भारतीय फिल्म उद्योग के इतिहास में 30 सितंबर 2016 एक ऐसा मील का पत्थर बन चुका है, जिसने बड़े बजट की स्पोर्ट्स बायोपिक फिल्मों के भविष्य की दिशा ही बदल दी। इसी ऐतिहासिक दिन सिनेमाघरों में 'एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' ने दस्तक दी थी। करीब 104 करोड़ रुपये के भारी-भरकम खर्च पर तैयार हुई इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर कमाई का ऐसा तूफान खड़ा किया कि उस दौर के कई पुराने रिकॉर्ड धाराशायी हो गए। क्रिकेट के दिग्गज महेंद्र सिंह धोनी के संघर्ष और उपलब्धियों को सुशांत सिंह राजपूत ने जिस बारीकी, निष्ठा और सजीवता के साथ पर्दे पर उतारा, उसने आम दर्शकों से लेकर फिल्म समीक्षकों तक सभी को गहराई से प्रभावित किया।
104 करोड़ का जोखिम और ट्रेड पंडितों की आशंकाएं
साल 2016 के दौर में किसी खेल आधारित बायोपिक पर 104 करोड़ रुपये की विशाल पूंजी लगाना एक अत्यंत जोखिम भरा कदम माना जाता था। निर्देशक नीरज पांडे के निर्देशन में बनी इस परियोजना का दायरा बहुत व्यापक था। सितारों की बड़ी जमात, अंतरराष्ट्रीय लोकेशंस पर फिल्मांकन, अत्याधुनिक वीएफएक्स तकनीक और असली क्रिकेट स्टेडियमों के भीतर बड़े पैमाने पर हुई शूटिंग के चलते निर्माण लागत काफी बढ़ गई थी। फॉक्स स्टार स्टूडियोज और निर्माता अरुण पांडे के बैनर तले जब यह फिल्म फ्लोर पर गई, तब फिल्म व्यापार विश्लेषकों के मन में यह गंभीर संशय था कि क्या कोई स्पोर्ट्स ड्रामा अपनी इतनी विशाल लागत वसूल करके मुनाफे की दहलीज पार कर पाएगा।
डेढ़ साल की कठोर तपस्या और किरण मोरे की ट्रेनिंग
महेंद्र सिंह धोनी जैसे जीवित किंवदंती का रूप धारण करना किसी भी अभिनेता के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। सुशांत सिंह राजपूत ने इस किरदार में पूरी तरह ढलने के लिए डेढ़ साल से भी ज्यादा का वक्त समर्पित कर दिया। पूर्व भारतीय विकेटकीपर कोच किरण मोरे के संरक्षण में सुशांत ने प्रतिदिन मैदान पर घंटों पसीना बहाया और पेशेवर क्रिकेट के दांव-पेंच सीखे। धोनी के विश्वप्रसिद्ध ट्रेडमार्क 'हेलीकॉप्टर शॉट' को शत-प्रतिशत सटीकता से दोहराने की धुन में सुशांत ने अपनी उंगलियों और कंधे पर गहरी चोटें भी खाईं। शारीरिक तकलीफों के बावजूद उनका समर्पण तनिक भी कम नहीं हुआ और उन्होंने अभ्यास जारी रखा।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिकॉर्डतोड़ शुरुआत
जब यह बहुप्रतीक्षित फिल्म 30 सितंबर 2016 को बड़े पर्दे पर उतरी, तो देश के कोने-कोने में दर्शकों का जबर्दस्त हुजूम उमड़ पड़ा। फिल्म को भारत में 4,500 से अधिक स्क्रीन्स पर और दुनिया भर के 60 देशों में एक साथ व्यापक पैमाने पर प्रदर्शित किया गया। पहले ही दिन टिकट काउंटरों पर दर्शकों की भीड़ ने 21.30 करोड़ रुपये की बंपर ओपनिंग दर्ज कराई, जो उस समय किसी भी खेल बायोपिक के लिए दर्ज हुआ सबसे बड़ा ओपनिंग रिकॉर्ड था। थियेटर के भीतर सुशांत की एंट्री होते ही माहौल किसी सजीव क्रिकेट स्टेडियम की तरह तालियों और सीटियों से गूंज उठता था।
215 करोड़ का वैश्विक कारोबार और सुपरहिट का दर्जा
शुरुआती तीन दिनों यानी ओपनिंग वीकेंड के दौरान ही फिल्म ने 66 करोड़ रुपये से अधिक का मजबूत संग्रह कर लिया। दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और सुशांत के असाधारण अभिनय के दम पर फिल्म का विजय रथ हफ्तों तक जारी रहा। भारतीय घरेलू बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने कुल 133.04 करोड़ रुपये की शुद्ध कमाई की। वहीं अगर दुनिया भर के कुल कारोबार की बात करें, तो इस बायोपिक ने 215 करोड़ रुपये से अधिक का विशाल कलेक्शन दर्ज किया। 104 करोड़ रुपये की भारी लागत के बावजूद यह परियोजना बेहद लाभदायक साबित हुई और इसे बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट का आधिकारिक दर्जा मिला।
दिशा पटानी, कियारा आडवाणी और सह कलाकारों का योगदान
सुशांत सिंह राजपूत के साथ-साथ अन्य कलाकारों के आपसी तालमेल ने भी इस सिनेमाई अनुभव को यादगार बना दिया। प्रियंका झा की संक्षिप्त लेकिन भावुक भूमिका में दिशा पटानी के अभिनय ने सिनेमाघरों में मौजूद दर्शकों की आंखें नम कर दीं। वहीं साक्षी धोनी के किरदार में कियारा आडवाणी ने अपनी स्वाभाविक सहजता से भरपूर प्रशंसा बटोरी। इसके अलावा धोनी के पिता पान सिंह के रोल में अनुपम खेर और स्कूल के क्रिकेट कोच के किरदार में राजेश शर्मा ने अपने मझे हुए अभिनय से कहानी की भावनात्मक बुनियाद को बेहद मजबूती दी।
संगीत की धुनें और धोनी की अपनी प्रतिक्रिया
फिल्म को अमर बनाने में संगीतकार अमाल मलिक के मधुर संगीत और गीतकार मनोज मुंतशिर के लिखे शब्दों का भी गहरा हाथ रहा। गायक अरिजीत सिंह की आवाज में सजे 'कौन तुझे' और 'बेसब्रियां' जैसे गीत संगीत प्रेमियों की जुबान पर आज भी बसे हुए हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इतना ऊर्जावान था कि जब भी सुशांत पर्दे पर धोनी के अंदाज में छक्का जड़ते, तो पूरा सिनेमा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से भर जाता था। इस फिल्म की सफलता ने सुशांत को हिंदी सिनेमा की पहली कतार के सुपरस्टार्स में ला खड़ा किया। उन्होंने धोनी के बात करने के लहजे, चाल-ढाल, आंखों के भाव और मैदान पर उनकी शांत भाव-भंगिमा को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था। स्वयं महेंद्र सिंह धोनी ने यह माना था कि सुशांत को स्क्रीन पर देखना अपने आप को आईने में देखने के समान था। इस बेजोड़ भूमिका के लिए सुशांत को फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर का नॉमिनेशन भी हासिल हुआ था।



















