हिंदी सिनेमा में जब भी बेहतरीन हास्य और सटीक कॉमिक टाइमिंग का जिक्र होता है, तो गोविंदा और कादर खान का नाम सबसे पहले सामने आता है। हालांकि बड़े पर्दे पर कादर खान ने ज्यादातर मौकों पर पिता, ससुर या परिवार के बड़े बुजुर्ग के किरदार निभाए, लेकिन उनका स्क्रीन प्रेजेंस किसी भी मुख्य अभिनेता से कम नहीं रहा। इन दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ने सिनेमाघरों में लगातार कई सफल फिल्में दीं और यह साबित कर दिया कि जब दो कुशल कलाकार एक साथ आते हैं, तो हास्य का स्तर अलग ही ऊंचाई पर पहुंच जाता है।
1993 में आंखें ने तोड़े कमाई के रिकॉर्ड
साल 1993 में डेविड धवन के निर्देशन में रिलीज हुई फिल्म आंखें उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म में गोविंदा ने दोहरी भूमिका निभाई थी, जबकि कादर खान उनके पिता हसमुख राय के किरदार में नजर आए थे। पिता और बेटे के बीच की उलझनें, गलतफहमियां और कादर खान की अनोखी डायलॉग डिलीवरी ने दर्शकों को लोटपोट कर दिया। इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर जबर्दस्त कमाई करते हुए उस दौर के तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे।
राजा बाबू और सख्त पिता की भूमिका
इसके ठीक अगले साल 1994 में राजा बाबू रिलीज हुई, जिसने इस जोड़ी की लोकप्रियता को एक नया आयाम दिया। फिल्म में कादर खान ने किशन सिंह नाम के एक ऐसे पिता का रोल निभाया जो अनुशासनप्रिय होने के साथ-साथ अपने बेटे से गहरा लगाव रखता था। दूसरी तरफ गोविंदा ने गांव के एक दिलदार लेकिन थोड़े बिगड़े हुए युवक का किरदार निभाया था। कादर खान के तीखे संवाद और गोविंदा के चेहरे के अनोखे हाव-भाव ने इस फिल्म को हर परिवार की पसंदीदा फिल्म बना दिया।
कुली नंबर 1 से शुरू हुआ नंबर 1 का सफर
साल 1995 में आई कुली नंबर 1 वह फिल्म थी जिसने बॉलीवुड में नंबर 1 टाइटल की बेहद कामयाब सीरीज की नींव रखी। इस कहानी में कादर खान ने एक बेहद घमंडी और रईस व्यक्ति चौधरी होशियार चंद का रोल निभाया, जिसकी ख्वाहिश अपनी बेटी का ब्याह किसी बेहद अमीर घराने में करने की थी। वहीं गोविंदा ने एक आम कुली राजू का किरदार निभाया, जो शादी के लिए नकली अमीर बनने का ढोंग करता है। दोनों कलाकारों की नोकझोंक और परिस्थितियों से उपजे हास्य ने दर्शकों को सिनेमाघरों में खूब हंसाया और यह 1995 की सबसे बड़ी हिट बन गई।
दो शादियों की उलझन और साजन चले ससुराल
1996 में पर्दे पर आई साजन चले ससुराल में गोविंदा और कादर खान के किरदारों के बीच की केमिस्ट्री कमाल की थी। इस फिल्म में कादर खान ने खुराना का किरदार निभाया था, जो गोविंदा के ससुर बने थे। कहानी में गोविंदा दो पत्नियों, करिश्मा कपूर और तब्बू, के बीच फंस जाते हैं और उनकी इस दोहरी जिंदगी से परेशान ससुर बने कादर खान के दृश्य बेहद मजेदार बन पड़े। यह फिल्म भी टिकट खिड़की पर बेहद सफल रही और इसके दृश्य आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
बावर्ची बनकर दिल जीतने की कवायद: हीरो नं. 1
साल 1997 की चर्चित फिल्म हीरो नं. 1 में कादर खान एक रूढ़िवादी और सख्त स्वभाव वाले अमीर शख्स दीनानाथ त्रिपाठी की भूमिका में दिखे। कहानी में गोविंदा अपनी प्रेमिका करिश्मा का दिल और उनके परिवार की मंजूरी पाने के लिए उनके घर में नौकर और बावर्ची बनकर दाखिल होते हैं। अपनी मेहनत, सादगी और हाजिरजवाबी से कादर खान को प्रभावित करने की गोविंदा की कोशिशों और दोनों के बीच की मजेदार बहसों ने फिल्म को अंत तक बांधे रखा। यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट साबित हुई।
दूल्हा राजा में ढाबे बनाम फाइव स्टार होटल की जंग
दूल्हा राजा को इस जोड़ी के करियर की सबसे बेहतरीन कॉमेडी फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म में कादर खान केके सिंघानिया नाम के एक आलीशान फाइव-स्टार होटल के मालिक बने थे, जबकि गोविंदा ने राजा का रोल किया था जो उनके होटल के ठीक सामने अपना छोटा सा ढाबा खोल लेता है। होटल के सामने से ढाबा हटवाने की जद्दोजहद से लेकर राजा के आखिरकार सिंघानिया का दामाद बनने तक की कहानी हंसी के अनगिनत मौके देती है। इस फिल्म के चुटीले संवाद आज भी कल्ट क्लासिक माने जाते हैं।
हसीना मान जाएगी से अंखियों से गोली मारे तक का सफर
गोविंदा और कादर खान का यह जादुई सफर नब्बे के दशक के अंत और दो हजार के दशक की शुरुआत में भी बदस्तूर जारी रहा। 1999 में रिलीज हुई हसीना मान जाएगी में कादर खान ने सेठ अमीरचंद का किरदार निभाया, जबकि 2002 की फिल्म अंखियों से गोली मारे में वे माखन भुवा के रूप में दिखाई दिए। इन फिल्मों ने साफ तौर पर रेखांकित किया कि गोविंदा की असीम ऊर्जा और कादर खान के संवाद लेखन व अभिनय की विविधता का कोई सानी नहीं था।

















