संतानों को पाल-पोसकर बड़ा करने और उनके बेहतर भविष्य के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर देने वाले माता-पिता जब वृद्धावस्था में अपनों के ही सहारे को तरस जाएं, तो इससे बड़ा दुख और कोई नहीं हो सकता। ऐसा ही एक बेहद भावुक मामला बिहार के नालंदा जिले से सामने आया है। यहां के रहने वाले 70 वर्षीय सुरेश प्रसाद आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके हैं। जिस उम्र में उन्हें अपने बच्चों के सहारे और देखभाल की सख्त जरूरत थी, उस उम्र में वे हरियाणा के फरीदाबाद शहर में स्थित एक वृद्धाश्रम में गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। करीब एक महीने से अपने घर से दूर होने के बाद भी उनके परिवार के किसी सदस्य ने उन्हें तलाशने की कोई कोशिश नहीं की है।
वृद्धाश्रम में शरण और परिवार का ढांचा
सुरेश प्रसाद वर्तमान में फरीदाबाद के सेक्टर 10 में बने एक वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो वे पहले मिठाई बनाने का काम करते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी, तीन बेटे, दो बेटियां और दो पोते शामिल हैं। हालांकि, उनका पारिवारिक जीवन दुखों से भरा रहा है। उनके सबसे बड़े बेटे का निधन हो चुका है, जबकि बीच वाला बेटा शारीरिक रूप से विकलांग है। उनका सबसे छोटा बेटा फरीदाबाद में ही रहता है, जहां वह गाड़ी चलाने का काम करता है और मजदूरी करके अपना जीवन यापन करता है। सुरेश प्रसाद की एक बेटी भी फरीदाबाद में ही निवास करती है। इसके बावजूद, अपनों के इस शहर में होने पर भी वे वृद्धाश्रम की चारदीवारी में रहने के लिए विवश हैं।
खुद घर छोड़ने की मजबूरी और बेटे का व्यवहार
अपने जीवन की परिस्थितियों के बारे में बताते हुए सुरेश प्रसाद ने स्वीकार किया कि वे स्वयं ही अपने घर से बाहर निकले थे। उन्होंने यह भी साझा किया कि उनका छोटा बेटा ठीक स्थिति में है, लेकिन उसने अपने पिता को अपने साथ रखने से मना कर दिया या उन्हें अपने पास नहीं रखा। दृष्टिहीन होने के कारण वे भटकते हुए फरीदाबाद पहुंच गए। हैरानी की बात यह है कि बेटा और बेटी दोनों एक ही शहर में रहते हैं, फिर भी 70 साल के लाचार पिता को सहारा देने के लिए कोई आगे नहीं आया। अपने बच्चों के इस कड़वे व्यवहार के बावजूद सुरेश प्रसाद के मन में अपने बच्चों के प्रति कोई शिकायत या नफरत नहीं दिखती। वे मीडिया या अन्य लोगों के सामने अपने बच्चों की कमियां बताने से साफ बचते हैं और आज भी एक पिता के रूप में उनके उज्ज्वल भविष्य और भलाई की ही कामना करते हैं।
पुलिस द्वारा वृद्धाश्रम में दाखिला और गुमशुदगी की रिपोर्ट न होना
फरीदाबाद के सेक्टर 10 स्थित वृद्धाश्रम की संचालिका अनीता मलिक ने इस मामले पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि पुलिस की टीम बुजुर्ग सुरेश प्रसाद को वृद्धाश्रम लेकर आई थी और उन्हें यहां सुरक्षित छोड़ा था। अनीता मलिक के अनुसार, आमतौर पर जब कोई बुजुर्ग घर से भटक जाता है या लापता होता है, तो उनके परिजन उनकी तलाश करते हुए वृद्धाश्रमों और हेल्पलाइनों तक पहुंचते हैं। हालांकि, सुरेश प्रसाद के मामले में करीब एक महीना बीत जाने के बाद भी उनका कोई भी बच्चा या रिश्तेदार उन्हें देखने या ढूंढने नहीं आया है।
संतानों की बेरुखी पर उठते सवाल
अनीता मलिक स्वयं एक मिसिंग हेल्पलाइन भी संचालित करती हैं और घर से बिछड़े हुए लोगों को उनके परिवारों से मिलाने का कार्य करती हैं। उन्होंने अपने स्तर पर हर संभावित स्थान और पुलिस रिकॉर्ड्स में जांच-पड़ताल की। अनीता मलिक का कहना है कि यदि सुरेश प्रसाद के बच्चों ने उनकी गुमशुदगी की कोई शिकायत दर्ज कराई होती, तो हेल्पलाइन प्रणाली के माध्यम से इसका तुरंत पता चल जाता। लेकिन अब तक किसी भी पुलिस थाने में उनके लापता होने की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई है। यह स्थिति यह दर्शाती है कि बच्चों ने अपने दृष्टिहीन पिता की सुध लेना भी जरूरी नहीं समझा। अनीता मलिक मानती हैं कि बच्चों द्वारा ठुकराए जाने के बाद भी एक पिता का अपनी संतानों के प्रति मोह और बचाव का भाव इस पूरी दास्तान को और अधिक दर्दनाक बना देता है।



















