देश की राजधानी में शांतिपूर्ण मार्च के दौरान सांसदों और प्रदर्शनकारियों के साथ कानून व्यवस्था संभालने वाले तंत्र का व्यवहार एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं उच्च सदन में पार्टी संसदीय दल की कमान संभाल रहे राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने सुरक्षाकर्मियों की कथित ज्यादतियों, हाथापाई और जबरिया हिरासत के खिलाफ कड़ा वैधानिक मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने उच्च सदन की विशेषाधिकार समिति के उपसभापति हरिवंश के समक्ष एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई है। इस औपचारिक नोटिस और पूरक प्रतिवेदन के जरिए उन्होंने राजधानी के पुलिस आयुक्त सहित अन्य संबंधित कर्मियों पर जनप्रतिनिधियों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने तथा सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने का सीधा आरोप मढ़ा है।
ग्यारह दिनों में तीन बार तीखी नोकझोंक और बल प्रयोग का ब्योरा
संसदीय समिति को प्रेषित पत्र में सांसद ने तारीखवार घटनाओं का ब्योरा सामने रखते हुए स्पष्ट किया कि दो अक्टूबर 2026 से लेकर बारह अक्टूबर 2026 के मध्य मात्र ग्यारह दिनों की अल्पावधि में एक आसीन सांसद पर तीन बार अनावश्यक शारीरिक जोर आजमाइश की गई। उनका कहना है कि यह कोई सामान्य सुरक्षा रणनीति या भीड़ नियंत्रण का हिस्सा नहीं था, बल्कि जानबूझकर एक जनप्रतिनिधि को अपमानित करने का प्रयास था।
पहला घटनाक्रम गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर 2026 को सामने आया। उस दिन मतदाता सूचियों में भारी फेरबदल और नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी के विरोध में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर की दिशा में एक शांत पैदल मार्च निकाल रहे थे। शिकायत के मुताबिक, सुरक्षाकर्मियों ने इस दौरान सांसद को सड़क पर गिरा दिया, घसीटते हुए उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया और जबरन वाहन के अंदर ठूंसकर ले गए।
इसके बाद दूसरा वाकया दस अक्टूबर 2026 को दर्ज हुआ। चुनावी तंत्र की कार्यशैली और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए आयोजित प्रदर्शन के बाद जैसे ही पार्टी के प्रमुख नेता बाहर निकले, सुरक्षा बलों ने उन्हें सामान्य गति से पैदल चलने तक नहीं दिया। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने उन्हें खींचते हुए अपनी बस में बैठा लिया और हिरासत की प्रक्रिया पूरी की।
तीसरी बार यह टकराव बारह अक्टूबर 2026 को संसद मार्ग, जनपथ भूमिगत रेल स्टेशन और जंतर-मंतर के आसपास देखने को मिला। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण में विसंगतियों के खिलाफ आयोजित शांति मार्च में पुलिस ने पुनः बल प्रयोग किया। आरोप के अनुसार, सुरक्षाकर्मियों ने सांसद की गर्दन पकड़कर खींचा, जोर-जबरदस्ती की और धक्का देकर पुलिस वाहन में भर दिया।
विशेषाधिकार और लोकतांत्रिक मर्यादा पर उठे सवाल
अपने आधिकारिक प्रतिवेदन में सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि एक मौजूदा जनप्रतिनिधि को जमीन पर गिराना, शारीरिक रूप से खींचना और अपमानित करना सीधे-सीधे संसदीय विशेषाधिकारों का हनन है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शांतिपूर्ण मार्च निकालना किसी भी नागरिक या निर्वाचित सदस्य के लिए अपराध माना जा सकता है।
एक वीडियो संदेश के माध्यम से अपनी बात रखते हुए संजय सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे लोग कोई अपराधी, माफिया या अराजक तत्व नहीं हैं, बल्कि भारत की संसद के निर्वाचित सदस्य हैं। उन्होंने कहा, ‘हम लोग कोई आतंकवादी नहीं हैं, गुंडे नहीं हैं, माफिया नहीं हैं.’ उन्होंने संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए अधिकारों की याद दिलाते हुए कहा कि अन्याय और मताधिकार से जुड़ी गड़बड़ियों पर बोलना देश के हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है।
पुलिस आयुक्त की चुप्पी और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी
प्रशासनिक अधिकारियों के रवैये पर उंगली उठाते हुए सांसद ने कहा कि इन अप्रिय घटनाओं के समय उन्होंने स्वयं पुलिस आयुक्त से संपर्क साधने का भरसक प्रयास किया। कई बार दूरभाष पर कॉल करने और लिखित संदेश प्रेषित करने के बावजूद शीर्ष अधिकारी की तरफ से न तो कोई बातचीत की गई और न ही कोई प्रत्युत्तर मिला। उनका तर्क है कि समूचे पुलिस बल की अगुआई करने के नाते उच्चाधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
जाफरपुर कलां थाने के प्रभारी और मौके पर मौजूद कर्मियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए संजय सिंह ने आगे की रणनीति का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि विशेषाधिकार समिति तो अपनी पड़ताल करेगी ही, साथ ही दोषी कर्मियों पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने की कानूनी प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी। यदि स्थानीय तंत्र अपने ही महकमे के लोगों के खिलाफ वाद दर्ज करने से कतराता है, तो वे न्यायपालिका की शरण में जाकर विधिक आदेश हासिल करेंगे।
महिला प्रदर्शनकारियों को थाने में रोके रखने पर गंभीर आपत्ति
विशेषाधिकार समिति को सौंपे गए दस्तावेज में सांसद ने हिरासत में ली गई महिलाओं के साथ हुए बर्ताव का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। दस्तावेज के मुताबिक, दस अक्टूबर 2026 को जाफरपुर कलां थाने में बड़ी तादाद में महिला पत्रकारों, छात्राओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को रोके रखा गया था।
सांसद का आरोप है कि वहां मौजूद अफसरों को कानून के तहत महिलाओं को मिलने वाले सुरक्षात्मक अधिकारों की याद दिलाई गई थी, फिर भी उन्हें देर शाम तक वहीं रोके रखा गया। इस संबंध में उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के प्रावधानों का हवाला दिया, जिसके अंतर्गत सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिलाओं की हिरासत अथवा गिरफ्तारी को लेकर सख्त नियम निर्धारित हैं। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और प्रशासन से जवाब तलब किया जाए कि किस आधार पर महिलाओं को शाम तक थाने में रखा गया था।





















