पोर्टेबल गेमिंग की दुनिया में एक ऐसा गैजेट जो जेब में समा जाए और क्लासिक वीडियो गेम्स चलाने की क्षमता रखे, पहली नजर में किसी भी तकनीकी शौकीन का ध्यान खींच लेता है। गेमरकार्ड इसी महत्वाकांक्षी वादे के साथ सामने आता है, जहां एक बेहद पतले कार्ड के आकार में रेट्रो कंसोल का पूरा ढांचा समेटने की कोशिश की गई है। कॉन्सेप्ट के स्तर पर यह विचार जितना लुभावना लगता है, असलियत में इसे हाथ में लेकर खेलते समय अनुभव उतना ही पेचीदा और उतार-चढ़ाव भरा साबित होता है। सादगी और तुरंत खेलने की उम्मीदें डिवाइस की आंतरिक कमियों से लगातार टकराती रहती हैं।
पतला चेसिस, अनोखा अहसास और सीमित थर्मल समाधान
गेमरकार्ड की सबसे बड़ी खासियत इसका अविश्वसनीय रूप से स्लिम प्रोफाइल है। यह डिवाइस पकड़ने में आरामदायक महसूस होता है, लेकिन इसकी अत्यधिक पतली बनावट एक सीधी तकनीकी चुनौती भी खड़ी करती है। इसका बाहरी खोल इतना महीन है कि उंगलियों से अंदर के सर्किट और मदरबोर्ड की रूपरेखा तक महसूस की जा सकती है। जब डिवाइस चालू होता है और प्रोसेसर काम करना शुरू करता है, तो कुछ ही पलों में आंतरिक गर्मी सीधे हाथों तक पहुंचने लगती है। यह तापमान किसी खतरे के स्तर तक तो नहीं पहुंचता, लेकिन गेम खेलते समय लगातार हल्की गर्माहट महसूस होना एक असामान्य अनुभव जरूर पैदा करता है। इस तरह के कंपैक्ट फॉर्म फैक्टर में थर्मल मैनेजमेंट हमेशा पेचीदा होता है, और यह गैजेट उस सीमा को साफ तौर पर उजागर करता है।
कंट्रोल्स की खींचतान और इनपुट में देरी
गेमिंग के मैदान में सबसे अहम कड़ी यूजर के हाथ और ऑन-स्क्रीन एक्शन के बीच का तालमेल होता है, लेकिन गेमरकार्ड पर कोई भी गेम शुरू करना हार्डवेयर से जूझने जैसा अहसास कराता है। इसके कंट्रोल्स काफी सख्त हैं और इनपुट के प्रति सुस्ती दिखाते हैं। आगे के हिस्से पर जो हिस्से पहली नजर में ट्रैकपैड जैसे दिखते हैं, वे असल में सिलिकॉन पैड हैं जिनके नीचे दोनों तरफ चार-चार अलग इनपुट बटन छिपे हुए हैं। दाईं ओर यह लेआउट एक्सबॉक्स कंट्रोलर के एबीएक्सवाई बटनों से मेल खाता है, इसलिए वहां काम चल जाता है। असली परेशानी बाईं तरफ पेश आती है, जहां एक जुड़े हुए डी-पैड का न होना किसी भी वर्चुअल दुनिया में घूमने को बेहद थकाऊ बना देता है।
हर दिशा के लिए अलग बटन दबाना पड़ता है, जिससे दिशा बदलने में कोई सहज प्रवाह नहीं बन पाता। इसके अलावा बटन दबाने और स्क्रीन पर होने वाले मूवमेंट के बीच एक स्पष्ट अंतराल महसूस होता है। 2डी गेम्स में भी यह सुस्त प्रक्रिया झुंझलाहट पैदा करती है। वहीं जब बात 3डी गेम्स की आती है, जैसे कि स्टोर पर उपलब्ध क्लासिक क्वेक का शेयरवेयर संस्करण, तो किरदार को हिलाना और सटीक निशाना साधना लगभग असंभव हो जाता है। कंसोल के निचले हिस्से में शोल्डर बटनों की तरह अतिरिक्त बटन दिए गए हैं, लेकिन हर गेम उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाता। इसके अलावा ऑन-स्क्रीन कीबोर्ड से वाई-फाई पासवर्ड दर्ज करने जैसे बुनियादी काम भी इस लेआउट में भारी मशक्कत मांगते हैं, जबकि सिलिकॉन सतह बहुत जल्दी उंगलियों के निशान पकड़ने लगती है और नीचे के बटनों के उभार स्थायी रूप से दिखने लगते हैं।
लेबल-रहित बटनों का भ्रम और 35 सेकंड का रीबूट चक्र
