सिनेमा और टेलीविज़न जगत में दशकों तक अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले वरिष्ठ अभिनेता सुरेश ओबेरॉय ने साल 2004 में राजनीति का रुख किया था। भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा था, लेकिन कुछ ही समय में उनका राजनीति से मोहभंग हो गया और उन्होंने इस रास्ते से पूरी तरह दूरी बना ली। निधि वासंदानी के साथ हुई एक खास बातचीत में सुरेश ओबेरॉय ने अपने इस छोटे से राजनीतिक सफर के अनुभवों को खुलकर साझा किया है। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके आध्यात्मिक गुरु ने उन्हें राजनीति में जाने से सख्त मना किया था और राजनीति के अंदरूनी माहौल से उनका मन क्यों भर गया।
कॉलेज के दिनों का विचार और बीजेपी में प्रवेश
सुरेश ओबेरॉय ने बताया कि राजनीति में कदम रखने का शुरुआती विचार उनके कॉलेज के दिनों से जुड़ा हुआ है, जब वे हैदराबाद में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय उनके एक करीबी दोस्त ने उनके घर आकर यह सुझाव दिया था कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी से जुड़ना चाहिए। उस दौर में सुरेश ओबेरॉय अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुके थे और राजनीति को एक नए अनुभव तथा देश सेवा के अवसर के रूप में देख रहे थे। वे समझना चाहते थे कि राजनीति की दुनिया में उनकी क्या भूमिका हो सकती है और यह सफर उन्हें किस दिशा में ले जाएगा।
आखिरकार साल 2004 में उन्होंने अपने दोस्त के साथ जाकर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली। राजनीति में कदम रखते ही उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मिलने का अवसर मिला। इस दौरान उनकी मुलाकात लालकृष्ण आडवाणी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे देश के दिग्गज नेताओं से हुई। इन वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात के बाद शुरुआती दिनों में वे अपने नए सफर को लेकर काफी उत्साहित थे और इसे एक सकारात्मक बदलाव मान रहे थे।
गुरु जी की नाराजगी और सख्त डांट
जब सुरेश ओबेरॉय ने राजनीति में शामिल होने की तैयारी कर ली, तब उन्होंने इस फैसले के बारे में अपने आध्यात्मिक गुरु जी को बताया। हालांकि, गुरु जी को उनका यह कदम बिल्कुल पसंद नहीं आया। जैसे ही गुरु जी को पता चला कि सुरेश ओबेरॉय राजनीति में प्रवेश करने जा रहे हैं, उन्होंने अभिनेता को जबरदस्त डांट लगाई और अपनी सख्त नाराजगी जाहिर की।
उस घटना को याद करते हुए सुरेश ओबेरॉय ने बताया कि उन्होंने अपने गुरु जी को इससे पहले किसी पर भी इतना गुस्सा होते या इतनी कड़ी फटकार लगाते कभी नहीं देखा था। गुरु जी ने उन्हें सख्त लहजे में हिदायत दी कि वे राजनीति और राजनेताओं के माहौल से पूरी तरह दूर रहें। गुरु जी की इस भारी चेतावनी और डांट के बावजूद सुरेश ओबेरॉय ने उस समय राजनीति में आगे बढ़ने का मन बना लिया था।
उत्साह में कमी और सोच में बदलाव
शुरुआत में काफी उत्साहित रहने के बावजूद, समय बीतने के साथ सुरेश ओबेरॉय का राजनीति से मन हटने लगा। उन्होंने महसूस किया कि राजनीति के अंदरूनी माहौल में उनका दिल नहीं लग रहा है और अंदर से उनकी आत्मा इस फैसले की गवाही नहीं दे रही है। उनकी व्यक्तिगत ऊर्जा और राजनीति का माहौल आपस में मेल नहीं खा रहे थे, जिसके कारण वे अंदर से खुश नहीं रह पा रहे थे। आखिरकार उन्होंने राजनीति से दूर रहने का फैसला किया।
इसके अलावा, राजनीति को लेकर उनकी सोच में भी बड़ा बदलाव आया। राजनीति में आने से पहले उनका मानना था कि लोग देश की सेवा करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में आते हैं। लेकिन अपने जमीनी अनुभवों के बाद उन्हें लगा कि कई लोग देश सेवा के बजाय केवल पैसा कमाने के इरादे से राजनीति में शामिल होते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे यह बात सभी राजनेताओं के लिए नहीं कह रहे हैं और ना ही किसी एक व्यक्ति विशेष पर निशाना साध रहे हैं।
शीर्ष नेतृत्व से सहमति और जमीनी स्तर पर विच्छेद
सुरेश ओबेरॉय ने बातचीत के दौरान यह साफ किया कि उन्हें पार्टी के शीर्ष नेताओं की नियत और नेतृत्व पर पूरा भरोसा था। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे वरिष्ठ नेताओं की विचारधारा और काम करने के तरीके से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं और उनका सम्मान करते हैं।
उनकी मुख्य समस्या अपने आसपास के तात्कालिक राजनीतिक माहौल और वहां मौजूद लोगों से थी। अभिनेता के अनुसार, उनके आसपास के लोगों की ऊर्जा और विचार उनसे मेल नहीं खाते थे और वे लोग उन्हें सच्चे नहीं लगते थे। इसी वैचारिक और व्यावहारिक तालमेल की कमी के कारण आखिरकार उन्होंने राजनीतिक जीवन को हमेशा के लिए अलविदा कहने का फैसला किया।



















