देश में आरक्षण प्रणाली को लेकर जारी व्यापक बहस के बीच अभिनेत्री अविका गौर के पति और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मिलिंद चंदवानी का एक नया वीडियो इंटरनेट पर जबरदस्त चर्चा का विषय बन गया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) के पूर्व छात्र रह चुके मिलिंद चंदवानी ने इस वीडियो के जरिए अपने उच्च शिक्षा के दिनों का एक महत्वपूर्ण संस्मरण साझा किया है। उन्होंने अपनी आपबीती बताते हुए इस बात पर रोशनी डाली है कि किस तरह शैक्षणिक योग्यताओं और परीक्षा अंकों के बावजूद आरक्षण व्यवस्था के अलग-अलग पहलू छात्रों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
2013 की घटना: 98.5 प्रतिशत अंक और आईआईएम कॉल का अनुभव
मिलिंद चंदवानी ने अपने वीडियो में साल 2013 के अपने कॉलेज के दिनों की एक घटना का विस्तार से जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि उस समय प्रवेश परीक्षा में 98.5 प्रतिशत अंक हासिल करने के बावजूद उन्हें आईआईएम से इंटरव्यू कॉल नहीं मिल पाई थी। वहीं दूसरी ओर, उनके एक साथी को महज 58 प्रतिशत अंक प्राप्त करने पर ही आईआईएम से कॉल आ गई थी। मिलिंद के अनुसार, वे दोनों ही मध्यमवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते थे और उनके दोस्त को सामाजिक या आर्थिक आधार पर आरक्षण की वास्तविक आवश्यकता नहीं थी। लेकिन क्योंकि व्यवस्था में यह प्रावधान मौजूद था, इसलिए उनके दोस्त ने इसका लाभ उठाया।
मिलिंद ने स्वीकार किया कि उस दौर में इस तरह के अंतर को देखकर उन्हें काफी दुख महसूस हुआ था। 98.5 प्रतिशत अंक लाने के बाद भी अवसर न मिल पाने के कारण उनके मन में उस समय मौजूद आरक्षण व्यवस्था की प्रासंगिकता और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए थे।
टीच फॉर इंडिया के अनुभव से बदला नजरिया
वीडियो में मिलिंद चंदवानी ने आगे बताया कि समय के साथ उनके दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आया। उन्होंने साझा किया कि जब वे 'टीच फॉर इंडिया' संगठन के साथ जुड़े और सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, तो उन्हें ज़मीनी हकीकत का अहसास हुआ। जमीनी स्तर पर काम करते हुए उन्होंने देखा कि जिन बच्चों को वास्तव में सकारात्मक कदम और आरक्षण की सबसे अधिक जरूरत है, उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि इस व्यवस्था का लाभ किस प्रकार उठाया जाए और इसका सही इस्तेमाल कैसे किया जाए।
मिलिंद ने यह स्पष्ट किया कि उनका यह मानना बिल्कुल नहीं है कि आरक्षण का लाभ उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इसकी आवश्यकता नहीं होती। समाज में ऐसे अनगिनत लोग और वर्ग मौजूद हैं, जिन्हें इस व्यवस्था की वास्तव में सख्त जरूरत है।
समान अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वकालत
जाति आधारित आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में अपनी सीधी राय व्यक्त करने के बजाय मिलिंद ने इसके दीर्घकालिक समाधान पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस बात पर अंतिम निर्णय नहीं दे सकते कि जाति आधारित आरक्षण सही है या गलत। हालांकि, यदि भविष्य में कभी इस व्यवस्था को समाप्त करने या हटाने के बारे में विचार किया जाना है, तो उससे पहले सरकार और समाज को मिलकर कुछ अनिवार्य कदम उठाने होंगे।
उन्होंने जोर देकर कहा कि सबसे प्राथमिक आवश्यकता यह है कि कम आय वर्ग से आने वाले प्रत्येक बच्चे को समान अवसर और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। जब तक वंचित वर्ग के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के बाजार में अन्य अभ्यर्थियों के साथ बराबरी से मुकाबला करने में सक्षम नहीं हो जाते, तब तक आरक्षण हटाने की बात करना तर्कसंगत नहीं है। केवल बुनियादी शैक्षणिक बराबरी हासिल होने के बाद ही इस व्यवस्था में बदलाव या इसे समाप्त करने पर विचार किया जा सकता है।
सोशल मीडिया पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' की लहर
मिलिंद चंदवानी का यह विचारपूर्ण वीडियो ऐसे समय में सामने आया है जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' नाम से एक अभियान व्यापक रूप से ट्रेंड कर रहा है। इस डिजिटल अभियान के माध्यम से देश भर के लोग वर्तमान आरक्षण प्रणाली में आमूलचूल बदलाव और सुधार की मांग उठा रहे हैं। विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर बड़ी संख्या में यूजर इस मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं और अभियान का समर्थन कर रहे हैं।
इस विषय पर वर्तमान में पूरे देश में दो मुख्य विचारधाराएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ जहां लोगों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा आरक्षण नीति में बदलाव या समीक्षा की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई विश्लेषकों और नागरिकों का दृढ़ विश्वास है कि जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती, तब तक आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।



















