उस दौर में पहले पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे थे, परंतु स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तब आंदोलन की कमान संभालते हुए नेहा वोरा ने उपवास शुरू कर दिया। अनशन के उस लंबे सिलसिले के दौरान उनके शारीरिक वजन में लगभग सात किलोग्राम तक की कमी दर्ज की गई थी। इसके बाद वह झारखंड और पटना में संगठित किए गए विभिन्न छात्र संघर्षों में भी अग्रिम पंक्ति में दिखाई दीं।
लगातार विरोध प्रदर्शन और पुलिस हिरासत का सिलसिला
हालिया समय में निर्वाचन आयोग से जुड़े विवादों को लेकर भी वह सीधे तौर पर सक्रिय रही हैं। दो अक्टूबर को उन्होंने एसआईआर में अनियमितताओं का गंभीर आक्षेप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दिया था। इसके बाद दस अक्टूबर को जब प्रशासन ने भारी बैरिकेडिंग और पुलिस बल तैनात करके प्रदर्शन को रोकने की कोशिश की, तब भी वह अपने साथियों के साथ सड़कों पर डटी रहीं। विभिन्न जन आंदोलनों और प्रदर्शनों में भागीदारी के चलते वह अब तक नौ बार पुलिस हिरासत में ली जा चुकी हैं।
युवा और चर्चित चेहरों पर पहले भी लगे दांव
वर्ष 2014 के बाद से विपक्षी राजनीति की कार्यशैली का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि जनआंदोलनों से उभरे लोकप्रिय चेहरों को अपने पाले में लाने के कई प्रयास किए गए हैं, हालांकि उनके परिणाम हमेशा अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे हैं।
कन्हैया कुमार का राजनीतिक सफर
वर्ष 2016 में जेएनयू के भीतर 2001 संसद हमले के दोषी अफजल गुरु के समर्थन में आयोजित कार्यक्रम और विवादित नारों के बाद कन्हैया कुमार राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आए थे। उस समय वह एआईएसएफ से जुड़े थे और छात्र संघ अध्यक्ष थे। जेल से रिहाई के बाद उनकी भाषण कला ने खूब वाहवाही बटोरी। 2019 में उन्होंने बेगूसराय से सीपीआई प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में उन्हें इस उद्देश्य से कांग्रेस में शामिल कराया गया कि वह बिहार में संगठन को मजबूत करेंगे। हालांकि 2024 के आम चुनाव में दिल्ली में आप के साथ गठबंधन के बावजूद वह बीजेपी के मनोज तिवारी के मुकाबले हार गए। वहीं वर्ष 2026 के दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में एनएसयूआई की चारों सीटों पर हार के बाद उनकी सक्रियता पहले जैसी नजर नहीं आ रही।
गुजरात के तीन युवा चेहरे और उनकी राहें
वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पूर्व पाटीदार आंदोलन के जरिए विशाल भीड़ जुटाने वाले हार्दिक पटेल को बड़ा राजनीतिक समर्थन दिया गया था। रैलियों में व्यापक भागीदारी के बावजूद चुनाव परिणामों में मनचाही सफलता नहीं मिली और अंततः 2022 के चुनाव से ठीक पहले वह बीजेपी में शामिल हो गए, जहां से वह वर्तमान में विरमगाम के विधायक हैं।
इसी तरह ओबीसी आंदोलन से चमके अल्पेश ठाकोर को भी 2017 में खूब प्रोत्साहन दिया गया, लेकिन वह भी दल बदलकर सत्ता पक्ष में चले गए और गांधीनगर दक्षिण से विधानसभा सदस्य बने। वहीं दलित राजनीति के चेहरे जिग्नेश मेवानी ने भाषणों से खूब सुर्खियां बटोरीं और वर्तमान में वह वडगाम से पार्टी के विधायक हैं, किंतु राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव सीमित ही रहा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नेहा वोरा के साथ बढ़ती यह नजदीकी भविष्य में क्या सियासी आकार लेती है।





















