भारतीय संगीत जगत में भजन सम्राट के नाम से मशहूर गायक अनूप जलोटा ने अपनी सुरीली आवाज और भक्ति गीतों के जरिए देश-दुनिया में एक खास मुकाम हासिल किया है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर गायकी के शिखर तक पहुंचने का उनका यह सफर अनुशासन और कड़े अभ्यास की एक अनूठी कहानी है। हाल ही में एक टॉक शो 'कहके रहेगा कहने वाला' में बातचीत करते हुए अनूप जलोटा ने वरिष्ठ पत्रकार किशोर अजवानी के साथ अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को साझा किया। उन्होंने न केवल नैनीताल से शुरू हुए अपने शुरुआती दिनों की यादें ताजा कीं, बल्कि यह भी उजागर किया कि किस तरह उनके पिता के कठोर अनुशासन ने उन्हें एक बेहतरीन फनकार बनाया।
25 साल पुराने खुद से मुलाकात और सफलता का अहसास
कार्यक्रम के दौरान जब शो के मेजबान किशोर अजवानी ने अनूप जलोटा से एक दिलचस्प सवाल पूछा कि अगर आज 25 साल की उम्र वाला अनूप जलोटा इस कमरे में आ जाए, तो वह वर्तमान अनूप जलोटा को देखकर क्या महसूस करेगा? इस सवाल पर मुस्कुराते हुए भजन सम्राट ने जवाब दिया कि उनका युवा रूप निश्चित रूप से उनकी उपलब्धियों पर गर्व महसूस करेगा और कहेगा, "वाह बेटा, बड़ा अच्छा काम किया।"
अनूप जलोटा ने पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया कि उन्होंने जीवन में जिस मुकाम को हासिल किया है, उसकी कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उन्हें इतना नाम और शोहरत मिलेगी कि वे बड़े मंचों पर आकर अपने जीवन का इंटरव्यू देंगे। अपने इस सफर को याद करते हुए वे अपनी सफलता का श्रेय दर्शकों और प्रचार माध्यमों को भी देते हैं।
मेहनत के साथ मीडिया और दर्शकों का योगदान
गायक ने अपनी कामयाबी के बारे में बात करते हुए कहा कि कलाकार अपनी तरफ से रियाज करता है, तैयारी करता है और अपना गीत गाता है। लेकिन उस मेहनत के बाद जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, उसमें जनता और मीडिया का बहुत बड़ा हाथ होता है। अपनी बात को और गहराई से समझाने के लिए उन्होंने एक खूबसूरत शेर भी सुनाया कि खुशबू को महकने का हक है लेकिन हवाओं से दोस्ती करनी होगी।
इस शेर के जरिए अनूप जलोटा ने समझाया कि एक गायक केवल गा सकता है, लेकिन उसके गानों को जन-जन तक पहुंचाने और उसे एक बड़ा हिट बनाने का असली काम मीडिया और सोशल मीडिया का ही होता है। वे इस सहयोग के लिए मीडिया और अपने प्रशंसकों के प्रति हमेशा आभारी रहते हैं।
कमरे में बंद रहकर तानपुरा पर घंटों रियाज की कहानी
अपने पारिवारिक जीवन और संगीत की शुरुआती शिक्षा पर चर्चा करते हुए अनूप जलोटा ने बताया कि वे अपनी मां के अधिक करीब थे क्योंकि उनका स्वभाव बहुत सहज था। इसके विपरीत उनके पिता संगीत को लेकर बेहद सख्त अनुशासन पसंद व्यक्ति थे। वे अनूप जलोटा को बैठकर संगीत की बारीकियां सिखाते थे और उनका रियाज कराने का तरीका बहुत कठोर होता था।
भजन सम्राट ने बताया कि उनके पिता उनके हाथ में तानपुरा थमा देते थे और उन्हें एक कमरे में बंद कर देते थे ताकि वे बिना किसी भटकाव के घंटों तक सिर्फ रियाज कर सकें। दो घंटे बीत जाने के बाद जब उनके पिता कमरे का दरवाजा खोलते, तो वे अनूप से सिर्फ एक सुर सुनाने को कहते थे। शर्त यह होती थी कि वह एक सुर पूरी तरह से परफेक्शन और शुद्धता के साथ गाया गया हो।
कठोर ट्रेनिंग का नतीजा: बिना हारमोनियम गाते हैं अनूप जलोटा
पिता की इस सख्त तालीम का सिलसिला यहीं नहीं रुकता था। अगले दिन उनके पिता इसी कठोरता के साथ उन्हें दूसरा सुर साधने के लिए कहते थे। एक-एक सुर को हफ्तों और महीनों तक साधने की इस अनूठी तकनीक ने अनूप जलोटा की गायकी की नींव को बेहद मजबूत बना दिया।
अनूप जलोटा बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें जिस तरह से ट्रेंड किया था, उसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि आज उन्हें गाते समय किसी हारमोनियम का सहारा नहीं लेना पड़ता। पिता के उस सख्त रियाज के कारण ही वे बिना किसी हारमोनियम के भी एकदम सटीक और सुरीला गा लेते हैं। नैनीताल के एक आम लड़के से भजन सम्राट बनने तक का यह सफर संगीत प्रेमियों के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है।



















