रूस और यूक्रेन के बीच जारी सैन्य संघर्ष तथा मध्य पूर्व में ईरान से जुड़े तनाव ने वैश्विक स्तर पर रक्षा प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदल दिया है। दुनिया भर की प्रमुख सैन्य शक्तियां अपनी जल, थल और नभ सेनाओं को अत्याधुनिक तकनीकों तथा अगली पीढ़ी के हथियार प्रणालियों से लैस करने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रही हैं। इसी क्रम में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपनी नौसेना की मारक क्षमता को आधुनिक बनाने के लिए 76.6 अरब डॉलर (लगभग 7,30,691 करोड़ रुपये या 6.4 लाख करोड़ रुपये) के विशाल पनडुब्बी अधिग्रहण कार्यक्रम को हरी झंडी दे दी है। यह पूरी धनराशि अमेरिकी नौसेना के लिए 14 नई परमाणु संचालित पनडुब्बियों के निर्माण पर खर्च की जाएगी। दिलचस्प बात यह है कि पिछले वित्त वर्ष में भारत का संपूर्ण वार्षिक रक्षा बजट 85 अरब डॉलर (8,10,819 करोड़ रुपये) था, जिसका अर्थ है कि अमेरिका केवल अपने पनडुब्बी बेड़े के विस्तार पर भारत के कुल रक्षा बजट के लगभग बराबर धनराशि खर्च करने जा रहा है। अमेरिका का यह फैसला हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की तेजी से उभरती समुद्री सैन्य शक्ति और पुरानी पड़ चुकी अमेरिकी पनडुब्बियों को बदलने की अनिवार्यता से प्रेरित है।
पेंटागन के दो बड़े रक्षा अनुबंध और जहाजरानी उद्योग का विकास
अमेरिकी नौसेना ने इस महत्वाकांक्षी पनडुब्बी निर्माण कार्यक्रम को अमलीजामा पहनाने के लिए देश की दो प्रमुख रक्षा निर्माता कंपनियों जनरल डायनेमिक्स इलेक्ट्रिक बोट और हंटिंगटन इंगल्स इंडस्ट्रीज को मुख्य अनुबंध सौंपे हैं। इस पूरे 76.6 अरब डॉलर के पैकेज का बड़ा हिस्सा सीधे जहाज निर्माण पर केंद्रित है। इसमें लगभग 42 अरब डॉलर की लागत से 9 वर्जीनिया क्लास (Virginia-class) न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियों (SSN) का निर्माण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 29.5 अरब डॉलर की धनराशि से 5 कोलंबिया क्लास (Columbia-class) बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBN) को तैयार करने की योजना है। जहाजों के सीधे निर्माण के अलावा पेंटागन ने रक्षा औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करने के लिए लगभग 5 अरब डॉलर का एक विशेष कोष भी निर्धारित किया है। इस बजटीय आवंटन का उपयोग अमेरिकी जहाज निर्माण कारखानों की बुनियादी क्षमता बढ़ाने, तकनीकी रूप से कुशल मानव संसाधन तैयार करने और घटक निर्माण से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इस पनडुब्बी सौदे से महज दो से तीन दिन पहले पेंटागन ने पैट्रियट मिसाइल प्रणालियों के निर्माण के लिए एक अन्य रक्षा कंपनी को 59 अरब डॉलर (लगभग 5 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम ठेका भी जारी किया था।
ओहायो क्लास की जगह लेंगी कोलंबिया क्लास परमाणु मिसाइल पनडुब्बियां
कोलंबिया क्लास पनडुब्बियों का प्राथमिक उद्देश्य अमेरिकी नौसेना की पुरानी हो चुकी ओहायो क्लास की परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों को सेवा से बाहर कर उनका स्थान लेना है। अमेरिकी नौसेना में 18 ओहायो क्लास पनडुब्बियों को वर्ष 1981 से 1997 के बीच शामिल किया गया था, जो अब अपनी परिचालन सीमा के अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। अमेरिकी रणनीतिक योजना के तहत भविष्य में कुल 12 कोलंबिया क्लास पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। यह नई श्रृंखला 2080 के दशक तक समुद्र आधारित अमेरिकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को अटूट बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाएगी। इन पनडुब्बियों पर अत्याधुनिक ट्राइडेंट-II D5 परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की जाएंगी। यह मिसाइल प्रणाली अमेरिका के तीनों रक्षा अंगों से युक्त न्यूक्लियर ट्रायड के समुद्री घटक की रीढ़ मानी जाती है, जो किसी भी संभावित परमाणु हमले की स्थिति में अमेरिका को एक अचूक और भरोसेमंद सेकेंड स्ट्राइक क्षमता प्रदान करती है।
