भारतीय सिनेमा के परिदृश्य में इन दिनों जड़ों, पारंपरिक संस्कृति और लोक-आस्था से जुड़ी विषयवस्तु को दर्शकों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। संत नीम करोली बाबा के जीवन प्रसंगों पर केंद्रित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने सिनेमाघरों में अपनी मजबूत पकड़ बनाते हुए इस बात को सिद्ध किया है। मात्र 2 करोड़ रुपये के सीमित बजट और बेहद सामान्य संसाधनों के सहारे तैयार हुई यह फिल्म 40 दिनों से अधिक समय से सिनेमाघरों में टिकी हुई है और 300 करोड़ क्लब की दहलीज पर पहुँच चुकी है। इस अभूतपूर्व दर्शक प्रतिक्रिया के पश्चात अब उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की एक और ऐतिहासिक लोक-कथा बड़े पर्दे पर रूपायित होने जा रही है। कुमाऊं क्षेत्र में न्याय के सर्वोच्च प्रतीक माने जाने वाले गोलू देवता के जीवन, संघर्ष और देवत्व की गाथा फिल्म ‘बाला गोरिया’ के माध्यम से दर्शकों के सामने आएगी।
चंपावत की पहाड़ियों से उपजी लोकगाथा और फिल्म का स्वरूप
देवभूमि के जनमानस में रचे-बसे लोकदेवता पर केंद्रित यह फिल्म 16 अक्टूबर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने के लिए निर्धारित की गई है। फिल्म का ताना-बाना फंतासी और ऐतिहासिक विधा के संगम पर बुना गया है, जिसमें चंपावत के राजकुमार बाला के बलिदान और उस अटूट जन-विश्वास की पड़ताल की गई है जिसके तहत सदियों से लोग न्याय की गुहार लगाने उनके दरबार पहुँचते हैं। कहानी की पृष्ठभूमि चंपावत की पर्वत शृंखलाओं के मध्य घटित होती है, जहाँ बाला गोला को राजा झाल राय तथा रानी कालिंका के पराक्रमी और करुणामयी पुत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बचपन के दिनों से ही बाला में अदम्य वीरता, सत्य के प्रति निष्ठा और न्यायप्रियता के लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।
राजदरबार के षड्यंत्र और राजकुमार का सर्वोच्च त्याग
राजकुमार बाला समाज के उपेक्षित और कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर तत्पर रहते हैं और सामाजिक कुरीतियों व अन्याय के विरुद्ध बेबाकी से आवाज उठाते हैं। आमजन के बीच उनकी इस बढ़ती साख और लोकप्रियता ने राजमहल के भीतर बैठे दरबारी सामंतों और उनके सौतेले भाइयों के मन में ईर्ष्या के बीज बो दिए। सत्ता और प्रभाव के संघर्ष से उपजी यह रंजिश धीरे-धीरे एक गंभीर राजनीतिक साजिश का रूप ले लेती है। आईएमबीडी पर उपलब्ध विवरण के अनुसार, अपने ही सगे-संबंधियों और निकटवर्ती लोगों द्वारा रचे गए कुचक्र के चलते बाला पर झूठे और मनगढ़ंत दोष मढ़ दिए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें मृत्युदंड का आदेश सुना दिया जाता है।
इस कथा का सबसे भावुक और प्रेरणादायी पहलू यह है कि बाला ने अपने विरोधियों से प्रतिशोध लेने अथवा व्यवस्था से विद्रोह करने का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से ऊपर उठकर जनहित और मर्यादा की खातिर अपने भाग्य और इस विषम दंड को स्वीकार किया। अन्यायपूर्ण फैसले के समक्ष टूटने के बजाय उन्होंने अपने आत्म-बलिदान को अंगीकार कर न्याय के प्रति अपनी निष्ठा का उच्चतम उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके इस महाप्रयाण के पश्चात क्षेत्र भर में कई ऐसे विस्मयकारी और अलौकिक घटनाक्रम सामने आने लगे, जिन्हें स्थानीय निवासियों ने बाला की दिव्य उपस्थिति और आत्मिक न्याय से जोड़कर देखा। इसी बिंदु से एक नश्वर राजकुमार की जीवन-यात्रा धीरे-धीरे जन-आस्था के केंद्र गोलू देवता के रूप में परिवर्तित होने लगी।
सत्य, न्याय और आस्था का दार्शनिक संगम
‘बाला गोरिया’ मात्र किसी देव-चरित्र का महिमामंडन करने तक सीमित नहीं है, अपितु इसकी अंतर्धारा सत्य, जनसेवा, त्याग और अडिग विश्वास के नैतिक स्तंभों पर टिकी है। यह कथा इस ऐतिहासिक सत्य को रेखांकित करती है कि कैसे एक युवा शासक ने व्यक्तिगत सुख और सत्ता के ऊपर न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, और किस प्रकार उनका यह पवित्र संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रद्धा का शाश्वत माध्यम बन गया। ‘हनुमान अंश’ जहाँ नीम करोली बाबा के आध्यात्मिक मार्गदर्शन और आंतरिक रूपांतरण की यात्रा को उजागर करती है, वहीं ‘बाला गोरिया’ कुमाऊं की लोक-परंपरा, जन-अदालत और न्याय की देव-संस्कृति को सजीव करती है। दोनों ही रचनाएं अपनी मूल प्रकृति में भिन्न होते हुए भी भारतीय जनमानस के उस गहरे विश्वास को छूती हैं जो सत्य और ईश्वरीय न्याय से जुड़ा हुआ है।
लिखित अर्जी और घंटियों की अनूठी परंपरा
उत्तराखंड की पावन भूमि पर गोलू देवता की पूजा-अर्चना किसी एक संकीर्ण भौगोलिक दायरे तक सीमित नहीं है। चंपावत स्थित मूल गोलू देवता मंदिर के अतिरिक्त घोड़ाखाल और चितई के धाम इस अगाध लोक-विश्वास के प्रमुख केंद्र हैं। इन पवित्र परिसरों में न्याय के आकांक्षी श्रद्धालु अपनी पीड़ा, विवाद अथवा फरियाद को सादे कागज पर लिखकर मंदिर में अर्पित करते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर घंटियां बांधते हैं। फिल्म का कथानक वर्तमान युग में प्रचलित इसी विशिष्ट परंपरा को अतीत के ऐतिहासिक प्रसंगों से जोड़ता हुआ आगे बढ़ता है। यह दर्शाया गया है कि किस तरह राजकुमार बाला द्वारा दिया गया सर्वोच्च बलिदान कालांतर में जनसाधारण के लिए अंतिम न्यायपीठ का स्वरूप ले बैठा, जहाँ आज भी पीड़ित जन अपनी अर्जी कागजों में दर्ज कर न्याय की पूर्ण प्रत्याशा रखते हैं।

















