मिजोरम में कैंसर की जांच और इलाज के लिए स्वास्थ्य ढांचे को किया जा रहा मजबूतभरतपुर में श्री जसवंत पशु मेले की धूम, उत्तम नस्ल के मवेशियों की हो रही है परखजयपुर कमिश्नरेट पर कांग्रेस का अनिश्चितकालीन धरना, टीकाराम जूली के नेतृत्व में रितु बराला मामले में एफआईआर की मांगतमिलनाडु में रोजगार योजना के तहत मिलेंगे 150 दिन, मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का बड़ा फैसलाजयपुर में अमेरिकी नागरिकों से ठगी करने वाले फर्जी कॉल सेंटर पर पुलिस का छापा, 10 आरोपी हिरासत मेंबयाना देकर जमीन पर कब्जा तो ले लिया, पर सेल डीड के बिना कानूनन क्यों अधूरे हैं आपशुक्र की वक्री चाल से अगले 25 दिनों तक इन 5 राशियों का चमकेगा भाग्य, बढ़ेगा बैंक बैलेंससरगुजा के 19 वर्षीय युवा किसान सम्मे आलम ने 10 एकड़ जमीन पर शुरू की टाऊ की अनूठी जैविक खेतीअसम के बोरीगांव जिले में दो सदियों बाद मिला दुर्लभ पौधा, बोटैनिस्ट्स ने की खोजडीएनडी-सोहना एक्सप्रेसवे से पलवल का सफर अब मात्र 45 मिनट का, जल्द खुलेगा नया कॉरिडोर
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित बूंदी गांव से सड़क बनने के बाद छीना पड़ाव का दर्जा, फिर भी सैलानियों की पहली पसंदउत्तराखंड
20 अक्तू॰ 2026, 3:22 pm (5 मिनट पहले)· 0

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित बूंदी गांव से सड़क बनने के बाद छीना पड़ाव का दर्जा, फिर भी सैलानियों की पहली पसंद

पिथौरागढ़ जिले में करीब नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बूंदी गांव कभी कैलाश-मानसरोवर यात्रा का मुख्य पड़ाव हुआ करता था, लेकिन सड़क बनने के बाद भले ही यह दर्जा छिन गया हो, फिर भी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण यह पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है।

कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बसा बूंदी गांव कभी इस पूरी यात्रा का सबसे अहम और मुख्य पड़ाव हुआ करता था। पिथौरागढ़ जिले में लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह बॉर्डर का वह आखिरी गांव है, जो उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश करने से पहले आखिरी मानवी बस्ती के रूप में नजर आता है। लिपुलेख दर्रे तक जाने वाले रास्ते में छियालेख की बेहद कठिन और खड़ी चढ़ाई को पार करने से पहले यात्री इसी स्थान पर अपनी थकान मिटाया करते थे।

व्यापार और यात्रा का पुराना इतिहास

करीब दो सौ परिवारों की आबादी वाले इस गांव की अपनी एक ऐतिहासिक महत्ता रही है। यह स्थान केवल धार्मिक यात्राओं का केंद्र नहीं था, बल्कि भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार के लिए भी एक प्रमुख ठहराव का काम करता था। इस गांव के ठीक सामने नेपाल का प्रसिद्ध अपी पर्वत खड़ा हुआ है। इसी अपी पर्वत के आसपास दुर्लभ कीड़ा जड़ी भी पाई जाती है, जो यहां के स्थानीय बाशिंदों के लिए आय और आजीविका का एक बहुत बड़ा साधन मानी जाती है। मौसम की दुश्वारियों के चलते यहां के ग्रामीण सर्दियों के मौसम में मैदानी और निचले इलाकों की तरफ पलायन कर जाते हैं, जिसके कारण यह पूरा गांव सालभर में केवल छह महीने ही आबाद रह पाता है।

ये भी पढ़ें

सड़क निर्माण के बाद बदला स्वरूप

साल 2020 में जब लिपुलेख दर्रे को जोडने वाली सड़क का निर्माण कार्य पूरा हुआ, तो इस इलाके की पूरी तस्वीर ही बदल गई। सड़क बन जाने के बाद से यात्रियों और पर्यटकों का काफिला अब बूंदी गांव में रुकने के बजाय सीधे गुंजी की तरफ निकल जाता है, जिससे बूंदी का पारंपरिक पड़ाव वाला दर्जा समाप्त हो गया। हालांकि इसके बावजूद इस सीमावर्ती क्षेत्र का सामरिक और रणनीतिक महत्व आज भी पूरी तरह से बरकरार है। इस गांव के बिल्कुल नीचे से भारत और नेपाल की सीमाओं को अलग करने वाली काली नदी का प्रवाह है। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण यहां सशस्त्र सीमा बल के जवान हर समय मुस्तैद रहते हैं और सीमा से आने-जाने वाले हर शख्स पर पैनी नजर रखते हैं।

पर्यटन के नए द्वार और होम स्टे संस्कृति

यात्री पड़ाव छिन जाने के बावजूद आदि कैलाश, कैलाश-मानसरोवर और ॐ पर्वत के दर्शनों के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों का आना-जाना यहां पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। इस इलाके की दिलकश प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है, जो यात्रा के दौरान यहां कुछ पल बिताने जरूर आते हैं। पर्यटकों की इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर कई होम स्टे शुरू कर दिए गए हैं। होम स्टे संचालक हरीश रायपा का कहना है कि पहले जब सड़क नहीं थी, तब यात्रा सीजन के दौरान पूरे गांव में भारी चहल-पहल हुआ करती थी और यात्री रात के वक्त यहीं विश्राम करते थे। अब भले ही मुख्य पड़ाव गुंजी बन गया हो, लेकिन प्रकृति प्रेमी और घूमने के शौकीन सैलानी आज भी अपनी यात्रा के दौरान बूंदी गांव में ही रुकना पसंद करते हैं, और यही होम स्टे इस क्षेत्र के लोगों के लिए पूरे साल की आजीविका कमाने का मुख्य जरिया बन चुके हैं।

सवाल-जवाब

बूंदी गांव कहाँ स्थित है?
बूंदी गांव उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बसा है।
बूंदी गांव में लोग साल में कितने महीने रहते हैं?
मौसम की कठिनाइयों के कारण ग्रामीण सर्दियों के दौरान निचले इलाकों में आ जाते हैं, जिससे यह गांव साल में केवल छह महीने ही आबाद रहता है।
बूंदी गांव का पारंपरिक महत्व क्या था?
यह गांव पहले कैलाश-मानसरोवर यात्रा और भारत-चीन व्यापार के लिए एक मुख्य पड़ाव हुआ करता था।
साल 2020 के बाद इस गांव में क्या बदलाव आया?
लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क बनने के बाद यात्रियों का पड़ाव बदलकर सीधे गुंजी हो गया, जिससे बूंदी का मुख्य ट्रांजिट स्टेटस बदल गया।
यहाँ के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन क्या है?
यहाँ के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से नेपाल के अपी पर्वत के पास मिलने वाली कीड़ा जड़ी और सैलानियों के लिए चलाए जाने वाले होम स्टे पर निर्भर है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp