सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई और इस विशाल ब्रह्मांड का आरंभ कहां से हुआ, यह विषय हमेशा से मानव जाति के लिए कौतुक और जिज्ञासा का केंद्र रहा है। आसमान में टिमटिमाते अनंत तारे और अंतरिक्ष के अनगिनत ग्रह-नक्षत्र इस जिज्ञासा को और अधिक प्रगाढ़ कर देते हैं। हर जिज्ञासु मन में सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि आखिर इन खगोलीय पिंडों और इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना का आधार क्या था। आज का आधुनिक खगोल विज्ञान और एस्ट्रो फिजिक्स इन सवालों के सटीक उत्तर तलाशने में लगातार जुटे हुए हैं, लेकिन आज से करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व रचित मनुस्मृति में इस विषय पर बहुत गहराई से प्रकाश डाला गया है।
मनुस्मृति को दुनिया के प्राचीनतम ग्रंथों में शुमार किया जाता है, जिसमें ब्रह्मांड से जुड़े कई जटिल रहस्यों का उल्लेख मिलता है। दिलचस्प बात यह है कि इस ग्रंथ में वर्णित अधिकांश बातें आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से काफी हद तक मेल खाती हैं। इस ग्रंथ के पहले अध्याय में सृष्टि के आरंभ से पहले की स्थिति और उसके बाद के घटनाक्रम का बहुत ही सूक्ष्म, दार्शनिक और क्रमिक विवरण दिया गया है। मनुस्मृति के पहले अध्याय में कुल 119 श्लोक हैं, जिनमें से श्लोक संख्या 5 से लेकर 31 तक के 27 श्लोक मुख्य रूप से ब्रह्मांड के निर्माण, तत्वों के प्रकटीकरण और जीवों की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं।
सृष्टि के आरंभिक दौर का वर्णन करते हुए ग्रंथ में बताया गया है कि रचना से पूर्व यह संपूर्ण संसार पूरी तरह से अंधकार में लीन था। उस अवस्था में यह न तो जानने योग्य था और न ही इसमें किसी प्रकार के लक्षण या विशेषताएं मौजूद थीं। यह स्थिति किसी भी तर्क से परे थी और ऐसा प्रतीत होता था मानो सब कुछ गहरी नींद में सोया हुआ था। आधुनिक कॉस्मोलॉजी यानी ब्रह्मांड विज्ञान में भी यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि ब्रह्मांड के बनने से पहले एक डार्क एज का दौर था, जिसमें भौतिक रूप से कुछ भी अस्तित्व में नहीं था।
इस प्रारंभिक अवस्था के बाद की घटनाओं का उल्लेख करते हुए श्लोक संख्या 8 में कहा गया है कि उस परम शक्ति ने अंधकार को हटाकर सूक्ष्म तत्वों में प्रवेश किया और अनंत जीवों की रचना के लिए सबसे पहले जल का सृजन करके उसमें अपना बीज स्थापित कर दिया। इसके ठीक बाद श्लोक संख्या 9 में इस बात का विस्तार से वर्णन मिलता है कि वह बीज हजार सूर्यों के समान तेज वाला एक विशाल हिरण्यगर्भ यानी कॉस्मिक एग या सोने का अंडा बन गया। इसी महा-अंड के विस्तार और फैलाव से सबसे पहले समस्त लोकों के पितामह और सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी स्वयं उत्पन्न हुए।
ब्रह्मांड के विभाजन और विस्तार की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए श्लोक 12 और 13 में बताया गया है कि भगवान ब्रह्मा ने सबसे पहले उस विशाल अंडे के दो टुकड़े किए। जब हिरण्यगर्भ विभाजित हुआ, तो उसके ऊपरी हिस्से से द्युलोक यानी आकाश और स्वर्ग की रचना हुई, जबकि निचले हिस्से से भूलोक यानी पृथ्वी का निर्माण हुआ। इन दोनों प्रमुख टुकड़ों के बीच के स्थान में व्योम यानी अंतरिक्ष, आठों दिशाओं और जल के स्थायी स्रोतों की स्थापना हुई। इसके बाद उन्होंने मन, अहंकार, पंचमहाभूत जिनमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश शामिल हैं, तथा समस्त जीव-जंतुओं की रचना का कार्य पूरा किया।
मनुस्मृति में वर्णित हिरण्यगर्भ और कॉस्मिक एग की यह अवधारणा आधुनिक विज्ञान के कॉस्मिक एग सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉर्जेस लेमैत्रे ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति का अपना सिद्धांत देते समय इसे प्रीमर्डियल एटम या कॉस्मिक एग की संज्ञा दी थी। उनके अनुसार, ब्रह्मांड अपने निर्माण से पूर्व एक अनंत सघन बिंदु में सिमटा हुआ था। इसी अवधारणा को प्राचीन ग्रंथों में हिरण्यगर्भ कहा गया है, जो आधुनिक वैज्ञानिक सोच के साथ अद्भुत समानता प्रदर्शित करता है।
वैज्ञानिक जगत में ब्रह्मांड के निर्माण से जुड़ी बिग बैंग थ्योरी को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति आज से करीब 13.8 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यधिक शक्तिशाली और सघन बिंदु से हुई थी। उस महाविस्फोट से पहले अंतरिक्ष और समय का कोई अस्तित्व नहीं था। ब्रह्मांड एक अनंत रूप से छोटे बिंदु में समाहित था, जिसमें महाविस्फोट होने के बाद सृष्टि की वास्तविक रचना शुरू हुई। यह सघन बिंदु वास्तव में वही कॉस्मिक एग था, जिसके फटने से अंतरिक्ष और समय का निरंतर विस्तार आरंभ हो गया।
पार्टिकल फिजिक्स और कॉस्मोलॉजी के आधुनिक सिद्धांतों के अनुसार भी, जब महाविस्फोट हुआ तो उससे ऊर्जा के प्राथमिक कण यानी प्लाज्मा और विभिन्न गैसों का निर्माण हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान बल और पदार्थ एक-दूसरे से अलग हो गए। ठीक उसी तरह जैसे सिंगुलैरिटी यानी हिरण्यगर्भ के विभाजित होते ही स्पेस और मैटर का विस्तार शुरू हो गया था। इस ब्रह्मांडीय विस्फोट के बाद ही अंतरिक्ष और दिशाओं की उत्पत्ति संभव हुई, जिसके परिणामस्वरूप भौतिक नियमों का सुचारू संचालन शुरू हुआ।
विज्ञान के ये तमाम आधुनिक सिद्धांत मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में वर्णित क्रमिक विकास से गहराई से मेल खाते हैं। इस प्राचीन ग्रंथ में भी यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि ब्रह्मांड का निर्माण किसी अचानक हुई आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं था। इसमें सबसे पहले सिंगुलैरिटी यानी हिरण्यगर्भ का विभाजन हुआ, उसके बाद व्योम यानी स्पेस-टाइम और दिशाओं का निर्माण हुआ। इसके पश्चात ऊर्जा और सूक्ष्म तत्व सघन होकर स्थूल पदार्थों में परिवर्तित हो गए। यह पूरी विचार श्रृंखला आधुनिक बिग बैंग कॉस्मोलॉजी और क्वांटम फिजिक्स के विकास क्रम के साथ आश्चर्यजनक रूप से सामंजस्य रखती है।


















