गोवा क्रांति दिवस की पूरी दास्तान: जब बर्लिन में बनी योजना ने मडगांव के चौक से हिला दिया 450 साल पुराना पुर्तगाली राजgoa
3 घंटे पहले· 2

गोवा क्रांति दिवस की पूरी दास्तान: जब बर्लिन में बनी योजना ने मडगांव के चौक से हिला दिया 450 साल पुराना पुर्तगाली राज

18 जून 1946 को मडगांव के चौक पर उमड़े जनसैलाब ने पुर्तगाली साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं, और इस क्रांति की नींव हजारों किलोमीटर दूर जर्मनी की बर्लिन यूनिवर्सिटी में दो दोस्तों की मुलाकात से पड़ी थी।

हर साल 18 जून को देश गोवा क्रांति दिवस के तौर पर याद करता है, और इसकी वजह वह तारीख है जब साल 1946 में मडगांव के चौक पर हजारों लोगों का एक ऐतिहासिक जनसैलाब उमड़ पड़ा था। यह भीड़ किसी सामान्य सभा के लिए नहीं, बल्कि अपनी आजादी की मांग को बुलंद करने जुटी थी। इसी दिन गोवा के लोगों ने तय कर लिया था कि अब अपने भविष्य का फैसला वे खुद करेंगे। यही वह चिंगारी थी जिसने 450 साल पुराने पुर्तगाली साम्राज्य की बुनियाद को पूरी तरह दहला दिया।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरी क्रांति की पटकथा भारत में नहीं, बल्कि यहां से हजारों किलोमीटर दूर जर्मनी में तैयार हुई थी। बर्लिन यूनिवर्सिटी में दो राष्ट्रवादी छात्रों की मुलाकात ने इस आंदोलन को जन्म दिया। इनमें से एक थे गोवा के डॉ. जूलियाओ मेनेजेस और दूसरे थे उत्तर प्रदेश के डॉ. राममनोहर लोहिया। इन्हीं दोनों ने मिलकर पुर्तगाली हुकूमत के खिलाफ वह मोर्चा खोला जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

बर्लिन की एक मुलाकात जिसने गोवा की आजादी की नींव रखी

इस कहानी की शुरुआत 1920 के दशक के आखिरी सालों में होती है। उस समय बर्लिन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान डॉ. मेनेजेस और डॉ. राममनोहर लोहिया एक-दूसरे से मिले। दोनों नौजवानों के मन में अपने देश को गुलामी से मुक्त देखने का एक ही सपना पल रहा था।

पढ़ाई खत्म होने के बाद रास्ते जरूर अलग हुए। डॉ. लोहिया साल 1933 में भारत लौट आए, जबकि डॉ. मेनेजेस अपनी मेडिकल की डिग्री लेकर साल 1938 में गोवा वापस पहुंचे। दूरी भले बढ़ गई हो, पर दोनों का लक्ष्य एक ही बना रहा। वे लगातार एक-दूसरे के संपर्क में रहे और रणनीति बुनते रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब डॉ. लोहिया भूमिगत थे, तब डॉ. मेनेजेस ने ही उन्हें अपने यहां शरण दी थी।

आराम के बहाने गोवा पहुंचे लोहिया, बनने लगी बगावत की योजना

साल 1946 में जब डॉ. लोहिया की तबीयत बिगड़ी, तो डॉ. मेनेजेस उन्हें आराम कराने के लिए गोवा ले आए। लेकिन यहां आराम तो दूर, पुर्तगाली शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने का खाका तैयार होने लगा।

गोवा के असोलना गांव में दोनों नेताओं के बीच एक के बाद एक गुप्त बैठकें होने लगीं। उस दौर में पुर्तगाली प्रशासन ने हर तरह की सार्वजनिक सभा पर पूरी तरह पाबंदी लगा रखी थी। इस रोक को सीधे चुनौती देते हुए 15 जून को दोनों नेताओं ने पणजी में एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया। यह पुर्तगाली कानून की खुली अवहेलना थी और इसने लोगों के हौसले को आसमान पर पहुंचा दिया।

