बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन मिश्रा के खिलाफ कानूनी बिरादरी और छात्र संगठनों का आक्रोश अब सड़कों पर उतर आया है। नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के विद्यार्थियों के वकालत नामांकन पर रोक लगाने संबंधी विवादित आदेश के विरोध में ऑल इंडिया यंग एडवोकेट्स एसोसिएशन और कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े सदस्यों ने 20 अगस्त की सुबह 10 बजे लीगल कॉकरोच प्रदर्शन का आह्वान किया है। हालांकि विवाद बढ़ने के तुरंत बाद बीसीआई ने अपना फैसला वापस ले लिया था और स्वतंत्रता दिवस पर चेयरमैन ने छात्रों से खेद भी प्रकट किया था, लेकिन बार संघों और वकीलों की मांग है कि नियामक संस्था के शीर्ष पद पर बैठे प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
नालसार के दीक्षांत समारोह से शुरू हुआ था विवाद
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्र समुदाय द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखे गए एक पत्र से हुई थी। विद्यार्थियों ने संस्थान के कुलपति, रजिस्ट्रार और शिक्षकों को पत्र भेजकर आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने पर अपनी असहमति जताई थी। छात्रों ने 20 जुलाई को नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़ी एक याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की मौखिक टिप्पणियों का हवाला दिया था। छात्रों का तर्क था कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं।
बीसीआई का कड़ा रुख और कुछ ही घंटों में यू-टर्न
छात्रों के इस पत्र के सामने आने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने बेहद कड़ा रुख अपनाया। बीसीआई ने देश के सभी राज्य बार काउंसिलों को तत्काल निर्देश जारी कर दिया कि वे नालसार के 2026 बैच के किसी भी लॉ स्नातक का एडवोकेट के रूप में एनरोलमेंट अगले आदेश तक रोक दें। इसके साथ ही बीसीआई ने इस पूरे घटनाक्रम को मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक योजनाबद्ध अभियान करार देते हुए जांच की घोषणा कर दी। इस फैसले की खबर फैलते ही सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में तीखी आलोचना शुरू हो गई। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कार्रवाई को असंवैधानिक बताते हुए सड़कों पर प्रदर्शन की चेतावनी दी। चौतरफा दबाव के कारण बीसीआई को महज कुछ ही घंटों के भीतर अपना आदेश वापस लेना पड़ा और संशोधित बयान जारी करना पड़ा कि कुछ छात्रों की गतिविधि के लिए पूरे बैच को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और कानूनी संरक्षण
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी बीसीआई की कार्रवाई पर सख्त रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्रों के पास अपनी बात शांतिपूर्ण और वैधानिक दायरे में रखने का मौलिक अधिकार है और बीसीआई के पास इसमें बाधा डालने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने बीसीआई और राज्य बार काउंसिलों को सख्त निर्देश दिए कि इस मामले से जुड़े किसी भी छात्र या शिक्षक के खिलाफ कोई दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई न की जाए। इसके अतिरिक्त अदालत ने भविष्य में ऐसे मनमाने फैसले रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने संबंधी याचिका को स्वीकार करते हुए बीसीआई को औपचारिक नोटिस भी जारी कर दिया है।
स्वतंत्रता दिवस पर माफी और इस्तीफे की उठती मांग
विवाद के गहराने के बाद मनन मिश्रा ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सार्वजनिक बयान जारी कर कानून के छात्रों से माफी मांगी थी। उन्होंने स्वीकार किया कि हालिया घटनाक्रम से छात्रों के मन में भारी अनिश्चितता और चिंता पैदा हुई है, और यदि उनके किसी पत्र या बयान से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वे इस पर खेद व्यक्त करते हैं। इसके बावजूद बार एसोसिएशनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। बॉम्बे बार एसोसिएशन ने भी मंगलवार को बैठक कर बीसीआई अध्यक्ष मनन मिश्रा के तत्काल इस्तीफे की मांग का प्रस्ताव पारित किया।
सड़क पर उतरा विरोध और संस्थागत जवाबदेही
सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास के अनुसार 20 अगस्त का प्रदर्शन केवल एक आदेश की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानूनी निकायों में पारदर्शिता और उच्च नैतिक मानकों की स्थापना के लिए है। युवा वकीलों का मानना है कि बीसीआई का शुरुआती कदम छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ था। भले ही बीसीआई बैकफुट पर आ गई हो, लेकिन लीगल कॉकरोच प्रदर्शन यह तय करेगा कि भारत में बार संस्थाएं अपने फैसलों के प्रति किस सीमा तक जवाबदेह रहेंगी।





















