उत्तराखंड में देशी गोवंश के संरक्षण और उनकी नस्ल सुधार की दिशा में काम कर रहे वैज्ञानिकों को एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक सफलता हाथ लगी है। वैज्ञानिकों ने आधुनिक प्रजनन तकनीक यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) का सहारा लेकर एक स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म कराया है। इस वैज्ञानिक प्रयोग की सबसे अनूठी बात यह है कि इस पहाड़ी नस्ल की बद्री बछिया को एक साहीवाल गाय की कोख से जन्म दिलाया गया है। 11 सितंबर को जन्मी यह बछिया पूरी तरह से स्वस्थ है और यह पूरा चमत्कार अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक की मदद से संभव हो पाया है।
पंतनगर डेयरी फार्म में पूरा हुआ अनुसंधान
इस अनूठे और जटिल वैज्ञानिक प्रयोग को पंतनगर स्थित अकादमिक डेयरी फार्म में सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। इस बड़ी उपलब्धि को हासिल करने के लिए दो प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक साझा परियोजना के तहत काम किया। इनमें आईसीआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) करनाल और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर की टीमें शामिल थीं। इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने के लिए हल्दी स्थित उत्तराखंड बायोटेक्नोलॉजी काउंसिल की तरफ से आवश्यक वित्तीय और आर्थिक मदद मुहैया कराई गई थी।
पहाड़ी गोवंश के लिए क्यों वरदान है यह तकनीक?
बद्री गाय उत्तराखंड की एक अत्यंत विशिष्ट स्थानीय नस्ल है, जिसे राज्य में राजकीय पशु का गौरवशाली दर्जा मिला हुआ है। यह गोवंश मुख्य रूप से राज्य के दुर्गम पहाड़ी और पथरीले इलाकों में पाया जाता है। हिमालय की कठिन जलवायु परिस्थितियों में जीवित रहने वाली इस विशेष नस्ल के संरक्षण और संवर्धन के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से प्रयासरत हैं। बद्री गायें अपनी बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता और औषधीय गुणों से भरपूर दूध के लिए जानी जाती हैं। हालांकि, इनकी कम आबादी और प्राकृतिक रूप से धीमी प्रजनन क्षमता के कारण इनका संरक्षण एक बड़ी चुनौती बना हुआ था।
अब इस अत्याधुनिक IVF तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों के लिए यह संभव हो गया है कि वे बेहतरीन आनुवंशिक गुणों वाली चुनिंदा बद्री गायों से अधिक संख्या में भ्रूण तैयार कर सकें। पारंपरिक गर्भाधान विधियों की तुलना में इस विधि के जरिए कम समय में श्रेष्ठ गुणों वाली नई पीढ़ी को बहुत तेजी से तैयार किया जा सकता है। इससे न केवल इस नस्ल को विलुप्त होने से बचाया जा सकेगा, बल्कि इसकी दूध उत्पादकता में भी सुधार लाया जा सकेगा।
अल्ट्रासाउंड से लेकर सरोगेसी तक की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया
इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से संपन्न किया गया। सबसे पहले वैज्ञानिकों की टीम ने उच्च गुणवत्ता वाली और अधिक दूध देने वाली बद्री गायों की पहचान की। इसके बाद, अत्याधुनिक अल्ट्रासाउंड उपकरणों की मदद से इन गायों के अंडाशय से अंडों (ओसाइट्स) को निकाला गया। इन अंडों को प्रयोगशाला में लाकर निषेचन के अनुकूल परिस्थितियों में तैयार किया गया। इसके बाद, उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड के सहयोग से प्राप्त एक उच्च कोटि के बद्री सांड के सीमेन का इस्तेमाल प्रयोगशाला में इन अंडों को निषेचित करने के लिए किया गया।
निषेचन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, बने हुए भ्रूण को कुछ दिनों तक लैब के भीतर ही विशेष रूप से विकसित और मॉनिटर किया गया। जब यह भ्रूण गर्भाशय में प्रत्यारोपण के लिए पूरी तरह अनुकूल हो गया, तो इसे एक साहीवाल नस्ल की गाय की कोख में स्थानांतरित कर दिया गया। इस साहीवाल गाय को सरोगेट मदर के रूप में पहले से ही हार्मोनल थेरेपी के जरिए तैयार किया गया था। गर्भकाल के पूरा होने पर, इसी साहीवाल गाय ने 11 सितंबर को इस स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म दिया, जिसका आनुवंशिक ढांचा पूरी तरह से बद्री नस्ल का ही है।
भविष्य के वैज्ञानिक लक्ष्य और क्लोनिंग पर काम
वैज्ञानिकों का यह महत्वाकांक्षी अभियान केवल इस एक सफलता पर ही रुकने वाला नहीं है। अनुसंधान टीम ने इस तकनीक का विस्तार करते हुए एक और क्रॉसब्रेड (मिश्रित नस्ल) की गाय को भी इसी सरोगेसी प्रक्रिया के लिए पूरी तरह तैयार कर लिया है। वैज्ञानिकों को पूरा भरोसा है कि अगले पांच से सात दिनों के भीतर वह गाय भी एक और बद्री बछड़े को जन्म देगी। इस पूरी परियोजना की नींव वर्ष 2023 में रखी गई थी, जब जीबी पंत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम.एस. चौहान के विशेष प्रयासों और मार्गदर्शन में पंतनगर विश्वविद्यालय तथा आईसीआर-एनडीआरआई करनाल के बीच वैज्ञानिक सहयोग का समझौता हुआ था। इसके बाद वैज्ञानिकों की इस समर्पित टीम ने लगातार तीन वर्षों तक प्रयोगशाला में विभिन्न स्तरों पर इस जटिल तकनीक को परिष्कृत करने के लिए कड़ा परिश्रम किया।
आईसीआर-एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने वैज्ञानिकों की इस सफलता को देश के डेयरी क्षेत्र के लिए एक अभूतपूर्व मील का पत्थर बताया है। उन्होंने कहा कि OPU-IVF (ओवम पिक-अप और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से बेहतरीन नस्ल की दुधारू गायों की संख्या को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाया जा सकता है। यह तकनीक देश के विभिन्न राज्यों के स्थानीय गोवंश के संरक्षण में क्रांतिकारी साबित हो सकती है।
इसके साथ ही, शोधकर्ता अब केवल आईवीएफ तकनीक तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बद्री गायों की क्लोनिंग तकनीक पर भी समानांतर रूप से काम कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की टीम ने प्रयोगशाला में क्लोनिंग के जरिए बद्री गाय के स्वस्थ भ्रूणों को विकसित करने में पहले ही बड़ी सफलता हासिल कर ली है। अगले चरण में, इन क्लोन किए गए और आईवीएफ से तैयार भ्रूणों को साहीवाल, क्रॉसब्रेड और सामान्य बद्री गायों के गर्भ में स्थानांतरित करने की योजना है, जिससे इस मूल्यवान पहाड़ी नस्ल को दीर्घकालिक संरक्षण प्रदान किया जा सके।


















