भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार अमिताभ बच्चन जब अपने अभिनय करियर के चरम पर थे, तब देश के राजनीतिक फलक पर एक अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिला था। करीबी पारिवारिक मित्रता और विश्वास के कारण उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा, एक दिग्गज राजनेता को भारी मतों से शिकस्त दी और संसद पहुंचे। हालांकि, जिस अप्रत्याशित अंदाज में उनकी सियासी पारी शुरू हुई थी, उसका अंत भी उतना ही चौंकाने वाला रहा। केवल तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़कर राजनीति को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इस पूरे घटनाक्रम और उनके इस्तीफे के पीछे की परिस्थितियों को लेकर वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार तवलीन सिंह ने विस्तार से रोशनी डाली है।
1984 का चुनावी मुकाबला और बहुगुणा के खिलाफ बड़ी जीत
साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में आम चुनाव कराए गए थे। उस नाजुक दौर में राजीव गांधी के कहने पर अमिताभ बच्चन कांग्रेस के टिकट पर उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद सीट से चुनाव मैदान में उतरे। उस दौर में अमिताभ फिल्मी पर्दे के बेताज बादशाह माने जाते थे, जबकि उनके सामने उत्तर प्रदेश की राजनीति के कद्दावर चेहरे हेमवती नंदन बहुगुणा मैदान में डटे थे। यह मुकाबला देश के सबसे चर्चित चुनावी मुकाबलों में शुमार हो गया था, जहां एक तरफ जमीनी राजनीति का लंबा तजुर्बा था तो दूसरी तरफ सिनेमाई लोकप्रियता का शिखर।
जब मतगणना के नतीजे सामने आए तो उन्होंने पूरे देश के राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डाल दिया। इस चुनाव में अमिताभ बच्चन को 2,97,461 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी हेमवती नंदन बहुगुणा के खाते में 1,09,666 वोट आए। इस तरह अमिताभ बच्चन ने करीब 1.88 लाख वोटों के विशाल अंतर से विजय पताका फहराई थी। सिनेमा से सीधे संसद तक का यह सफर उस समय भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी सुर्खियों में दर्ज हुआ था।
जमीनी गरीबी का सामना और शुरुआती मोहभंग
संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के तुरंत बाद वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने अमिताभ बच्चन से बातचीत की थी। उस मुलाकात को याद करते हुए तवलीन सिंह ने बताया कि चुनावी प्रचार और गांवों के दौरे के दौरान देश की भयानक निर्धनता देखकर अमिताभ बेहद हैरान और विचलित रह गए थे। इस बातचीत में अमिताभ बच्चन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, "मुझे इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि देश में इस तरह की भयानक गरीबी भी है।"
फिल्मी चमक-दमक की दुनिया से निकलकर जब वह आम मतदाताओं के बीच पहुंचे, तो वहां की बुनियादी समस्याओं और अभावों ने उन पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर डाला। जनता की वास्तविक स्थिति और संसद की कार्यप्रणाली के बीच के अंतर को देखकर उनका शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे घटने लगा था, हालांकि यह उनके राजनीति से अलग होने का एकमात्र कारण नहीं था।
बोफोर्स तोप सौदा और बच्चन परिवार पर लगे आरोप
साल 1987 आते-आते अमिताभ बच्चन का राजनीति से पूरी तरह मोहभंग हो गया और उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा सौंप दिया। इस अप्रत्याशित कदम के पीछे सिर्फ गरीबी का भावनात्मक सदमा नहीं था, बल्कि स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स से जुड़ा तोपों का सौदा मुख्य वजह बनकर उभरा। 1980 के दशक में भारतीय सेना को 155 एमएम हॉवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए हुए इस सौदे में 64 करोड़ रुपये की दलाली और घूसखोरी के संगीन आरोप लगे थे।
इस पूरे रक्षा घोटाले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके इटैलियन मित्र ओटावियो क्वात्रोची की भूमिका पर तीखे सवाल खड़े किए जा रहे थे। उसी राजनीतिक तूफान के बीच विपक्ष और जांच के दायरे में बच्चन परिवार का नाम भी घसीटा जाने लगा। इस विवाद में नाम उछलने से अमिताभ बच्चन और उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन बेहद आहत और मानसिक रूप से परेशान हो गए थे।
गांधी परिवार से बढ़ती दूरियां और संसद से इस्तीफा
तवलीन सिंह के अनुसार, जब बोफोर्स विवाद में अमिताभ बच्चन और उनके परिवार को निशाना बनाया जा रहा था, तब सत्ता के गलियारों से उन्हें वह सुरक्षा और समर्थन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। राजीव गांधी अपने परिवार और ओटावियो क्वात्रोची को राजनीतिक संकट से उबारने के प्रयासों में उलझे रहे, लेकिन उन्होंने अमिताभ बच्चन के बचाव में खुलकर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया और न ही अफवाहों का खंडन करने की पुरजोर कोशिश की।
इस उपेक्षा और चुप्पी ने अमिताभ बच्चन को भीतर तक ठेस पहुंचाई, जिससे दोनों पुराने परिवारों के आपसी संबंधों में भारी कड़वाहट आ गई। इसी गहरे अविश्वास और अपमान के माहौल में अमिताभ ने 1987 में संसद की सदस्यता छोड़ दी और राजनीति से हमेशा के लिए किनारा कर लिया।
स्वीडिश जांच अधिकारी का खुलासा और आरोपों से राहत
बोफोर्स के इस लंबे और विवादित प्रकरण में दशकों बाद एक बड़ा मोड़ आया, जब साल 2012 में स्वीडन के पूर्व पुलिस अधिकारी स्टेन लिंडस्ट्रॉम का बयान सामने आया। लिंडस्ट्रॉम बोफोर्स दलाली मामले की आधिकारिक जांच से सीधे जुड़े रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमिताभ बच्चन का नाम इस मामले में भारतीय जांचकर्ताओं की ओर से जोड़ा गया था और उनके खिलाफ किसी भी तरह की संलिप्तता का कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं था।
स्वीडिश जांच अधिकारी के इस बयान के बाद अमिताभ बच्चन ने सार्वजनिक रूप से राहत व्यक्त की थी। वर्षों तक चले राजनीतिक और कानूनी साये से उनका नाम साफ हुआ, जिसने यह साबित कर दिया कि 1980 के दशक की इस सियासी चाल ने एक बड़े कलाकार के संसदीय जीवन को समय से पहले ही खत्म कर दिया था।



