उत्पाद को साफ-सुथरा और आकर्षक दिखाने के चक्कर में बटनों पर किसी भी तरह का लेबल नहीं दिया गया है। यह मिनिमलिस्टिक रूप देखने में भले ही सुंदर लगे, लेकिन खेलते वक्त भारी भ्रम पैदा करता है। किसी मेन्यू में चयन की पुष्टि करने के लिए दाईं तरफ का निचला बटन काम करेगा या दायां बटन, यह हर गेम के साथ बदल जाता है। नतीजा यह होता है कि खिलाड़ी अनजाने में गलत विकल्प चुन बैठते हैं।
इससे भी बड़ी कमी एक समर्पित होम बटन की गैरमौजूदगी है। यदि कोई गेम खेलते समय सिस्टम मेन्यू में लौटना चाहे, तो उसके लिए कोई सीधा रास्ता नहीं है। स्टार्ट और सेलेक्ट को एक साथ दबाकर गेम बंद करने का संयोजन रखा गया है, लेकिन यह हर गेम में काम नहीं करता या कभी-कभी सिस्टम इसे पहचानता ही नहीं। ऐसी स्थिति में डिवाइस को पूरी तरह बंद करके दोबारा चालू करना ही एकमात्र उपाय बचता है। इसका बूट चक्र लगभग 35 सेकंड का समय लेता है। एक पोर्टेबल गैजेट के लिए बार-बार 35 सेकंड तक स्क्रीन चालू होने का इंतजार करना धैर्य की कड़ी परीक्षा लेता है।
रॉम लोडिंग की तकनीकी भूलभुलैया और फाइल ट्रांसफर
यदि कोई अपनी पसंदीदा रेट्रो फाइल्स इस मशीन में डालना चाहे, तो यह प्रक्रिया भी आसान नहीं है। इसमें माइक्रोएसडी कार्ड स्लॉट में कोई पुश-टू-इजेक्ट स्प्रिंग मैकेनिज्म नहीं है। स्लॉट इतना तंग है कि अंदर लगे कार्ड को बाहर निकालने के लिए स्टील की चिमटी का सहारा लेना पड़ता है। निर्माता का कहना है कि भविष्य के उत्पादन बैचों में इस गैप को ठीक किया जाएगा ताकि कार्ड निकालने में दिक्कत न हो।
कार्ड बाहर निकालने के बाद भी सीधे ड्रैग-एंड-ड्रॉप से बात नहीं बनती। जब इस कार्ड को विंडोज पीसी में लगाया जाता है, तो ऑपरेटिंग सिस्टम इसकी अपरिचित फाइल प्रणाली को देखते ही फॉर्मेट करने की मांग करने लगता है। नतीजतन, रॉम फाइल्स ट्रांसफर करने के लिए यूजर को अपने घरेलू नेटवर्क पर फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल यानी एफटीपी क्लाइंट जैसे फाइलजिला का सहारा लेकर फाइलें भेजनी पड़ती हैं। यह तरीका किसी सामान्य उपभोक्ता के लिए काफी तकनीकी और जटिल साबित होता है।
शानदार विजुअल्स और इम्यूलेशन की जटिलताएं
इन तमाम तकनीकी बाधाओं को पार करके जब गेम्स लोड हो जाते हैं, तो डिवाइस का डिस्प्ले अपनी पूरी चमक दिखाता है। पिक्सल आर्ट आधारित गेम्स इसके 60 फ्रेम प्रति सेकंड वाले ब्राइट और कलरफुल डिस्प्ले पर बेहद खूबसूरत नजर आते हैं। सुपर निन्टेंडो के क्लासिक रोल-प्लेइंग गेम सीक्रेट ऑफ माना और प्लेटफॉर्मर सुपर एडवेंचर आइलैंड के विजुअल्स स्क्रीन पर काफी जीवंत लगते हैं। हालांकि यहां भी एक तकनीकी पेंच है। रेट्रोपाई की डिस्प्ले सेटिंग्स में आस्पेक्ट रेशियो जो भी चुना गया हो, गेमरकार्ड हर गेम को अपनी चौकोर स्क्रीन पर फैलाकर दिखाता है। इम्यूलेशन मेन्यू तक पहुंचने के लिए सेलेक्ट और उत्तरी फेस बटन को एक साथ दबाना पड़ता है, जिसका उल्लेख कहीं आधिकारिक तौर पर नहीं मिलता।
सॉफ्टवेयर के स्तर पर भी इम्यूलेशन की दुनिया अप्रत्याशित होती है। रेट्रोपाई कई गेम बॉय रॉम्स को लोड करने में विफल रहा। सुपर निन्टेंडो टाइटल्स लोड तो हुए, लेकिन उनमें गेम प्रोग्रेस सेव करने की प्रक्रिया भरोसेमंद नहीं रही। कुल मिलाकर गेमरकार्ड एक पहचान के संकट से जूझता नजर आता है। रास्पबेरी पाई के साथ नए प्रयोग करने और प्रोग्रामिंग में रुचि रखने वालों के लिए यह एक दिलचस्प प्रोजेक्ट हो सकता है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए यह अभी पूरी तरह तैयार उत्पाद के बजाय एक प्रोटोटाइप ज्यादा लगता है।



















