जीवन में खुद का मकान या जमीन खरीदना अधिकांश लोगों के लिए सबसे बड़ी आर्थिक पूंजी का निवेश होता है। लोग दशकों तक पाई-पाई जोड़कर इस उम्मीद में प्लॉट का सौदा करते हैं कि उनका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। हालांकि, कई बार जानकारी के अभाव में अथवा जल्दबाजी के चलते खरीदार केवल अनुबंध यानी एग्रीमेंट टू सेल के कागजात तैयार करवाकर संतुष्ट हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सौदा पक्का हो गया और जमीन उनकी हो गई। लेकिन जब आगे चलकर आधिकारिक तौर पर रजिस्ट्री कराने का समय आता है, तब गंभीर कानूनी अड़चनें सामने खड़ी हो जाती हैं। कानूनी दृष्टिकोण से केवल अनुबंध कभी भी किसी अचल संपत्ति का पूर्ण मालिकाना हक प्रदान नहीं करता है।
एग्रीमेंट टू सेल और सेल डीड के बीच का कानूनी अंतर
संपत्ति खरीद की प्रक्रिया में एग्रीमेंट टू सेल केवल दो पक्षों के बीच भविष्य में होने वाले सौदे का एक प्रारंभिक करारनामा होता है। फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट के एडवोकेट मोहन तिवारी के अनुसार, सामान्य रूप से महज एग्रीमेंट टू सेल निष्पादित करने से किसी भी व्यक्ति को जमीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं मिल पाता है। संपत्ति का वैध मालिक बनने के लिए सेल डीड निष्पादित करना और उसकी विधिवत रजिस्ट्री कराना अनिवार्य कदम है। जब दोनों पक्ष प्लॉट के क्रय-विक्रय पर सहमत होते हैं, तो आपसी विमर्श से रजिस्ट्री की एक निश्चित तिथि निर्धारित की जानी चाहिए। इसके बाद रजिस्ट्रार कार्यालय में निर्धारित कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। खरीदार को सरकार द्वारा तय स्टाम्प ड्यूटी और अन्य जरूरी शुल्क जमा कराने होते हैं, जिसके बाद ही तय तारीख पर अंतिम रजिस्ट्री संपन्न होती है।
विक्रेता रजिस्ट्री से मुकरे तो क्या हैं कानूनी विकल्प
अगर प्लॉट का पूरा या आंशिक भुगतान लेने के बाद विक्रेता रजिस्ट्री कराने से पीछे हटने लगे या आनाकानी करे, तो कानून खरीदार को कई अधिकार देता है। एडवोकेट मोहन तिवारी स्पष्ट करते हैं कि ऐसी परिस्थिति में खरीदार अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। सबसे पहले कदम के तौर पर विक्रेता को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजा जाता है, जिसमें उसे तय शर्तों के तहत रजिस्ट्री पूरी करने का अवसर दिया जाता है। यदि कानूनी नोटिस मिलने के बाद भी विक्रेता दस्तावेज पंजीकृत कराने को तैयार नहीं होता, तो खरीदार सक्षम न्यायालय में दीवानी दावा दायर कर सकता है। हालांकि, अदालत में अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए वैध एग्रीमेंट और लेनदेन के स्पष्ट वित्तीय साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। अदालत मामले की परिस्थितियों और पेश किए गए सबूतों के आधार पर निर्णय लेती है। यदि खरीदार का दावा सही पाया जाता है, तो न्यायालय विक्रेता को रजिस्ट्री पूरी करने के लिए बाध्यकारी आदेश जारी कर सकता है।
एक ही जमीन कई लोगों को बेचने और फर्जीवाड़े पर कार्रवाई
प्रॉपर्टी बाजार में कई बार ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहां कोई बेईमान विक्रेता एक ही भूखंड को कई अलग-अलग खरीदारों को एग्रीमेंट के जरिए बेच देता है। एडवोकेट मोहन तिवारी बताते हैं कि यदि किसी विक्रेता ने एक ही प्लॉट एक से अधिक लोगों को बेच दिया है, तो पीड़ित पक्ष सीधे पुलिस थाने में आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है। ऐसे मामलों में धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत सख्त कार्रवाई की जा सकती है। यद्यपि मामले के वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों पर यह तय होता है कि कौन सी कानूनी धाराएं लागू होंगी। इसके अलावा, कई खरीदार केवल एग्रीमेंट निष्पादित करके मौके पर बाउंड्री वॉल या कब्जा ले लेते हैं और निश्चिंत हो जाते हैं। वास्तविकता यह है कि केवल भौतिक कब्जा पा लेने अथवा एग्रीमेंट हाथ में होने से स्वामित्व का कानूनी अधिकार नहीं बनता। इसलिए खरीदार को एग्रीमेंट की प्रत्येक शर्त को गहराई से समझना चाहिए और अंतिम रजिस्ट्री तक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
प्लॉट का सौदा करने से पहले जरूरी जांच-पड़ताल
अपनी गाढ़ी कमाई को डूबने से बचाने के लिए किसी भी अचल संपत्ति में पैसा लगाने से पूर्व आवश्यक पड़ताल करना आवश्यक है। मोहन तिवारी सलाह देते हैं कि प्लॉट खरीदने से पहले विक्रेता के मालिकाना हक, जमीन का कुल क्षेत्रफल, खसरा-खतौनी और संबंधित राजस्व दस्तावेजों का गहन सत्यापन किया जाना चाहिए। केवल कागजों पर भरोसा न करके दस्तावेजों में दर्ज जमीन के नंबर, सीमाओं और मौके पर मौजूद भौतिक प्लॉट का मिलान करना बेहद जरूरी है। खरीदारों को चाहिए कि वे एग्रीमेंट टू सेल में सभी शर्तों को बिल्कुल स्पष्ट और पारदर्शी रखें। केवल प्रारंभिक अनुबंध या मौखिक कब्जे के भरोसे पूरी रकम का भुगतान करना बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम साबित हो सकता है। संपत्ति की कानूनी पुष्टि के बाद निर्धारित प्रक्रिया से रजिस्ट्री कराना ही सुरक्षित तरीका है।























