रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को चार साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन अब तक इसका कोई ठोस हल नहीं निकल पाया है। दोनों तरफ से सैनिकों और आम नागरिकों की जान जाने और तबाही की खबरें लगातार आती रहती हैं। इसी जंग के बीच यूक्रेन ने अपने प्रधानमंत्री को बदलने का बड़ा फैसला लिया है। गुरुवार को सेरही कोरेत्स्की को देश का नया प्रधानमंत्री बनाया गया।
कौन हैं नए पीएम सेरही कोरेत्स्की?
सेरही कोरेत्स्की अब तक यूक्रेन की सरकारी ऊर्जा कंपनी नेफ्तोगाज के प्रमुख रहे हैं। उनका पीएम पद तक पहुंचना खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि वह किसी राजनीतिक पार्टी, संसद या प्रशासनिक सेवा के रास्ते से यहां नहीं पहुंचे। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर बिजनेस की दुनिया में अपना करियर बनाया। संकट के समय एक असरदार मैनेजर के तौर पर उनकी पहचान रही है, क्योंकि उन्होंने घाटे में डूबे यूक्रेन के कई सरकारी उपक्रमों को दोबारा खड़ा कर मुनाफे में पहुंचाया। इससे पहले वह ईंधन और खाद्य उद्योगों के प्रबंधन में भी काम कर चुके हैं।
यूलिया स्विरीडेंको की जगह लेंगे कोरेत्स्की
सेरही कोरेत्स्की, यूलिया स्विरीडेंको की जगह लेने वाले हैं, जिन्होंने 2025 से जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री पद पर काम किया। संसद में हुए मतदान में कोरेत्स्की के पक्ष में 289 वोट डाले गए। रूस के साथ जारी जंग के दौरान सेरही कोरेत्स्की यूक्रेन के तीसरे प्रधानमंत्री हैं।
जेलेंस्की ने क्यों सौंपी यह जिम्मेदारी?
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने सेरही कोरेत्स्की को देश को आने वाली सर्दी की मुश्किल परिस्थितियों से निकालने की जिम्मेदारी दी है। जेलेंस्की का कहना है कि आने वाली सर्दी के दौरान जंग में यूक्रेन की मदद करने के लिए कोरेत्स्की सबसे उपयुक्त शख्स हैं। हालांकि नए पीएम के सामने उनके करियर की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। इसके लिए सिर्फ कारोबारी समझ काफी नहीं होगी, उन्हें राजनीतिक कौशल, कूटनीति और सत्ता से जुड़े दांव-पेच में भी महारत दिखानी होगी। यूक्रेन लगातार पैसों की कमी और रूस के साथ जंग, दोनों मोर्चों पर जूझ रहा है।
मंत्री की बर्खास्तगी के बाद हुए थे प्रदर्शन
इससे पहले जेलेंस्की ने यूक्रेन के रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव को बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद देश की संसद के बाहर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। इसी माहौल के बीच अब सेरही कोरेत्स्की को प्रधानमंत्री पद की कमान सौंपी गई है।
सेरही कोरेत्स्की के सामने अब यह चुनौती होगी कि वह अपने प्रबंधकीय अनुभव को राजनीतिक मैदान में भी साबित करें। संकट के दौर में सरकारी उपक्रमों को घाटे से मुनाफे में लाने का उनका ट्रैक रिकॉर्ड जरूर उम्मीद जगाता है, लेकिन युद्धकाल में देश चलाना कारोबार चलाने से कहीं ज्यादा जटिल काम है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि सेरही कोरेत्स्की जेलेंस्की के भरोसे पर कितना खरा उतरते हैं।




















