भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज का पावन व्रत महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सावन महीने की हरियाली तीज और कजरी तीज के समापन के बाद यह महान पर्व आता है, जिसका सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ अविवाहित कन्याओं को भी पूरे वर्ष इंतजार रहता है। इस वर्ष हरतालिका तीज 14 सितंबर 2026, सोमवार को पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखद दांपत्य जीवन के लिए निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव तथा माता पार्वती का पूजन करती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं योग्य एवं मनभावन जीवनसाथी पाने की कामना से यह कठिन व्रत और पूजन संपन्न करती हैं।
भगवान शिव और माता पार्वती की कथा एवं धार्मिक महत्व
हरतालिका तीज के व्रत का संबंध पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती और देवों के देव महादेव भगवान शिव के विवाह से गहराई से जुड़ा हुआ है। धार्मिक ग्रंथों एवं कथाओं के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इस पावन मनोकामना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने अन्न और जल का त्याग करके घोर तपस्या की तथा अत्यंत कठिन व्रत रखा था। माता पार्वती की वर्षों की निष्ठा, अटूट भक्ति और कठोर तप से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। इसी पावन पौराणिक घटना की स्मृति में हरतालिका तीज पर शिव-पार्वती पूजन की परंपरा चली आ रही है। महिलाओं का विश्वास है कि इस दिन पूरे नियम और सच्ची श्रद्धा के साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, शांति और अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।
हरतालिका तीज की पूजन विधि और परंपराएं
इस पवित्र दिन पर व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद पूजा की तैयारियां शुरू की जाती हैं। हरतालिका तीज के अवसर पर महिलाओं में पारंपरिक श्रृंगार करने और हाथों में सुंदर मेहंदी लगाने का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। पूजा के लिए कई स्थानों पर नदी की पवित्र मिट्टी या बालू से भगवान शिव और माता पार्वती की सुंदर प्रतिमाएं हाथों से बनाकर उन्हें पूजा स्थल पर स्थापित करने की पुरानी परंपरा है।
पूजन के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती को ताजे फल, सुगंधित फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही सुहागिन महिलाएं माता पार्वती को लाल चुनरी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर सहित संपूर्ण सुहाग सामग्री अर्पित करती हैं और अपने वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं। पूजन के मुख्य भाग के रूप में हरतालिका तीज की कथा पढ़ी अथवा सुनी जाती है। कथा पूर्ण होने के पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती की आरती की जाती है तथा परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।
निर्जला व्रत के नियम और पंचांग अनुसार शुभ समय
हरतालिका तीज के दिन कई सुहागिन महिलाएं पूरे दिन बिना जल ग्रहण किए निर्जला व्रत का पालन करती हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों, समाजों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियमों और पूजन विधि में कुछ स्थानीय विविधताएं भी पाई जाती हैं। अविवाहित कन्याएं भी माता पार्वती के आदर्शों का अनुसरण करते हुए पूरे भक्ति भाव से इस व्रत का पालन करती हैं ताकि उन्हें सुयोग्य जीवनसाथी का आशीर्वाद मिल सके।
हिन्दू पंचांग की गणना के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभ 13 सितंबर की सुबह से हो रहा है, जो 14 सितंबर की सुबह तक बनी रहेगी। उदयातिथि के नियम का पालन करते हुए हरतालिका तीज का मुख्य पर्व और व्रत 14 सितंबर 2026, सोमवार को ही विधि-विधान से मनाया जाएगा।



















