भारतीय सिनेमा के इतिहास में सत्तर और अस्सी का दशक सत्ता परिवर्तन और नए समीकरणों के निर्माण का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है। साठ के दशक के अंतिम वर्षों से लेकर सत्तर के दशक के शुरुआती दौर तक पूरे देश में राजेश खन्ना का जबरदस्त जलवा था। लगातार 15 सोलो सुपरहिट फिल्में देकर उन्होंने हिंदी फिल्म जगत के पहले आधिकारिक सुपरस्टार का तमगा हासिल किया था। उस दौर में प्रशंसकों का आलम यह था कि उनकी एक झलक देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी और उनका खास रोमांटिक अंदाज हर सिनेमा प्रेमी के दिल पर राज करता था।
जंजीर और एंग्री यंग मैन के उभार से हिला पुराना सिंहासन
साल 1973 में रिलीज हुई फिल्म जंजीर ने हिंदी सिनेमा की पूरी धारा ही बदलकर रख दी। इस फिल्म के जरिए दर्शकों के सामने अमिताभ बच्चन का एक ऐसा रूप आया जो व्यवस्था की खामियों और अन्याय के खिलाफ खुलकर आवाज उठाता था। देश की युवा पीढ़ी को पर्दे पर कोमल रूमानी नायक के बजाय एक विद्रोही और आक्रामक तेवर वाला नायक ज्यादा पसंद आने लगा। इस नए रुझान ने सीधे तौर पर राजेश खन्ना के स्थापित रुतबे को हिलाना शुरू कर दिया।
आनंद और नमक हराम से हुआ सत्ता का हस्तांतरण
अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना जब साल 1971 में फिल्म आनंद और फिर 1973 में नमक हराम में एक साथ बड़े पर्दे पर नजर आए, तो दर्शकों ने सिनेमाई स्टारडम का एक ऐतिहासिक बदलाव देखा। खासकर नमक हराम के प्रदर्शन के बाद समीक्षकों और आम दर्शकों दोनों ने अमिताभ के अभिनय की भूरी-भूरी प्रशंसा की। इस टकराव ने साफ संदेश दे दिया था कि बॉलीवुड के शीर्ष सिंहासन का अगला दावेदार कौन बनने जा रहा है।
विनोद खन्ना की दमदार दस्तक और कांटे की टक्कर
सत्तर के दशक के ढलते दौर में जब राजेश खन्ना का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा था, तब विनोद खन्ना एक बेहद मजबूत और आकर्षक एक्शन हीरो के रूप में उभरे। दोनों सितारों ने मुकद्दर का सिकंदर, परवरिश, अमर अकबर एंथनी और हेरा फेरी जैसी कई यादगार मल्टी-स्टारर फिल्मों में साथ काम किया। इन फिल्मों में विनोद खन्ना ने अपनी शानदार कद-काठी और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के बल पर अमिताभ बच्चन को बॉक्स ऑफिस पर बराबर की टक्कर दी। सत्तर के दशक के अंत और अस्सी के दशक की शुरुआत में विनोद खन्ना ही ऐसे इकलौते अभिनेता थे, जो लोकप्रियता और फीस के मामले में अमिताभ बच्चन के समानांतर खड़े थे। फिल्म उद्योग के जानकारों का भी यही आकलन था कि विनोद खन्ना के पास अमिताभ को पीछे छोड़कर नंबर एक का ताज हासिल करने की पूरी क्षमता मौजूद थी।
ओरेगन आश्रम का रुख और बिग बी का एकतरफा राज
साल 1982 में जब विनोद खन्ना अपने करियर के सबसे सुनहरे मुकाम पर थे, तब उन्होंने एक बेहद अप्रत्याशित कदम उठाया। चकाचौंध से भरी फिल्म इंडस्ट्री को अचानक अलविदा कहकर वह आत्मिक और रूहानी शांति की तलाश में संयुक्त राज्य अमेरिका के ओरेगन में आचार्य रजनीश (ओशो) के आश्रम चले गए। इस फैसले ने पूरी फिल्म बिरादरी को स्तब्ध कर दिया। उनके इस अचानक संन्यास ने अमिताभ बच्चन के सामने से सबसे मजबूत और गंभीर चुनौती को हमेशा के लिए हटा दिया। इसके बाद अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन ने बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह से एकतरफा राज किया, जहां किसी अन्य अभिनेता की कोई चुनौती नहीं बची और लगातार ब्लॉकबस्टर फिल्मों के दम पर वह सदी के महानायक के मुकाम तक पहुंचे।
















