कुछ फिल्मी गीत ऐसे होते हैं जो केवल कानों में रस नहीं घोलते, बल्कि श्रोताओं को एक बिल्कुल अलग माहौल में ले जाते हैं। इन गानों में किसी बड़े शहर की कृत्रिम चमक नहीं होती, बल्कि इनमें मिट्टी की सौंधी खुशबू, क्षेत्रीय बोलियों का अपनापन और आम इंसानों की रोजमर्रा की जिंदगी की खट्टी-मीठी कहानियां रची-बसी होती हैं। अनुराग कश्यप की कल्ट क्लासिक फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का बेहद लोकप्रिय गाना 'ओ वुमनिया' भी इसी श्रेणी में आता है। लगभग डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी इस विशेष गीत ने भारतीय संगीत जगत में अपनी एक बहुत ही अलग पहचान और साख बनाई हुई है। इस गाने के सुरों में जो बिंदासपन और अल्हड़पन है, उसके पीछे की कहानी को अगर गहराई से समझा जाए तो यह और भी अधिक दिलचस्प लगने लगती है। यह गाना ग्रामीण और अर्ध-शहरी महिलाओं की उस आंतरिक दुनिया को बेहद खूबसूरती से दर्शाता है, जहां वे अपनी शिकायतें भी करती हैं, व्यंग्य के तीर भी चलाती हैं और अपनी अनोखी शरारतों से पूरी महफिल को अपने नाम कर लेती हैं।
जमीन पर महीनों की कड़ी रिसर्च का परिणाम
इस अद्भुत लोक-गीत को बनाने की प्रक्रिया किसी बंद एसी स्टूडियो में बैठकर शुरू नहीं हुई थी। इसके निर्माण के पीछे संगीत निर्देशक स्नेहा खानवलकर की महीनों की कड़ी मेहनत और जमीनी स्तर पर की गई गहन रिसर्च है। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के लिए एक नया और प्रामाणिक संगीत तैयार करने के उद्देश्य से स्नेहा खानवलकर ने बिहार और झारखंड के सुदूर इलाकों में लंबा समय बिताया था। उन्होंने वहां के ग्रामीण जीवन को बहुत करीब से देखा, स्थानीय लोगों से आत्मीय बातचीत की और उनकी संस्कृति को समझा। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की प्राकृतिक आवाजों, लोक वाद्यों की धुनों और महिलाओं के गीतों को अपने रिकॉर्डर में सहेजा। इस जमीनी अनुभव का नतीजा यह हुआ कि जब 'ओ वुमनिया' बनकर तैयार हुआ, तो उसमें बनावटीपन का लेशमात्र भी अंश नहीं था। इसे सुनते समय ऐसा महसूस होता है मानो हम किसी गांव की शादी के आंगन में बैठे हों, किसी मेले की चहल-पहल के बीच खड़े हों या फिर महिलाओं की किसी अनौपचारिक बैठक का हिस्सा बन गए हों। यही जीवंतता इस गाने को आज भी एक कालजयी रचना बनाती है।
वरुण ग्रोवर के बोल और स्थानीय गायिकाओं की जादुई आवाज
यह गाना उस पारंपरिक लोक-संसार की प्रतिध्वनि है जिसमें महिलाओं के सामूहिक गीतों के विभिन्न रंग साफ दिखाई देते हैं। इस रचना में प्रेम की कोमल अभिव्यक्ति भी है, अपनों से की जाने वाली मीठी शिकायतें भी हैं और रिश्तों में होने वाली नोकझोंक भी शामिल है। लेकिन इन सबसे बढ़कर इसमें एक ऐसी मासूम शरारत है जो इस पूरे गीत को बेहद खास और सदाबहार बना देती है। इस गीत को अपनी जादुई आवाजों से सजाया है गायिका खुशबू राज और रेखा झा ने, जिन्होंने इसके देसी मिजाज को पूरी तरह से आत्मसात किया। वहीं, इसके बेहद सटीक और गहरे अर्थ वाले बोल प्रसिद्ध लेखक वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं, जो लोक संस्कृति की नस-नस से वाकिफ हैं। यह गाना केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह औरतों के आपस में जुड़ने, उनके खुलकर हंसने और सामाजिक बंधनों से परे जाकर अपनी भावनाओं को बेबाक तरीके से व्यक्त करने का एक उत्सव है। इसके जरिए महिलाएं उन बातों को भी हंसते-हंसते कह जाती हैं, जिन्हें वे सामान्य रूप से समाज के सामने सीधे तौर पर कहने से कतराती हैं।
हिंसक पृष्ठभूमि के बीच महिलाओं की चुलबुली दुनिया
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की कहानी मुख्य रूप से धनबाद के वासेपुर इलाके के कुख्यात कोयला माफिया, दो बड़े परिवारों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही दुश्मनी, खूनी बदले की भावना और वर्चस्व की जंग पर आधारित है। फिल्म के इस हिंसक माहौल में जहां एक तरफ सरदार खान (मनोज बाजपेयी) और फैजल खान (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) जैसे पुरुष किरदार बंदूक की नोक पर अपने साम्राज्य और दहशत को बनाए रखने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पुरुष-प्रधान और डरावने माहौल के बीच घर की औरतें अपनी एक अलग, सुरक्षित और खुशमिजाज दुनिया का निर्माण करती हैं। नगमा खातून (रिचा चड्ढा) और मोहसिना (हुमा कुरैशी) जैसी सशक्त महिला किरदार इस बात का बेहतरीन उदाहरण हैं। वे इस हिंसक दुनिया में रहते हुए भी अपनी चुलबुली मुस्कान, मजबूत इरादों और आंतरिक स्वतंत्रता को खोने नहीं देती हैं। 'ओ वुमनिया' गाना वास्तव में इन्हीं महिलाओं के इसी जीवंत अस्तित्व, उनकी अंदरूनी ताकत और विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराने की कला का एक शानदार संगीतमय प्रतीक है।



