18 जून की वह शाम, जब लोहिया के एक वाक्य ने भर दिया जोश

इसके तुरंत बाद 18 जून 1946 को मडगांव के चौक पर एक विशाल जनसभा बुलाई गई। पुलिस के डर को ताक पर रखकर हजारों स्थानीय लोग इसमें शामिल हुए। मंच से डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेजेस ने जनता से अपने नागरिक अधिकारों के लिए खड़े होने का आह्वान किया।

इसी सभा में डॉ. लोहिया ने भीड़ के सामने खड़े होकर कहा, ‘आजादी कभी भी भीख में नहीं मिलती है बल्कि इसे संघर्ष से हासिल करना पड़ता है’। उनके इस ऐतिहासिक भाषण ने लोगों के भीतर सालों से दबे गुस्से को एक बड़ी क्रांति की शक्ल दे दी।

नेताओं की गिरफ्तारी और सड़कों पर फूटा जनाक्रोश

शुरुआत में पुर्तगाली सरकार ने इस आंदोलन को बेहद हल्के में लिया था। लेकिन मडगांव में उमड़ी भीड़ देखकर अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। प्रशासन ने आनन-फानन में डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेजेस को गिरफ्तार कर लिया और चुपचाप पणजी के एक पुलिस स्टेशन में बंद कर दिया।

पुर्तगालियों को भरोसा था कि नेताओं के जेल जाते ही आंदोलन अपने आप दम तोड़ देगा। पर उनका यह अंदाजा पूरी तरह गलत निकला। अगले ही दिन यह खबर पूरे गोवा में जंगल की आग की तरह फैल गई। आम जनता का सैलाब सड़कों पर उतर आया। जगह-जगह धरने शुरू हो गए और दोनों नेताओं की रिहाई की मांग गूंजने लगी। इस भारी दबाव के सामने झुकते हुए प्रशासन को डॉ. लोहिया को गोवा की सीमा से बाहर छोड़ना पड़ा, वहीं डॉ. मेनेजेस को मडगांव में ही रिहा कर दिया गया।

1961 का ऑपरेशन विजय और साढ़े चार सौ साल पुराने राज का अंत

इस आंदोलन ने गोवा के लोगों के मन से विदेशी शासन का डर हमेशा के लिए मिटा दिया। साल 1947 में भारत को अंग्रेजों से आजादी तो मिल गई, लेकिन गोवा तब भी पुर्तगालियों के कब्जे में था। पुर्तगाली भारत में साल 1498 में वास्कोडिगामा के आगमन के समय से ही जमे हुए थे और किसी भी कीमत पर गोवा को छोड़ने को तैयार नहीं थे।

इसके बावजूद गोवा के लोगों का संघर्ष लगातार जारी रहा। आखिरकार साल 1961 में भारत सरकार ने बड़ा फैसला लिया। भारतीय सेना ने 19 दिसंबर 1961 को ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत की और महज 36 घंटे के भीतर पुर्तगाली सेना ने भारतीय जांबाजों के सामने हथियार डाल दिए। इस तरह करीब साढ़े चार सौ साल पुराना दमनकारी शासन हमेशा के लिए खत्म हो गया। भारत आज भी इसे गोवा की मुक्ति कहता है, जबकि पुर्तगाल इसे अपने ऊपर एक हमले के रूप में देखता रहा।

सवाल-जवाब

गोवा क्रांति दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
यह 18 जून को मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1946 में मडगांव के चौक पर हजारों लोगों ने पुर्तगाली शासन के खिलाफ आजादी की मांग की थी।
इस आंदोलन के पीछे मुख्य नेता कौन थे?
इस आंदोलन की अगुवाई उत्तर प्रदेश के डॉ. राममनोहर लोहिया और गोवा के डॉ. जूलियाओ मेनेजेस ने की थी, जिनकी मुलाकात बर्लिन यूनिवर्सिटी में हुई थी।
डॉ. लोहिया ने मडगांव की सभा में क्या कहा था?
उन्होंने कहा था, ‘आजादी कभी भी भीख में नहीं मिलती है बल्कि इसे संघर्ष से हासिल करना पड़ता है’।
गोवा पुर्तगाली शासन से आखिर कब आजाद हुआ?
भारतीय सेना ने 19 दिसंबर 1961 को ऑपरेशन विजय शुरू किया और महज 36 घंटे में पुर्तगाली सेना ने सरेंडर कर दिया, जिससे करीब साढ़े चार सौ साल पुराना शासन खत्म हुआ।
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