गोंडा जिले के गांधी पार्क परिसर में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर एक व्यापक छात्र प्रदर्शन आयोजित किया गया। राष्ट्रीय छात्र पंचायत के तत्वावधान में आयोजित 'शिक्षा बचाओ जन आंदोलन' के जरिए युवाओं और विद्यार्थियों ने गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों की बेतहाशा फीस वृद्धि, पाठ्यपुस्तकों तथा पोशाक के नाम पर हो रही कथित वसूली के विरोध में जोरदार आवाज बुलंद की। छात्र प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रदेश के प्रत्येक बच्चे को सुलभ और किफायती शिक्षा पाने का अधिकार है, लेकिन व्यावसायिक बनते शैक्षणिक तंत्र के कारण आम परिवारों के लिए पढ़ाई का खर्च उठाना भारी पड़ता जा रहा है।
निजी विद्यालयों पर नकेल और तीन प्रमुख शर्तें
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय छात्र पंचायत के अध्यक्ष शिवम पांडेय ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि यदि प्रशासन और सरकार उनकी मुख्य मांगों को स्वीकार कर लेती है, तो इस आंदोलन को तत्काल रोक दिया जाएगा। संगठन की सबसे प्राथमिक मांगों में निजी विद्यालयों के शुल्क को नियंत्रित करने के लिए सख्त कानून बनाना, सभी निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य रूप से लागू करना और उच्च शिक्षा में बढ़ाए गए परीक्षा शुल्क को वापस लेना शामिल है। शिवम पांडेय का कहना है कि यह पूरा आंदोलन शुद्ध रूप से छात्रों के भविष्य और राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था में पारदर्शी सुधार लाने के मकसद से चलाया जा रहा है। उन्होंने आगाह किया कि भले ही यह प्रदर्शन प्राथमिक तौर पर एक दिवसीय तय किया गया था, परंतु यदि मांगों पर ठोस निर्णय नहीं आया तो इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।
प्रशासन पर असहयोग और घेराबंदी का आरोप
आंदोलन के दौरान गांधी पार्क में प्रशासनिक बंदिशों को लेकर छात्र नेताओं ने गहरा असंतोष व्यक्त किया। शिवम पांडेय ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने पार्क के चारों ओर लोहे की बैरिकेडिंग खड़ी कर दी, जिससे उनके दूर-दराज से आ रहे कार्यकर्ताओं को धरना स्थल के अंदर प्रवेश करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहे युवाओं को वहां से हटाने का प्रयास किया गया और उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया। छात्र नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार देते हुए कहा कि प्रशासनिक दबाव के बावजूद वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
लंबे समय से जारी संघर्ष और पांच लाख पत्रों का अभियान
संगठन के प्रदेश मंत्री अंकित तिवारी ने आंदोलन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि राष्ट्रीय छात्र पंचायत बीते दो-तीन वर्षों से लगातार 'शिक्षा बचाओ' मुहिम चला रही है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में मनमानी फीस वृद्धि रोकने के लिए तुरंत शुल्क विनियमन अधिनियम लागू किया जाना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था में निजी विद्यालय अभिभावकों पर विशेष दुकानों से महंगी किताबें, पोशाक और अन्य सामग्रियां खरीदने का दबाव डालते हैं, जिसे केवल एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की अनिवार्यता से ही रोका जा सकता है। अंकित तिवारी ने याद दिलाया कि संगठन इससे पहले लखनऊ स्थित विधानसभा का घेराव कर चुका है और ईको गार्डन में भी लंबा धरना दे चुका है। उनके अनुसार, मुख्यमंत्री द्वारा तीन महीने के भीतर समस्याओं का समाधान करने का भरोसा दिया गया था, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई धरातल पर नहीं दिखी। अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए छात्रों द्वारा लगभग पांच लाख पत्र लिखे गए और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, जिनमें सांसद तथा विधायक शामिल हैं, को ज्ञापन भी सौंपे गए, पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।
कॉलेज संबद्धता बदलते ही दोगुना हुआ परीक्षा शुल्क
उच्च शिक्षा के स्तर पर बढ़ते वित्तीय बोझ का विवरण देते हुए अंकित तिवारी ने एलबीएस डिग्री कॉलेज का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह महाविद्यालय पूर्व में डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से संबद्ध था, तब विद्यार्थियों को लगभग 800 रुपये परीक्षा शुल्क देना पड़ता था। हालांकि, अब इस कॉलेज की संबद्धता बलरामपुर स्थित मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय से कर दी गई है, जिसके बाद से परीक्षा शुल्क उछलकर सीधे 1700 से 1800 रुपये के बीच पहुंच गया है। फीस में आई इस अचानक बढ़ोतरी से सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों पर अत्यधिक आर्थिक दबाव पड़ रहा है। छात्र संगठन ने मांग उठाई है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस बढ़े हुए शुल्क को तत्काल घटाकर पुराने स्तर पर लाए।
जर्जर हॉस्टलों की सुरक्षा और आगे का निर्णय
आंदोलन में केवल फीस का मुद्दा ही नहीं, बल्कि अध्ययनरत छात्रों की शारीरिक सुरक्षा की स्थिति को भी गंभीरता से उठाया गया। छात्र नेताओं ने मांग की कि जिले में बेहद खराब और जर्जर हालत में पहुंच चुके छात्रावासों को तुरंत बंद किया जाए या उनकी तत्काल मरम्मत कराई जाए। शिवम पांडेय ने दोहराया कि जर्जर इमारतों में छात्रों को ठहराना उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। उन्होंने कहा कि जब तक शासन स्तर से इन सभी व्यावहारिक समस्याओं पर कोई निर्णायक और लिखित कार्रवाई नहीं होती, तब तक राष्ट्रीय छात्र पंचायत का यह जन आंदोलन जारी रहेगा।



















