राजस्थान के सिरोही जिले में प्रकृति की गोद और अरावली की पहाड़ियों के बीच एक बेहद प्राचीन और अनोखा मंदिर स्थित है, जो इन दिनों लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आबूरोड शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर उमरनी की पहाड़ियों के भीतर एक प्राकृतिक पीली गुफा बनी हुई है, जहां भगवान शिव का अमरेश्वर महादेव मंदिर स्थापित है। यह पावन स्थल अपनी विशिष्ट भौगोलिक बनावट और धार्मिक महत्व के कारण आसपास के इलाकों में गहरी आस्था का मुख्य केंद्र माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों को भी यह शांत और रमणीय वातावरण अपनी ओर आकर्षित करता है, जहां चारों तरफ फैले पहाड़ और घने जंगल मन को अद्वितीय शांति प्रदान करते हैं।
संतों की तपस्या स्थली का इतिहास
इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल का नाता प्राचीन संतों की तपस्या से जुड़ा रहा है। निरंजनी अखाड़े के संतों द्वारा इस मंदिर की देखरेख और व्यवस्था संभाली जाती है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो यहां के पूर्व महंत गणेशगिरी महाराज ने इस स्थान पर पूरे 65 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनके देवलोकगमन के पश्चात महंत भीमगिरी महाराज ने मंदिर की तमाम जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठाया और इसकी सेवा में जुट गए। आज भी इन दोनों महान संतों की समाधियां मंदिर के ठीक ऊपरी हिस्से में एक विशाल चट्टान पर बनी हुई हैं, जो यहां आने वाले भक्तों को उनकी साधना की याद दिलाती हैं। इस पूरे परिसर की प्राकृतिक छटा बारिश के दिनों में और अधिक मनमोहक हो जाती है, जब पीली गुफा के प्रवेश द्वार के ठीक सामने से एक बरसाती नाले के रूप में झरने का पानी कलकल बहता है। इसके अलावा इस क्षेत्र के नजदीक ही प्राचीन ऋषिकेश मंदिर और माता भद्रकाली का मंदिर भी स्थित है, जो इस पूरे धार्मिक परिपथ को और महत्वपूर्ण बनाते हैं।
राजा अम्बरीष और आधारशिला की पौराणिक कथा
इस मंदिर के ठीक ऊपर एक ऐतिहासिक और अद्भुत आधारशिला मौजूद है, जो गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देती प्रतीत होती है। पहाड़ी पर स्थित इस विशाल चट्टान की संरचना कुछ ऐसी है कि वह देखने वाले को किसी भी बाहरी सहारे के बिना हवा में टिकी हुई सी महसूस होती है। इस आधारशिला के पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। भद्रकाली मंदिर के सेवादार और पुजारी राजू महाराज के अनुसार, इसी आधारशिला के स्थान पर प्राचीन काल में राजा अम्बरीष ने बेहद कठिन और लंबी तपस्या की थी। उनकी इस साधना का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे देवराज इंद्र का सिंहासन तक डोलने लगा था। राजा की बढ़ती आध्यात्मिक शक्ति से घबराकर इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के उद्देश्य से वज्र से प्रहार किया था। हालांकि, भगवान विष्णु के परम भक्त राजा अम्बरीष की रक्षा स्वयं दिव्य शक्तियों ने की और पहाड़ी की यह शिला हवा में अधर यानी बिना सहारे के रुक गई, जिससे राजा की तपस्या में कोई बाधा नहीं आई और वह निर्बाध रूप से साधना मेंलीन रहे।
पर्यटन और विकास की संभावनाएं
आज भी इस रहस्यमयी शिला और इसके ठीक नीचे स्थित पीली गुफा के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इस अद्भुत आधारशिला तक पहुंचने के लिए पर्यटकों को पीली गुफा के अंदर से होते हुए पहाड़ी की चढ़ाई तय करनी पड़ती है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता, अनूठी भौगोलिक बनावट और गहरी पौराणिक मान्यताओं के अनूठे मेल के कारण सिरोही जिले के उन प्रमुख स्थलों में शुमार है, जिन्हें आने वाले समय में बेहतर प्रशासनिक पहचान और आधुनिक पर्यटक सुविधाओं की सख्त आवश्यकता है।
















