जयपुर जिले के निकट स्थित रामपुरा गांव में प्राथमिक शिक्षा की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चे पिछले ढाई साल से किसी क्लासरूम या पक्की छत के नीचे नहीं, बल्कि मवेशियों को बांधने वाले एक तबेले में बैठकर अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए मजबूर हैं। स्कूल की पुरानी और मूल इमारत पूरी तरह से जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है, जिसके चलते सुरक्षा कारणों से उस पर ताला लगा दिया गया है। ऐसे में गांव के बच्चों का शैक्षणिक भविष्य अंधकारमय न हो, इसके लिए किसान के तबेले को ही अस्थायी विद्यालय का रूप दे दिया गया है।
पशुओं के चारे के बीच कॉपियों और किताबों का ठिकाना
रामपुरा गांव के इस अस्थायी स्कूल परिसर में प्रवेश करते ही एक अनोखा और विचलित करने वाला दृश्य दिखाई देता है। जहां एक ओर मवेशियों के खाने के लिए सूखा और हरा चारा रखा हुआ है, वहीं दूसरी ओर बच्चे अपनी किताबें और कॉपियां बिछाकर पढ़ाई में जुटे हुए हैं। यह कोई आपदा के बाद कुछ दिनों के लिए बनाया गया अस्थायी टेंट नहीं है और न ही प्रशासन द्वारा तैयार किया गया कोई कमरा है। यह गांव के ही एक स्थानीय किसान का निजी तबेला है, जो पिछले ढाई वर्षों से बिना किसी रुकावट के छात्रों के लिए कक्षा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
किसान के इस स्थान पर बच्चे रोजाना आते हैं और मवेशियों की मौजूदगी के बीच ही अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं। परिसर में एक तरफ पशुओं के चारे का ढेर लगा रहता है तो दूसरी तरफ बच्चे जमीन पर बैठकर अपने अध्यापकों के निर्देशों का पालन करते हैं। स्कूल की पुरानी इमारत पास में ही खड़ी है, लेकिन उसकी छत और दीवारें इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि किसी भी समय बड़े हादसे का खतरा बना रहता है। यही वजह है कि प्रशासन ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उस मुख्य भवन में आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
बिना किसी स्वार्थ के किसान ने मुहैया कराई अपनी जमीन
जब सरकारी स्कूल की पुरानी इमारत जर्जर घोषित कर दी गई, तब गांव के बच्चों के सामने अपनी पढ़ाई जारी रखने का गंभीर संकट पैदा हो गया था। इस संकट की स्थिति में गांव के एक उदार किसान ने आगे आकर अपनी निजी संपत्ति यानी तबेले को बच्चों की शिक्षा के लिए सौंप दिया। किसान का कहना है कि उसने पिछले करीब ढाई साल से यह जगह स्कूल संचालन के लिए दी हुई है और इसके बदले में वह सरकार या स्कूल प्रशासन से एक भी रुपया किराया या मुआवजा नहीं ले रहा है।
किसान के अनुसार, जब उसने देखा कि भवन न होने की वजह से बच्चों की पढ़ाई रुक सकती है और उनका साल खराब हो सकता है, तो उसने बिना किसी आर्थिक लाभ के अपना तबेला खाली करके दे दिया। उसका मानना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, बच्चों की पढ़ाई किसी भी कीमत पर बाधित नहीं होनी चाहिए। इसी सोच के साथ वह इतने लंबे समय से अपनी जगह का उपयोग शैक्षणिक कार्यों के लिए होने दे रहा है, ताकि गांव के बच्चे शिक्षित बन सकें।
निरीक्षण के दौरान उपजा विवाद और ग्रामीणों का विरोध
हाल ही में जब इस स्कूल की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करने और जमीनी हालात जानने के लिए सीजेपी की एक टीम रामपुरा गांव पहुंची, तो वहां का माहौल तनावपूर्ण हो गया। ग्रामीणों ने टीम की मौजूदगी पर कड़ा ऐतराज जताया और विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि ग्रामीणों और निरीक्षण के लिए आई टीम के बीच मारपीट और हाथापाई तक की नौबत आ गई।
हालांकि इस विवाद और हंगामे के बावजूद गांव के प्राथमिक विद्यालय की कड़वी सच्चाई नहीं बदली है। निरीक्षण दल के साथ हुई इस घटना के बाद भी बच्चे आज भी उसी तबेले में बैठकर अपनी पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जमीनी हकीकत यह दर्शाती है कि प्रशासनिक देरी के कारण बच्चों को अब भी चारे के ढेर के बीच बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ रही है।
18 लाख रुपए के बजट से नई इमारत बनने की उम्मीद
लंबे समय से बदहाली का दंश झेल रहे रामपुरा गांव के निवासियों के लिए अब एक राहत भरी खबर सामने आई है। राज्य सरकार की ओर से स्कूल की नई और सुरक्षित इमारत का निर्माण कराने के लिए 18 लाख रुपए की वित्तीय स्वीकृति प्रदान कर दी गई है। इस धनराशि की मंजूरी मिलने के बाद अब ग्रामीणों को उम्मीद जगी है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
गांव के लोगों का कहना है कि 18 लाख रुपए की लागत से बनने वाले नए भवन के तैयार होने के बाद बच्चों को तबेले की अस्वास्थ्यकर और असुरक्षित स्थितियों से मुक्ति मिल जाएगी। फिलहाल रामपुरा गांव में हर किसी के मन में एक ही मुख्य सवाल तैर रहा है कि आखिर कब तक बच्चों को इस स्थिति में पढ़ना पड़ेगा। हालांकि प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद अब यह उम्मीद पक्की हो गई है कि जल्द ही बच्चों को अपनी खुद की पक्की और आधुनिक स्कूल इमारत नसीब होगी, जहां वे बिना किसी भय या असुविधा के पढ़ सकेंगे।



















