उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों से जुड़ी व्यवस्था पर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने उस लोकप्रिय धारणा को पूरी तरह खारिज किया जिसमें अक्सर यह दावा किया जाता है कि न्यायपालिका में केवल न्यायाधीश ही अपने साथी न्यायाधीशों को चुनते हैं। जस्टिस दत्ता के अनुसार यह बात महज एक भ्रम है जिसे कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा गढ़े गए नैरेटिव के जरिए आम जनता के बीच फैलाया गया है। हकीकत यह है कि न्यायिक नियुक्तियों की समग्र प्रक्रिया में केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकारों की कार्यपालिका, खुफिया एजेंसियां और अन्य प्रशासनिक प्राधिकरण विस्तृत जांच और अपनी इनपुट के साथ सक्रिय भूमिका निभाते हैं। अंततः इन सभी चरणों से गुजरने के बाद ही किसी नाम पर राष्ट्रपति की अंतिम मुहर लगती है और औपचारिक नियुक्ति वारंट जारी होता है।
चुनाव आयुक्त नियुक्ति मामले में आई अलग राय
जस्टिस दीपांकर दत्ता की यह विस्तृत टिप्पणियां वर्ष 2023 के उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आए उनके अलग फैसले का हिस्सा हैं, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि निर्वाचन आयोग की चयन समिति की संरचना की तुलना जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम तंत्र से की जा सकती है। हालांकि जस्टिस दत्ता ने केंद्र की इस दलील को पूरी तरह अनुचित ठहराया। उन्होंने रेखांकित किया कि निर्वाचन आयुक्तों के चयन ढांचे में किसी बाहरी या स्वतंत्र तत्व की अनुपस्थिति की तुलना न्यायिक कॉलेजियम से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों की प्रकृति और संवैधानिक जरूरतें बिल्कुल अलग हैं। इस मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो जजों की पीठ के बीच असहमति का फैसला सामने आया, जिसके बाद इस कानूनी विवाद को उचित संविधान पीठ के गठन के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेज दिया गया है।
सिफारिशों पर सरकारी छानबीन और कॉलेजियम की पवित्रता पर असर
जस्टिस दत्ता ने कॉलेजियम प्रणाली के संचालन में कार्यपालिका के हस्तक्षेप और उसके चुनिंदा रवैये को लेकर भी अत्यंत गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कॉलेजियम कई नामों की एक समेकित सूची तैयार करके केंद्र को भेजता है, और सरकार उनमें से अधिकांश नामों को हरी झंडी दे देती है किंतु कुछ चुनिंदा नामों को रोक लेती है या ठंडे बस्ते में डाल देती है, तो इससे पूरी सिफारिश की गरिमा और पवित्रता पर गहरा आघात पहुंचता है। इस तरह का आंशिक चयन कॉलेजियम के मूल प्रस्ताव को कमजोर बना देता है। जस्टिस दत्ता ने सवाल उठाया कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के मध्य ऐसा असहज खिंचाव आखिर कब तक जारी रह सकता है।
हॉब्सन चॉइस की स्थिति और टकराव टालने की मजबूरी
अपने विश्लेषण में जस्टिस दत्ता ने बताया कि सरकार द्वारा कुछ नामों को रोके जाने या उनमें लंबी देरी किए जाने के बावजूद कॉलेजियम लगातार नई सिफारिशें भेजता रहता है। कॉलेजियम का यह रुख न्याय व्यवस्था के कामकाज को निर्बाध गति से चलाने और कार्यपालिका के साथ खुले संवैधानिक टकराव से बचने के उद्देश्य से होता है। उन्होंने इस पूरी व्यवस्था की तुलना एक ऐसी विवशता से की जिसे अंग्रेजी में हॉब्सन चॉइस कहा जाता है, जहां अदालत के पास व्यवस्था को थामे रखने के अलावा कोई वास्तविक या बेहतर विकल्प नहीं बचता। कार्यपालिका की यह शक्ति कि वह नियुक्तियों को लटकाए रखे, न्यायिक स्वतंत्रता के संतुलन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर के संवैधानिक आदर्शों पर गहरा दबाव
इस फैसले में जस्टिस दत्ता ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के मूल दृष्टिकोण को भी विस्तार से उद्धृत किया। उन्होंने स्मरण कराया कि डॉ. अंबेडकर का स्पष्ट विचार था कि भारतीय न्यायपालिका को कार्यपालिका के सीधे दबाव और नियंत्रण से पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए, साथ ही वह अपने आंतरिक निर्णयों में पूर्णतः सक्षम और स्वायत्त भी रहे। जस्टिस दत्ता ने चिंता व्यक्त की कि समकालीन परिस्थितियों में बाबासाहेब अंबेडकर का यह महान संवैधानिक सपना धुंधला पड़ता नजर आ रहा है और वर्तमान कार्यप्रणाली के कारण गंभीर दबाव का सामना कर रहा है। न्यायपालिका को कार्यपालिका के प्रभाव से अलग रखने की मूल संवैधानिक भावना आज एक कठिन दौर से गुजर रही है।
कमियों के बावजूद कॉलेजियम ही सबसे व्यावहारिक व्यवस्था
हालांकि जस्टिस दत्ता ने कॉलेजियम प्रणाली की सभी आलोचनाओं को सिरे से खारिज नहीं किया। उन्होंने खुले दिल से स्वीकार किया कि कॉलेजियम के कामकाज में मानवीय खामियां, पारदर्शिता की कमी और कुछ अपवाद मौजूद रहे हैं। लेकिन उनका यह भी मानना था कि कुछ व्यक्तिगत निर्णयों या गलतियों के आधार पर समूची व्यवस्था को दोषपूर्ण या अनुपयोगी करार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि मानव द्वारा संचालित किसी भी प्रणाली में शत-प्रतिशत त्रुटिहीनता की गारंटी देना असंभव है। इन तमाम विसंगतियों के बावजूद, भारत में न्यायिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए कॉलेजियम व्यवस्था अब भी सबसे व्यावहारिक और यथार्थवादी साधन बनी हुई है। उन्होंने आशा जताई कि मौजूदा और भावी कॉलेजियम भविष्य में और अधिक विवेकपूर्ण, न्यायसंगत और परिपक्व निर्णय लेकर संस्था की साख को मजबूत करेंगे।



















