भारतीय सिनेमा के मंझे हुए कलाकार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपने करियर के उस निर्णायक मोड़ का ब्योरा साझा किया है, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी थी। पारंपरिक फिल्मी हीरो की तयशुदा छवि में फिट न बैठने के बावजूद नवाजुद्दीन ने केवल अपनी अदाकारी के दम पर दर्शकों और आलोचकों का दिल जीता। एक हालिया साक्षात्कार में जब उनसे सवाल किया गया कि उन्हें पहली बार एक सच्चे स्टार होने का एहसास कब हुआ, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के साल 2012 में आई फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर 2' का नाम लिया।
फैज़ल खान के किरदार से रातों-रात बदली तकदीर
साल 2012 में अनुराग कश्यप के निर्देशन में 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के दोनों भाग सिनेमाघरों में रिलीज हुए थे। इस कल्ट फिल्म ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ-साथ मनोज बाजपेयी और हुमा कुरैशी को भी हिंदी सिनेमा में एक मजबूत पहचान दिलाई। फिल्म में 'फैज़ल खान' के रूप में नवाजुद्दीन के अभिनय ने दर्शकों पर ऐसा जादू चलाया कि उनके लिए बॉलीवुड के तमाम दरवाजे अचानक खुल गए। नवाजुद्दीन के अनुसार, इस एक किरदार की अपार लोकप्रियता ने उनके संघर्ष के दिनों को एक झटके में सुनहरे दौर में बदल दिया।
निर्माताओं ने थमा दिए थे ब्लैंक चेक
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की ऐतिहासिक सफलता के तुरंत बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी के पास नई फिल्मों के प्रस्तावों का तांता लग गया। अभिनेता ने बताया कि फिल्म आने के बाद उन्हें लगभग 200 फिल्मों की स्क्रिप्ट्स की पेशकश की गई थी। उस दौरान फिल्म निर्माताओं के बीच उन्हें साइन करने की होड़ मची हुई थी। मेकर्स उन्हें मुंहमांगी फीस देने को तैयार थे और यहां तक कि कई निर्माताओं ने तो उन्हें खाली चेक तक थमा दिए थे ताकि वह अपनी मनपसंद रकम उसमें खुद भर सकें। निर्माता अभिनेता की खाली तारीखों के हिसाब से अपनी शूटिंग का शेड्यूल तय करने के लिए भी राजी थे।
200 पटकथाओं में से एक भी नहीं की साइन
अक्सर देखा जाता है कि बड़ी कामयाबी मिलते ही कलाकार बिना सोचे-समझे हर प्रोजेक्ट स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन नवाजुद्दीन ने असाधारण संयम का परिचय दिया। उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं और कला से कोई समझौता नहीं किया। नवाजुद्दीन ने उन 200 स्क्रिप्ट्स में से एक भी फिल्म साइन नहीं की, क्योंकि उन्हें किसी भी कहानी में वह दम और गहराई नजर नहीं आई जो वह तलाश रहे थे। उन्होंने जल्दबाजी में काम करने के बजाय एक असरदार और मजबूत किरदार के लिए इंतजार करना ही उचित समझा।
लंबे संघर्ष ने सिखाया था इंतजार का हुनर
अपनी इस रणनीति पर बात करते हुए नवाजुद्दीन ने कहा,
"मुझे इंतजार करने की आदत थी।"उन्होंने स्पष्ट किया कि वह कई वर्षों से अच्छे काम की तलाश में धैर्य रखे हुए थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि खराब प्रोजेक्ट्स चुनने से कहीं बेहतर होगा कि वह दो-तीन साल और अच्छी पटकथा की प्रतीक्षा कर लें। अभिनेता ने आगे कहा कि ईश्वर की ऐसी कृपा रही कि उन्हें बहुत लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा और जल्द ही बेहतरीन काम मिलने लगा। पिछले 14 वर्षों में उन्होंने विविध और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाकर सिनेमा जगत में अपना एक विशिष्ट मुकाम बना लिया है।
















