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अमिताभ और विनोद खन्ना की दौड़ के बीच कैसे छाए जितेंद्र, सत्तर के दशक की अनकही सफलता की कहानीमनोरंजन
10 सित॰ 2026, 3:43 pm (48 दिन पहले)· 4

अमिताभ और विनोद खन्ना की दौड़ के बीच कैसे छाए जितेंद्र, सत्तर के दशक की अनकही सफलता की कहानी

सत्तर के दशक के बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की स्टार वार के साए के बीच, जितेंद्र ने अपनी सादगी और पारिवारिक फिल्मों से बॉक्स ऑफिस पर एक नया मुकाम हासिल किया था।

हिन्दी सिनेमा के सुनहरे दौर यानी सत्तर के दशक में सिल्वर स्क्रीन पर एक अलग ही जंग छिड़ी हुई थी। उस समय अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना बॉक्स ऑफिस पर अपनी बादशाहत कायम करने के लिए आमने-सामने थे। फिल्म पत्रिकाओं के पन्नों से लेकर गलियारों तक, इन दोनों कलाकारों के स्टारडम के ही चर्चे गूंजते रहते थे। इस भारी शोर-शराबे और होड़ के बीच, जितेंद्र ने एक बिल्कुल ही अलग रास्ता चुना। वह ना तो किसी एंग्री यंग मैन की छवि के पीछे भागे और ना ही किसी तरह के विवादों में उलझे। उन्होंने अपना पूरा ध्यान पारिवारिक, संगीतमय और सरल कथाओं वाली फिल्मों पर केंद्रित रखा। उनकी यह सुनियोजित खामोशी उनके लिए एक वफादार दर्शक वर्ग तैयार कर गई, जो हर हफ्ते सिनेमाघरों में उनकी फिल्मों की सफलता की गारंटी बन जाता था।

जंपिंग जैक की पहचान और परिवार केंद्रित सिनेमा

साठ के दशक के अंतिम वर्षों में फिल्म ‘फर्ज’ की बंपर सफलता के बाद, जितेंद्र को ‘जंपिंग जैक’ का विशेष खिताब मिला था। सत्तर के दशक में उन्होंने इसी अनूठी छवि को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। जहां उस दौर में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की फिल्में अमूमन एक्शन और हिंसा से लबरेज होती थीं और युवा वर्ग को अपनी ओर खींचती थीं, वहीं जितेंद्र की फिल्मों का मुख्य निशाना पूरा परिवार होता था। महिलाएं और परिवार उनके प्रोजेक्ट्स का बेसब्री से इंतजार करते थे। उनके सदाबहार गाने, सहज अभिनय शैली और अनूठे नृत्य ने सिनेमाघरों में हमेशा एक सकारात्मक माहौल बनाए रखा।

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गंभीर किरदारों से लेकर फैंटेसी तक का सफर

सत्तर के दशक के दौरान इस अभिनेता ने विभिन्न प्रकार की शैलियों में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। वर्ष 1971 में नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित संगीतमय फिल्म ‘कारवां’ ने बॉक्स ऑफिस कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसके बाद निर्देशक गुलजार की फिल्मों जैसे ‘परिचय’ (1972) और ‘खुशबू’ (1975) में उन्होंने अपनी पुरानी एक्शन इमेज से पूरी तरह बाहर आकर बेहद संजीदा भूमिकाएं निभाईं, जिससे समीक्षक भी हैरान रह गए। उनकी इन परिपक्व प्रस्तुतियों ने साबित कर दिया कि वह केवल एक डांसिंग स्टार नहीं बल्कि एक गंभीर अभिनेता भी हैं।

ब्लॉकबस्टर फिल्मों का सिलसिला और ट्रेड की पसंद

साल 1976 में रिलीज हुई मल्टी-स्टारर फैंटेसी थ्रिलर ‘नागिन’ एक ऐतिहासिक ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई, जिसमें उनके अभिनय को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। इसके अगले ही साल यानी 1977 में मनमोहन देसाई की मेगा-हिट फिल्म ‘धरम वीर’ आई, जहां धर्मेंद्र के साथ उनकी जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा कोहराम मचाया कि यह उस साल की सबसे कामयाब फिल्मों में गिनी गई। उस समय के फिल्म निर्माताओं और व्यापार विश्लेषकों के बीच जितेंद्र को सबसे सुरक्षित दांव माना जाता था। जहां अन्य बड़े कलाकारों की फिल्मों के निर्माण में भारी-भरकम बजट और लंबे शेड्यूल की आवश्यकता होती थी, वहीं जितेंद्र अपनी असाधारण पाबंदी और अनुशासन के लिए जाने जाते थे।

अनुशासन और व्यावसायिक दूरदर्शिता

यह अभिनेता एक ही दिन में कई शिफ्टों में काम कर लेता था, जिससे यह सुनिश्चित होता था कि हर प्रोजेक्ट तय समय सीमा के भीतर पूरा होकर सिनेमाघरों तक पहुंचे। उनकी फिल्मों का बजट हमेशा नियंत्रण में रहता था, जिसके कारण वितरकों और निर्माताओं को कभी भी किसी बड़े वित्तीय जोखिम का सामना नहीं करना पड़ा। यही वजह थी कि छोटे और बड़े हर कद के प्रोड्यूसर उन्हें अपनी फिल्मों में साइन करने के लिए उत्सुक रहते थे। सत्तर के दशक के दौरान खामोशी के साथ तैयार की गई इस मजबूत नींव ने ही आगे चलकर अस्सी के दशक में उनके लिए अभूतपूर्व सफलता का मार्ग प्रशस्त किया।

सवाल-जवाब

सत्तर के दशक में बॉक्स ऑफिस पर मुख्य मुकाबला किन दो अभिनेताओं के बीच था?
सत्तर के दशक में बॉक्स ऑफिस पर मुख्य मुकाबला अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बीच था।
जितेंद्र को कौन सा लोकप्रिय खिताब मिला था?
साठ के दशक के अंत में फिल्म 'फर्ज' की सफलता के बाद जितेंद्र को जंपिंग जैक का खिताब मिला था।
जितेंद्र की फिल्में मुख्य रूप से किस वर्ग को लक्षित करती थीं?
जितेंद्र की फिल्में मुख्य रूप से पूरे परिवार और महिला दर्शकों को लक्षित करती थीं।
किस निर्देशक की फिल्मों ने जितेंद्र की एक्शन छवि को बदला?
गुलजार की फिल्मों जैसे 'परिचय' और 'खुशबू' ने उनकी छवि को बदलकर रख दिया था।
निर्माता जितेंद्र को सबसे सुरक्षित दांव क्यों मानते थे?
उनकी पंक्चुएलिटी, अनुशासन, कम बजट और समय पर फिल्में पूरी करने की आदत के कारण उन्हें सुरक्षित दांव माना जाता था।
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