भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से आम बोलचाल की भाषा को अमर बना दिया। ऐसे ही एक असाधारण कलाकार थे गीतकार अनजान, जिनकी सादगी और गहराई से सजे गीतों ने दशकों तक लोगों के दिलों पर राज किया। बनारस की मिट्टी में जन्मे इस महान कवि का असली नाम लालजी पांडेय था। मायनगरी मुंबई में कदम रखने से लेकर शोहरत के शिखर पर पहुंचने तक का उनका सफर आसान नहीं था। उन्हें अपनी पहचान स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अपनी अटूट लगन और बेजोड़ लेखन शैली के दम पर उन्होंने बॉलीवुड संगीत को एक नई दिशा दी।
बनारस के ओदार गांव से बीएचयू तक का सफर
अनजान का जन्म 28 अक्टूबर 1930 को उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास स्थित ओदार गांव में हुआ था। उनके पिता शिवनाथ पांडेय और माता इंदिरा देवी ने उनका नाम लालजी पांडेय रखा था। ग्रामीण परिवेश और बनारस के सांस्कृतिक माहौल ने बचपन से ही उनके भीतर साहित्य के प्रति गहरी रुचि पैदा कर दी थी। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) से पूरी की, जहां से उन्होंने एम.कॉम की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही उनका झुकाव कविता और शायरी की तरफ बढ़ने लगा था। वे स्थानीय कवि सम्मेलनों में सक्रिय रहने लगे और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपने लगीं। उनके साहित्यिक हुनर को देखते हुए उनके करीबी दोस्तों ने उन्हें 'अनजान' उपनाम दिया, जो आगे चलकर उनकी वास्तविक पहचान बन गया।
गायक मुकेश के साथ मुलाकात और मुंबई का रुख
बनारस के एक स्थानीय होटल में आयोजित एक संगीत समारोह के दौरान अनजान की मुलाकात देश के मशहूर पार्श्व गायक मुकेश से हुई। अनजान ने उस कार्यक्रम में अपनी कुछ स्वरचित काव्य रचनाएं सुनाईं। मुकेश उनके शब्दों की गहराई और भावुकता से बेहद प्रभावित हुए। मुकेश ने अनजान के भीतर छुपी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें एक अमूल्य सलाह दी और कहा कि आपको अपनी इस कला को सही मंच देने के लिए मुंबई जाना चाहिए। इस प्रोत्साहन के बाद, अपनी आंखों में गीतकार बनने का सपना संजोकर अनजान ने साल 1951 में मुंबई का रुख किया।
संघर्ष के शुरुआती दिन: लोकल ट्रेनें और सीढ़ियों का सहारा
मायनगरी में शुरुआती कदम रखते ही अनजान को कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ा। बिना किसी गॉडफादर या पहचान के फिल्मों में काम पाना बेहद मुश्किल था। पैसों की भारी तंगी के कारण उन्हें अपने रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू करना पड़ा। रहने के लिए कोई ठिकाना न होने के कारण वे कई रातें लोकल ट्रेनों के डिब्बों में सफर करते हुए बिताते थे, तो कभी किसी बिल्डिंग के अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे सोकर रात काटते थे। इस कठिन दौर में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। साल 1953 में उन्हें प्रेमनाथ प्रोडक्शन की फिल्म 'प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा' में गीत लिखने का पहला अवसर मिला। इस फिल्म के लिए उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी' जैसे गीत लिखे, लेकिन ये फिल्में उन्हें वह पहचान नहीं दिला सकीं जिसकी उन्हें तलाश थी।
दो दशकों का लंबा इंतजार और कामयाबी का स्वाद
फिल्म इंडस्ट्री में खुद को साबित करने के लिए अनजान को लगभग 20 वर्षों का लंबा और थका देने वाला संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान वे लगातार छोटी फिल्मों, कम बजट की परियोजनाओं और गैर-फिल्मी एलबमों के लिए गीत लिखते रहे। साठ के दशक में संगीतकार जीएस कोहली के निर्देशन में बनी फिल्म 'लंबे हाथ' का गाना 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन वतन' काफी लोकप्रिय हुआ, जिसने अनजान के काम की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद साल 1963 में पंडित रविशंकर के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'गोदान' के गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया' ने उन्हें व्यापक स्तर पर ख्याति दिलाई। इस गाने की सफलता के बाद उनके करियर ने रफ्तार पकड़ी और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
दिग्गज संगीतकारों के साथ जुगलबंदी और भोजपुरी सिनेमा में योगदान
सफलता का स्वाद चखने के बाद अनजान इंडस्ट्री के सबसे व्यस्त गीतकारों में शामिल हो गए। उन्होंने ओपी नैयर के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'बहारे फिर भी आईं' के लिए कालजयी गीत 'आप के हसीन रुख' लिखा। इसके बाद जीपी सिप्पी की फिल्म 'बंधन' में उनके लिखे गीत 'बिना बादरा के बिजुरिया कैसे बरसे' ने धूम मचा दी। वे धीरे-धीरे कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन और बप्पी लहरी जैसे दिग्गज संगीतकारों के पसंदीदा लेखक बन गए। अनजान ने केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि भोजपुरी सिनेमा को भी कई सदाबहार गाने दिए। उनके द्वारा फिल्म 'बलम परदेसिया' के लिए लिखा गया गीत 'गोरकी पतरकी रे' एक ब्लॉकबस्टर हिट साबित हुआ, जिसे आज भी बड़े चाव से सुना जाता है।
अमिताभ बच्चन के साथ ऐतिहासिक जुड़ाव और अंतिम सफर
गीतकार अनजान को सबसे ज्यादा लोकप्रियता और व्यावसायिक सफलता महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्मों से मिली। अमिताभ बच्चन के अभिनय से सजी फिल्म 'डॉन' का बेहद लोकप्रिय गीत 'खइके पान बनारस वाला' लिखकर उन्होंने इतिहास रच दिया। इसके अलावा उन्होंने 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस' और 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसी सुपरहिट फिल्मों के लिए कई शानदार और कालजयी गीत लिखे। अपने पूरे करियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिए 1500 से ज्यादा गीत लिखने वाले अनजान, मशहूर गीतकार समीर अनजान के पिता थे। समीर का आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट उनके पिता की यादों और रचनाओं को सहेजने का काम करता है।
समीर के अनुसार, उनके पिता के गीतों में उत्तर प्रदेश की मिट्टी की महक, भोजपुरी संस्कृति और वहां का लोक-जीवन हमेशा जीवंत रहा। यही कारण था कि वे 'खाईके पान बनारस वाला' या 'बिना बदरा के बिजुरिया' जैसे गीतों को इतनी सहजता और प्रामाणिकता के साथ लिख पाए। अनजान के अपने पसंदीदा गीतों में फिल्म 'बदलते रिश्ते' के गीत, 'अपने रंग हजार' और फिल्म 'गंगा की सौगंध' का मशहूर गीत 'मानो तो मैं गंगा मां हूं मानो तो बहता पानी' और 'चल मुसाफिर' शामिल थे। 13 सितंबर 1997 को इस महान गीतकार का निधन हो गया। उनके निधन से कुछ महीने पहले ही उनके एकमात्र कविता संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' का विमोचन खुद अमिताभ बच्चन के हाथों हुआ था।


















