भारतीय सिनेमा में कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर हर पीढ़ी के दिलों में गहरी जगह बना लेती हैं। वर्ष 1964 में आई रहस्यमयी थ्रिलर फिल्म वो कौन थी का कालजयी गीत लग जा गले कि फिर ये हसीन रात हो न हो इसी श्रेणी में शीर्ष पर खड़ा नजर आता है। इस रचना में जहां एक ओर प्रेम की अनूठी गर्माहट महसूस होती है, वहीं दूसरी तरफ बिछड़ने की एक अनकही कसक भी छुपी हुई है। छह दशकों का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी यह नगमा संगीत प्रेमियों के बीच उतना ही तरोताजा और असरदार बना हुआ है। लता मंगेशकर की सुरीली आवाज, मदन मोहन का कालजयी संगीत और राजा मेहंदी अली खान के मार्मिक शब्दों के संगम से बने इस गीत की उत्पत्ति की कहानी बेहद दिलचस्प है। शायद ही कोई सोच सकता है कि आज हिंदी सिनेमा का धरोहर माना जाने वाला यह गीत कभी कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया था।
शुरुआती दौर में जब निर्देशक ने धुन को मान लिया था रद्दी
वर्ष 1964 में जब फिल्म वो कौन थी के निर्माण का काम चल रहा था, तब इसके संगीत संयोजन की जिम्मेदारी जाने-माने संगीतकार मदन मोहन के कंधों पर थी। मदन मोहन ने इस खास गीत के लिए एक बहुत ही सुरीली और भावपूर्ण धुन तैयार की थी। जब वे उत्साह के साथ यह रचना लेकर फिल्म के निर्देशक राज खोसला के पास पहुंचे और उन्हें धुन सुनाई, तो परिणाम उनकी अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत निकला। राज खोसला को पहली बार में यह धुन बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। उन्होंने इस अद्भुत रचना को अनुपयोगी और रद्दी समझकर सिरे से खारिज कर दिया। किसी भी संगीतकार के लिए अपनी पसंदीदा धुन का इस तरह से नकार दिया जाना एक बड़ा झटका हो सकता था, लेकिन कहानी में असली मोड़ आना अभी बाकी था।
मदन मोहन का अडिग विश्वास और मनोज कुमार का बीच-बचाव
अपनी संगीतमय रचना की ताकत पर मदन मोहन को पूरा भरोसा था। वे इस असफलता से हताश होकर बैठने वालों में से नहीं थे। अपनी धुन को बचाने के लिए उन्होंने फिल्म के मुख्य अभिनेता मनोज कुमार का रुख किया। मदन मोहन ने मनोज कुमार के पास जाकर अपनी व्यथा साझा की और उनसे मदद मांगते हुए कहा, "मनोज... जरा राज को समझाओ. यह धुन बहुत खास है, इसे एक बार फिर ध्यान से सुनें." मनोज कुमार मदन मोहन की असाधारण प्रतिभा और संगीत की गहरी समझ से भली-भांति परिचित थे। उन्होंने संगीतकार के भरोसे पर मान रखते हुए निर्देशक राज खोसला से मुलाकात की और उनसे इस धुन को एक बार फिर एकाग्रता से सुनने का आग्रह किया।
राज खोसला का अहसास और गलती का स्वीकार
मनोज कुमार के विशेष अनुरोध को टालना निर्देशक के लिए संभव नहीं था। राज खोसला ने जब मदन मोहन की उस धुन को दूसरी बार ध्यान से सुना, तो वे दंग रह गए। धुन की गहराइयों को महसूस करते ही उन्हें तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ। वे आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि आखिर पहली बार में उनसे इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई थी और उन्होंने इतनी खूबसूरत रचना को रद्दी समझकर कैसे नकार दिया था। इस प्रकार मनोज कुमार की बुद्धिमत्ता और मदन मोहन के दृढ़ निश्चय के बल पर यह गीत फिल्म का हिस्सा बनने में सफल रहा।
राग पहाड़ी का प्रभाव और धुनों में छिपा दर्द
इस अमर गीत की महक सिर्फ इसके बोलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी वास्तविक आत्मा मदन मोहन द्वारा रची गई राग पहाड़ी आधारित धुन में बसती है। शास्त्रीय संगीत में राग पहाड़ी की विशेषता यह मानी जाती है कि यह प्राकृतिक परिवेश, दूरी, विरह और अपने प्रियजन को पुकारने के भाव को बहुत सहजता से व्यक्त कर देता है। इसे सरल शब्दों में समझा जाए तो यह एक ऐसा अनुभव है जैसे पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर एक तरफ खड़ा व्यक्ति दूसरी तरफ मौजूद अपने किसी आत्मीय को आवाज दे रहा हो। उस पुकार में भौगोलिक दूरी के साथ-साथ मिलने की एक तड़प और व्याकुलता भी सुनाई देती है। लग जा गले की धुन सुनते समय श्रोता के मन में जो आनंद के साथ-साथ हल्की उदासी घुल जाती है, उसके पीछे इसी राग की संगीतमय संरचना का योगदान है।
चार्टबस्टर नाकामी से ब्लॉकबस्टर तक का सफर
लता मंगेशकर की जादुई आवाज से सजा यह गीत जब 1964 में फिल्म वो कौन थी के साथ सिनेमाघरों में आया, तो इसे तुरंत वैसी सफलता नहीं मिली जैसी आज देखने को मिलती है। अपने शुरुआती दौर में यह गाना उस समय के प्रमुख संगीत चार्ट्स में कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सका था। हालांकि, कुछ कलाकृतियों का मूल्यांकन उनके निर्माण के समय से नहीं बल्कि आने वाले दौर से होता है। समय बीतने के साथ-साथ लोगों ने इस गीत को दोबारा सुना और इसके शब्दों में छिपे प्रेम और विरह की गहराई को महसूस किया। समय के साथ रेडियो प्रसारण, टेलीविजन कार्यक्रमों और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से यह रचना नई पीढ़ियों के दिलों तक पहुंचती चली गई। देखते ही देखते यह महज एक पुराना फिल्मी गाना न रहकर हिंदी सिनेमा का कालजयी ब्लॉकबस्टर बन गया।
'वो कौन थी' की सस्पेंस भरी दुनिया और अन्य यादगार गीत
1964 में प्रदर्शित हुई फिल्म वो कौन थी को हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन सस्पेंस और मिस्ट्री-थ्रिलर फिल्मों में गिना जाता है। निर्देशक राज खोसला के निर्देशन में बनी इस फिल्म में मनोज कुमार और साधना ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। साधना ने अपने रहस्यमयी और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इस फिल्म को 7.5 की आईएमडीबी रेटिंग प्राप्त है, जो इसकी गुणवत्ता को दर्शाती है। फिल्म की सफलता का एक बड़ा श्रेय इसके शानदार संगीत को जाता है। लग जा गले के अलावा इस फिल्म में 'नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' और 'जो हमने दास्तां अपनी सुनाई' जैसे कालजयी गीत भी शामिल थे, जिन्होंने भारतीय संगीत के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों दर्ज कराया।



















