26 अगस्त को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली फिल्म 'टॉक्सिक' से दर्शकों और फिल्म उद्योग को बहुत बड़ी उम्मीदें थीं। 'केजीएफ चैप्टर 2' की ऐतिहासिक सफलता के बाद कन्नड़ सुपरस्टार यश ने पूरे चार साल तक किसी भी नए प्रोजेक्ट को साइन करने में जल्दबाजी नहीं दिखाई। वे अपनी पैन-इंडिया स्टारडम की छवि को और मजबूत करना चाहते थे। जब फिल्म सिनेमाघरों में आई, तो इसने पहले ही दिन दुनियाभर में 140 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बॉक्स ऑफिस कलेक्शन करके तहलका मचा दिया। हालांकि, 500 करोड़ रुपये के भारी बजट से तैयार हुई यह फिल्म शुरुआती धमाके के बाद अपनी रफ्तार बरकरार नहीं रख सकी और इसका कुल वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन अब तक लगभग 300 करोड़ रुपये पर ही अटका हुआ है।
लंबे इंतजार और भारी उम्मीदों का दबाव
चार साल की लंबी अवधि किसी भी बड़े अभिनेता के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है। पर्दे से इतने समय तक दूर रहने के कारण दर्शकों के मन में उम्मीदों का एक विशाल पर्वत खड़ा हो जाता है। प्रशंसक केवल एक सामान्य सिनेमाई अनुभव के लिए टिकट नहीं खरीद रहे थे, बल्कि वे रॉकी भाई वाले उसी विशाल और करिश्माई स्क्रीन प्रेजेंस को दोबारा महसूस करने आए थे। यही वजह रही कि स्क्रीनप्ले में उस चार साल लंबे इंतजार और अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा, जिसे संभालना फिल्म के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया।
मास अपील और एक्सपेरिमेंटल थ्रिलर का उलझाव
यश के सामने सबसे मुख्य चुनौती रॉकी भाई की अत्यधिक लोकप्रिय और हावी छवि से बाहर निकलने की थी। फिल्म के प्रचार के दौरान इसे एक डार्क, हिंसक और आधुनिक दौर के थ्रिलर सिनेमा के रूप में पेश किया गया। निर्देशक गीतू मोहनदास का विजन कागज पर तो बेहद आकर्षक लग रहा था, लेकिन पर्दे पर उतरते ही फिल्म दो विरोधाभासी दिशाओं में बहती नजर आई। एक तरफ तो यह यश के स्थापित मास-स्टार स्वैग का लाभ उठाने की कोशिश कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ यह एक प्रयोगात्मक साइकोलॉजिकल थ्रिलर बनने की होड़ में थी। इस दोहराव ने फिल्म के टोन को अनिश्चित बना दिया, जिससे दर्शक भ्रमित रह गए।
तकनीकी चमक के बीच भावना का अभाव
किसी भी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अमर बनाने के लिए उसके भीतर एक मजबूत भावनात्मक जुड़ाव का होना जरूरी है। 'केजीएफ' की मुख्य ताकत रॉकी का अपनी मां से किया गया वादा था, जिसने हर वर्ग के दर्शक को दिल से जोड़ा। इसके विपरीत 'टॉक्सिक' में निर्देशक का पूरा ध्यान बेहतरीन वीएफएक्स, डार्क सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर जैसी तकनीकी चीजों पर ही केंद्रित रहा। फिल्म तकनीकी रूप से समृद्ध और पॉलिश्ड तो लगती है, लेकिन इसकी पटकथा में वह भावनात्मक गहराई नहीं थी जो दर्शकों को बांधकर रख सके। बिखरी हुई कहानी के कारण लोग यश के किरदार के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाए।
क्षेत्रीय जड़ों से दूरी और पैन-इंडिया सबक
'केजीएफ' की सफलता का मुख्य कारण उसका मिट्टी से जुड़ा कन्नड़ फ्लेवर और देसी मिजाज था, जिसने बाद में वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई। हालांकि, 'टॉक्सिक' ने शुरुआत से ही एक बनावटी ग्लोबल प्रारूप अपनाने की कोशिश की। देश-विदेश के विभिन्न भाषाओं के कलाकारों को एक साथ लाकर और पश्चिमी सिनेमा की तर्ज पर एक जटिल डार्क दुनिया गढ़कर, फिल्म ने अपनी मौलिक भारतीय मास अपील को खो दिया। 500 करोड़ के बजट और स्टाइलिश टीजर के बावजूद, 'टॉक्सिक' का प्रदर्शन यह साबित करता है कि मजबूत कहानी और भावनात्मक जुड़ाव के बिना केवल स्टारडम के दम पर फिल्म को लंबी रेस का घोड़ा नहीं बनाया जा सकता।



