वर्जीनिया क्लास अटैक सबमरीन्स से बढ़ेगी आक्रामक मारक क्षमता
जहाँ कोलंबिया क्लास का ध्यान रणनीतिक परमाणु प्रतिरोध पर है, वहीं वर्जीनिया क्लास की अटैक पनडुब्बियां अमेरिकी नौसेना की पारंपरिक और सामरिक समुद्री क्षमताओं को नया आयाम देंगी। इन परमाणु संचालित अटैक पनडुब्बियों का इस्तेमाल समुद्र में दुश्मन के जहाज और पनडुब्बियों की तलाश कर उन्हें नष्ट करने, लंबी दूरी तक सटीक मिसाइल हमले करने, खुफिया जानकारी जुटाने तथा विशेष सैन्य अभियानों को अंजाम देने के लिए किया जाता है। वर्जीनिया क्लास के सबसे आधुनिक ब्लॉक-V वेरिएंट में वर्जीनिया पेलोड मॉड्यूल जोड़ा जाएगा। इस विशेष पेलोड मॉड्यूल के लगने से प्रत्येक पनडुब्बी की क्रूज मिसाइल ले जाने की क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि होगी, जिससे अमेरिकी नौसेना की लंबी दूरी की समुद्री आक्रामक क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक घातक हो जाएगी।
हिंद-प्रशांत में चीन की बढ़ती सैन्य ताकत से पैदा हुई चुनौती
अमेरिका द्वारा नौसैन्य बेड़े में किए जा रहे इस भारी-भरकम निवेश के पीछे सबसे बड़ा कारक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी का अभूतपूर्व विस्तार है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार की अत्याधुनिक पनडुब्बियों के निर्माण की गति को बेहद तेज कर दिया है। चीनी नौसेना के बेड़े में आधुनिक टाइप-093B परमाणु अटैक पनडुब्बियां और टाइप-094A बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां पहले ही सक्रिय रूप से शामिल की जा चुकी हैं। रक्षा विश्लेषकों का अनुमान है कि इस वर्तमान दशक के अंत तक चीन के पास पनडुब्बियों का कुल बेड़ा बढ़कर 65 से 70 तक पहुंच सकता है। चीन की नई पनडुब्बियों में जल के भीतर बेहद कम आवाज पैदा करने वाली ध्वन्यात्मक तकनीक, उन्नत सोनार प्रणालियां और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं। चीन का यह व्यापक समुद्री विस्तार हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पारंपरिक अमेरिकी प्रभाव और समुद्री प्रभुत्व को सीधी चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा है।
दक्षिण एशियाई नौसैन्य परिदृश्य में पाकिस्तान का बेड़ा और भारत की स्थिति
हिंद-प्रशांत के साथ-साथ दक्षिण एशियाई समुद्री क्षेत्र में भी पनडुब्बियों की होड़ तेज हो रही है। भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान भी अपनी नौसैन्य ताकत बढ़ाने के लिए चीन के साथ मिलकर काम कर रहा है। पाकिस्तान चीन से 8 नई टाइप-039 हैंगोर क्लास की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हासिल कर रहा है। इस श्रृंखला की पहली पनडुब्बी पीएनएस हैंगोर को पाकिस्तानी नौसेना में शामिल भी किया जा चुका है। इन सभी 8 पनडुब्बियों के बेड़े में शामिल होने के बाद पाकिस्तान की कुल पनडुब्बी संख्या बढ़कर 13 हो जाएगी, जिससे अरब सागर में उसकी परिचालन क्षमता पहले से काफी मजबूत हो जाएगी। दूसरी ओर, भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में 16 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मौजूद हैं, जिन्हें कलवरी, सिंधुघोष और शिशुमार श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें से पुरानी पड़ चुकी सिंधुघोष श्रेणी की 4 पनडुब्बियों को सेवामुक्त किया जा चुका है, जबकि शिशुमार श्रेणी की पनडुब्बियों का जीवनकाल बढ़ाने के लिए उनका व्यापक आधुनिकीकरण किया गया है। फ्रांसीसी स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों में अब स्वदेशी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) प्रणाली स्थापित करने की योजना पर कार्य चल रहा है। यह AIP तकनीक पनडुब्बियों को बिना सतह पर आए लंबे समय तक पानी के भीतर रहने की क्षमता प्रदान करेगी, जिससे दुश्मन के रडार से बचने की उनकी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। हालांकि, भारतीय नौसेना की बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट-75I पनडुब्बी निर्माण योजना अभी भी प्रक्रियाधीन है।


















