घुंघराले बाल, चंचल अदाएं और चेहरे पर खिली बड़ी सी मुस्कान वाले अंदाज से हिंदी सिनेमा में अपनी एक खास पहचान बनाने वाली माधुरी दीक्षित ने अपनी खूबसूरती और शानदार अदाकारी से दर्शकों का हमेशा दिल जीता है। वह पिछले कई दशकों से फिल्म इंडस्ट्री में लगातार काम कर रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं हिंदी सिनेमा की यह टैलेंटेड और मनमोहिनी अदाकारा असल में तुक्के से फिल्मों में आई थीं? खुद माधुरी दीक्षित ने एक बार अपने बॉलीवुड डेब्यू के बारे में दिलचस्प खुलासे किए थे। साल 1984 में 'अबोध' फिल्म के जरिए इस मशहूर अभिनेत्री ने बॉलीवुड की दुनिया में कदम रखा था। उन्होंने बताया था कि वह महज एक संयोग के तहत फिल्मों में आ गई थीं।
अनुपम खेर के शो में खोले थे करियर से जुड़े राज
प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर के लोकप्रिय टॉक शो 'द अनुपम खेर शो: कुछ भी हो सकता है' में बातचीत के दौरान माधुरी दीक्षित ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत से जुड़े कई अनसुने किस्से साझा किए थे। उन्होंने विस्तार से बताया था कि आखिर कैसे उनका आना फिल्मों में हुआ। बस वो एक ऐसा इत्तेफाक था जिसके बाद वह तब से लेकर आज तक लगातार फिल्मों में ही सक्रिय हैं। उनकी जिंदगी में आगे चलकर शादी भी हुई और उनके बच्चे भी हुए, लेकिन अभिनय का सिलसिला कभी नहीं थमा।
कैसे शुरू हुआ था माधुरी दीक्षित का फिल्मी सफर?
अपने बॉलीवुड डेब्यू के शुरुआती दिनों को याद करते हुए माधुरी दीक्षित ने एक बार बताया था कि गोविंद नाम के एक शख्स हुआ करते थे जो प्रसिद्ध राजश्री प्रोडक्शन के साथ काम किया करते थे। उनकी बेटी और माधुरी की बड़ी बहन एक ही स्कूल में साथ पढ़ा करती थीं। गोविंद जी यह अच्छी तरह जानते थे कि माधुरी पढ़ाई के साथ-साथ डांस में भी बहुत अच्छी हैं और स्कूल के नाटकों में बेहतरीन एक्टिंग करती हैं। कभी-कभी वह स्कूल के कार्यक्रमों में स्पीच भी दिया करती थीं। उस दौरान राजश्री प्रोडक्शन अपनी एक आने वाली फिल्म के लिए किसी ऐसे नए चेहरे की तलाश में था जो दिखने में काफी यंग और सादगी भरा हो। तभी अचानक गोविंद जी को माधुरी का ख्याल आया और उन्होंने इसके लिए उनके परिवार से संपर्क किया।
माता-पिता को मनाने के लिए हुई थी खास मुलाकात
माधुरी दीक्षित ने यह भी बताया था कि उनके माता-पिता हमेशा से यही चाहते थे कि वह पूरी तरह से अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ही ध्यान केंद्रित करें। इस बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा था कि शुरुआत में उनके माता-पिता फिल्मों में काम करने के लिए बिल्कुल भी राजी नहीं हुए थे। इसके बाद गोविंद जी ने उनके परिवार को समझाया और कहा कि आप लोग एक बार राजश्री प्रोडक्शन के हेड से जाकर जरूर मिलिए। उन्होंने विश्वास दिलाया कि मिलने के बाद आप लोग पक्का मान जाएंगे। बस फिर क्या था, अगले ही दिन माधुरी और उनके परिजन राजश्री के ऑफिस जा पहुंचे। माधुरी को आज भी अच्छे से याद है कि उस दिन ऑफिस में उन से एक किताब की हिंदी की कुछ लाइनें भी पढ़वाई गई थीं। दरअसल, वे यह चेक करना चाहते थे कि बोलते वक्त माधुरी की जुबान पर कहीं कोई महाराष्ट्रन लहजा या टच तो नहीं आ रहा है।
अबोध फिल्म से हुई थी धमाकेदार शुरुआत
इस तरह माधुरी दीक्षित का अभिनय सफर फिल्म 'अबोध' से शुरू हुआ और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। आगे चलकर उन्हें लगातार फिल्मों के ऑफर मिलते रहे और उन्होंने खूब काम किया। 'अबोध' फिल्म में उनके साथ मुख्य भूमिका में बंगाली अभिनेता तपस पॉल नजर आए थे। जाने-माने निर्देशक हिरेन नाग ने इस फिल्म का निर्देशन किया था। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बहुत बड़ी हिट साबित नहीं हुई थी, लेकिन इसके बावजूद माधुरी के अभिनय की जमकर तारीफ हुई थी। उनकी सादगी से भरपूर एक्टिंग को दर्शकों ने खूब पसंद किया और फिल्म समीक्षकों ने भी माधुरी दीक्षित के काम को हरी झंडी दे दी थी। जिस वक्त उन्होंने अपना यह फिल्मी डेब्यू किया था, उस समय इस धक-धक गर्ल की उम्र महज 17 साल थी।
शुरुआती असफलताओं के बाद मिली ऐतिहासिक सफलता
आपको शायद इस बात पर यकीन न हो, लेकिन यह सच है कि माधुरी दीक्षित की शुरुआती फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लगातार फ्लॉप साबित हो रही थीं। 'अबोध' के बाद 'आवारा बाप', 'स्वाति', 'मानव हत्या', 'हिफाजत' से लेकर 'उत्तर दक्षिण' तक कई ऐसी फिल्में आईं जो बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। हालांकि इन सबके बीच भी माधुरी के काम की सराहना हर तरफ हो रही थी। लेकिन फिर साल 1988 आया जिसने उनके करियर की तस्वीर पूरी तरह से बदलकर रख दी। इसी साल अभिनेता विनोद खन्ना के साथ उनकी फिल्म 'दयावान' रिलीज हुई और अनिल कपूर के साथ उनकी सुपरहिट फिल्म 'तेजाब' पर्दे पर आई। ये दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुईं। इनमें से भी अनिल कपूर के साथ आई 'तेजाब' तो एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई, जिसके गाने से लेकर फिल्म का एक-एक सीन लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।



















